Tuesday, 1 November 2022

विकास की राह पर तेजी से बढ़ता देश का हृदय प्रदेश



अपने नाम के अनुरूप देश के मध्य भाग में स्थित मध्यप्रदेश  आज अपना 67 वां स्थापना दिवस मना रहा है | 1 नवम्बर 1956 को राज्य पुनर्गठन के आधार पर जब नए राज्यों की संरचना हुई तब मध्यभारत , महाकोशल , विन्ध्य और भोपाल नामक चार अंचलों  को मिलाकर इस प्रदेश का गठन किया गया | यद्यपि इसकी राजधानी जबलपुर  में प्रस्तावित थी किन्तु राजनीतिक कारणों से भोपाल को वह गौरव हासिल हो गया | उक्त चारों अंचल हिंदी भाषी थे इसलिए उनमें किसी भी तरह का विवाद नहीं हुआ | यद्यपि भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कुछ भिन्नताएं रहीं किन्तु समावेशी और शांत स्वभाव के कारण चारों के बीच भावनात्मक तौर पर सामन्जस्य और सद्भाव कायम रहा | देश के सबसे विशाल प्रान्त होने का गौरव भी उसे हासिल था | उसकी सीमा उ.प्र . बिहार , राजस्थान ,महाराष्ट्र , गुजरात , आंध्र और उड़ीसा से मिलती थीं | इस वजह से इस प्रदेश में इन सभी राज्यों के लोग आकर बसते गये और देश का दिल कहे जाने वाले इस प्रदेश ने उन सभी को खुले मन से स्वीकार करते हुए अपना बना लिया | यही वजह है कि म.प्र देश की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रतीक बन गया |  बाद में 1 नवम्बर 2000 को छत्तीसगढ़ के रूप में इसका एक हिस्सा अलग होकर नया राज्य बना जो खनिज संपदा सम्पन्न होने से आर्थिक  तौर पर काफी समृद्ध तो था ही , बिजली उत्पादन में अग्रणी होने के साथ ही धान के कटोरे के तौर पर उसकी प्रतिष्ठा थी | ऐसे अंचल के अलग होने के बाद ये आशंका व्यक्त की जाने लगी थी कि म.प्र बीमारू राज्य का कलंक शायद ही कभी धो सकेगा | हालाँकि अपनी विशाल वन संपदा , जल की प्रचुरता , उपजाऊ जमीन , सदा नीरा नदियाँ , खनिज उपलब्धता , धार्मिक और ऐतिहासिक  महत्व के केंद्र और राष्ट्रीय उद्यानों के कारण यहाँ विकास की असीम संभावनाएं रहीं किन्तु इच्छा शक्ति और विकासपरक सोच के अभाव के चलते म.प्र अति पिछड़े राज्य की श्रेणी में ही बना रहा | यहाँ की उपजाऊ धरती में सिर्फ अनाज ही नहीं अपितु राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिभाओं ने जन्म लिया | कला , साहित्य , शिक्षा , पत्रकारिता , राजनीति , खेल के अलावा भी ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसमें यहाँ जन्मी प्रतिभाओं ने अपने कौशल का परिचय न दिया हो | देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने क्रमशः स्व. डा. शंकर दयाल शर्मा और  भारत रत्न स्व. पं. अटल बिहारी वाजपेयी म.प्र की धरती के ही सपूत थे | यह प्रदेश विकास की अपार संभावनाओं के बाद भी  क्यों पिछड़ा  ये सवाल हर किसी के मन में उठता रहा | लेकिन धीरे – धीरे इसने अपनी क्षमताओं को पहिचाना और देखते – देखते ऊंची छलांगे लगते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सभी का ध्यान आकर्षित किया | परिणामस्वरूप बीमारू राज्य का दाग मिटाते हुए यह विकास के नए प्रतीक के तौर पर सामने आया | निवेशकों के लिये ये प्रमुख आकर्षण का केंद्र है | शिक्षा , चिकित्सा , पर्यटन के साथ ही  कृषि के क्षेत्र में बीते कुछ दशकों में जो प्रगति यहाँ हुई वह निश्चित रूप से संतुष्टि का भाव जगाने वाली है | लेकिन अभी वह मुकाम दूर है जहाँ म.प्र को होना चाहिए | अपने अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य और आधा दर्जन से ज्यादा संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों के कारण यहाँ पर्यटन की बेशुमार संभावनाएं हैं | देश के बीच में स्थित होने से आवागमन भी सुलभ है | रेल और सड़क मार्ग के अलावा वायु मार्ग से भी म.प्र. आना बेहद सरल है | औद्योगिक इकाइयों के लिए बिजली और पानी के अलावा पर्याप्त भूमि की उपलब्धता यहाँ विकास के नए अवसर प्रदान कर रही है | गेंहू के उत्पादन में म.प्र पंजाब और हरियाणा को टक्कर देने की स्थिति में है | राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के अंतर्गत प्रदेश की  व्यावसायिक राजधानी  इंदौर लगातार देश का सबसे स्वच्छ नगर बना हुआ है | इन सब कारणों से म.प्र विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहा है | यहाँ से गुजरने वाले राजमार्ग लोगों को आकर्षित करते हैं | खजुराहो . ओंकारेश्वर , महाकालेश्वर , अमरकंटक , भेडाघाट , सांची जहाँ धार्मिक पर्यटन को आकर्षित करते हैं वहीं पुरातात्विक महत्व के अनगिनत स्थान न सिर्फ सैलानियों वरन शोधकर्ताओं की रुचि का विषय हैं | वन्य जीवन को निकट से देखने के इच्छुक लोगों के लिए कान्हा , बांधवगढ़ , पेच , पन्ना के राष्ट्रीय उद्यान देश – विदेश में ख्याति अर्जित कर रहे हैं | अपनी स्थापना का 67 वां महोत्सव मनाते हुए म.प्र पूरे आत्मविश्वास से भरा हुआ है | यहाँ का माहौल तनावरहित है | कानून व्यवस्था की स्थिति तुलनात्मक दृष्टि से काफी बेहतर है | इसीलिये फिल्मों की शूटिंग के लिए यह फिल्म निर्माताओं की पसंद बनता जा रहा है | आज निश्चित रूप से खुशियों का दिन है | 67 वर्ष का कालखंड किसी प्रदेश के लिए आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त होता है | भले ही प्रारंभिक तौर पर कुछ दशक इस मामले में बेकार चले गये लेकिन अब यह विकास की राह पर पूरी गति से दौड़ रहा है | इसमें न केवल प्रतिस्पर्धा में भाग लेने आत्मबल पैदा हुआ है अपितु जीतने का जूनून भी नजर आने लगा है | हालाँकि राजनीति से ये भी अछूता नहीं है लेकिन अन्य राज्यों की अपेक्षा यहाँ कटुता नहीं है | इस वजह से यहाँ आने वाले भय मुक्त होकर अपना कार्य करते हैं | भाषा और क्षेत्रीय भावनाओं से  उत्पन्न होने वाले विवादों से ये सर्वथा परे है | बड़े अंचल में आदिवासी आबादी होने से यहाँ प्राचीन भारतीय समाज के प्रत्यक्ष अनुभव किये जा सकते हैं | कुल मिलाकर म.प्र एक विकासोन्मुखी राज्य के रूप में राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी छाप छोड़ते हुए मुख्यधारा से जुड़ा हुआ है | बीते कुछ सालों की उप्लब्धियाँ इसके सुनहरे भविष्य का संकेत हैं | उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के अमृत महोत्सव के सुखद संयोग के साथ प्रदेश का यह स्थापना दिवस सुनहरे भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 31 October 2022

मोरबी हादसा : लापरवाही की पुनरावृत्ति रोकने का तंत्र विकसित हो



गुजरात के मोरबी में मच्छू नदी पर बने 140 वर्ष पुराने केबल ब्रिज के टूट जाने से लगभग 150 लोगों की जान चली  गयी | नदी में अभी और शव होने की आशंका है | सैकड़ों लोग घायल हैं | बचाव कार्य जारी है | दुर्घटना का कारण पुल पर क्षमता से ज्यादा लोगों का होना बताया जा रहा है | इसको बीते 6 महीने तक मरम्मत के लिए बंद रखने के बाद चार दिन पहले ही  खोला गया था | दो करोड़ रु. खर्च कर सुधारे गये पुल पर अधिकतम 100 लोगों के जाने की स्वीकृति है लेकिन घटना के समय 500 की संख्या थी | जिस जगह दुर्घटना घटी वह पिकनिक स्थल है | रविवार  होने से भी ज्यादा भीड़ आई | 6 महीने बाद पुल के खोले जाने की वजह से भी लोगों में उत्साह था | पुल पर जाने हेतु 19 रु. टिकिट लगती है | पुल का संचालन करने वाले ठेकेदार ने क्षमता से अधिक टिकिट बेच डाले | कल ही वहां सरदार पटेल की प्रतिमा स्थापित होने के कार्यक्रम से सामान्य से अधिक जनता थी |  पुल प्रबंधन का ठेका जिस कम्पनी ने मोरबी नगर पालिका से मार्च 22 से आगामी 15 साल के लिए लिया है उसे पुल की सुरक्षा , साफ़ – सफाई , रखरखाव , स्टाफ रखने के साथ ही टिकिट लगाने का अधिकार है  | लेकिन 765 फीट लम्बे इस पुल को सुधार के बाद खोलने के पूर्व न तो तकनीकी अनापत्ति या फिटनेस प्रमाणपत्र लिया गया और न ही  उसकी भार क्षमता का प्रमाणीकरण  हुआ | इसीलिये  उक्त कम्पनी के विरुद्ध गैर इरादतन हत्या का प्रकरण दर्ज कर लिया गया | मृतकों और घायलों को  मुआवजा और सहायता राशि देने की घोषणा के साथ जाँच समिति भी गठित कर दी गई है जिसकी रिपोर्ट आने तक लोग इस दुर्घटना को भूल चुके होंगे | मृतकों के परिजन मुआवजे के साथ यदि आश्रित को सरकारी नौकरी मिल गयी तो ठन्डे होकर बैठ जायेंगे और जो घायल हैं वे मुफ्त इलाज के साथ मिलने वाली   सहायता राशि की लालच में अपना दर्द  उपेक्षित कर देंगे | स्थानीय प्रशासन जाँच के दौरान तरह – तरह के दबाव झेलेगा | जिस ठेकेदार की लापरवाही के कारण उक्त हादसा हुआ उसे भी निश्चित तौर पर शासन और प्रशासन में बैठे बड़े लोगों का संरक्षण प्राप्त रहा होगा जिससे  वह साफ बचकर निकल जायेगा | विचारणीय मुद्दा ये है कि ऐसे हादसे थोड़े – थोड़े अंतराल पर होते रहते  हैं | कभी किसी मंदिर में धक्का मुक्की के कारण लोग  मारे जाते हैं तो कभी अग्निशमन के इंतजाम न होने से बेशकीमती जानें चली जाती हैं | बिहार , असम और बंगाल में नावों में  ज्यादा सवारियां भर लेने के कारण  डूबने की घटनाएँ होती हैं | वहीं यात्री बसों में निर्धारित संख्या से अधिक लोगों को बिठाने के बाद  दुर्घटनाग्रस्त होने पर बाहर नहीं निकल पाने की वजह से बहुत सी मौतें होती हैं | इनमें से अधिकतर का कारण लापरवाही और अव्यवस्था ही होती है | यदि नियमों और अपेक्षित सावधानियों का पालन किया जावे तो इनसे काफ़ी हद तक बचा जा सकता है | उदाहरण के लिए गत दिवस मोरबी में जो पुल टूटा उसका प्रथम दृष्टया कारण क्षमता से पांच गुना ज्यादा लोगों का पुल पर होना बताया गया | पुल की चौड़ाई पांच फीट से भी कम होने से भीड़ ज्यादा होने पर और कुछ भी हो सकता था | प्रत्येक हादसे के बाद घिसापिटा सरकारी कर्मकांड होता है | राजनीति भी होने लगती है | कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगा दिया कि विधानसभा चुनाव के  मद्देनजर   उसने पुल को बिना पर्याप्त मरम्मत के ही खुलवा दिया | राहत कार्यों में भी श्रेय लेने की होड़ मचेगी | भ्रष्टाचार भी ऐसे मामलों में जरूरी तत्व होता ही है | यही वजह है कि दुर्घटना के कारणों पर पर्दा डालकर असली कसूरवारों को बचा लिया जाता है | जिस पुल पर दुर्घटना हुई उसका प्रबंधन भले ही किसी निजी कम्पनी के जिम्मे हो लेकिन स्थानीय प्रशासन और पुलिस का भी दायित्व था  कि वह भीड़ का अनुमान लगाकर समुचित निगरानी रखते | सरदार पटेल की मूर्ति का कार्यक्रम होने से वहां आम दिनों की अपेक्षा ज्यादा लोगों के आने की सम्भावना थी ही | उस अनुपात में वहां पुलिस बल होना चाहिए था ताकि पुल पर निश्चित संख्या से ज्यादा लोगों की मौजूदगी रोकी जा सकती | और यदि पुलिस के रहने के बाद भी पुल पर 100 की जगह 500 लोग जा पहुंचे तब तो ये लापरवाही का खुला सबूत है | ज़ाहिर है ये गैर इरादतन हत्या का मामला है लेकिन ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोके जाने का तंत्र विकसित न होना भी आपराधिक उदासीनता है | जो हुआ वह बेहद दर्दनाक और दुखद ही कहा जावेगा | जिन परिवारों के लोगों की मौत हुई उनके दुःख को पैसे या अन्य भौतिक लाभों से कम करना असंभव है | अनेक घायल लोग स्थायी रूप से दिव्यांग बनकर रह जाएँ तो आश्चर्य न होगा |  बुद्धिमत्ता इसी में है कि ऐसे हादसों को रोके जाने के प्रति गंभीरता बरती जावे | भीड़ हमारे देश की आम समस्या है | लेकिन उसका प्रबंधन ही समस्या का हल है | दशकों पहले प्रयागराज के कुम्भ में भगदड़ के कारण सैकड़ों  लोग कुचलकर मारे गये थे | उस हादसे से सबक लेकर कुम्भ का आयोजन बेहद पेशेवर तरीके से किया जाने लगा | ऐसी ही जिम्मेदारी बाकी आयोजनों में भी प्रदर्शित की जानी चाहिए | मोरबी का हादसा रोका जा सकता था यदि पुल पर  क्षमता से ज्यादा बोझ न होता | फ़िलहाल तो सभी  का ध्यान बचाव कार्य पर  है | लेकिन बाद में इस बारे में समग्र सोच के साथ आगे बढ़ना होगा | हादसे विकसित देशों में भी होते हैं | लेकिन वे उसकी पुनरावृत्ति रोकने के बारे में समुचित प्रबंध करने के साथ ही दोषियों को दण्डित करने में रहम नहीं करते | हमारे देश में भी यदि ऐसा होने लगे तो उनसे बचा जा सकता है | लेकिन उसके लिए दृढ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 October 2022

फेसबुक और ट्विटर जैसा हम अपना सोशल मीडिया क्यों नहीं बनाते



सोशल मीडिया के बेहद प्रभावशाली माध्यम ट्विटर को खरीदते ही धनकुबेर एलन मस्क ने उसके सी.ई.ओ पराग अग्रवाल और विधिक नीति प्रमुख विजया गड्डे को नौकरी से निकाल दिया | हालाँकि उनको  बतौर मुआवजा कई अरब रूपये प्राप्त होंगे | ट्विटर का सौदा अनेक महीनों से विवादों के घेरे में था | सुनने में आता रहा कि पराग इस सौदे में मस्क के लिए बाधक बने हुए थे | कारपोरेट जगत में इस तरह के अधिग्रहण मामूली बात है | उस दृष्टि से ट्विटर का मालिकाना बदलने के साथ ही दो शीर्षस्थ अधिकारियों का हटाया जाना आश्चर्यचकित नहीं करता किन्तु वे भारतीय मूल के हैं लिहाजा सोशल मीडिया में रूचि रखने वाले एक वर्ग ने इसका संज्ञान लेते हुए तरह – तरह से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की | वैसे भी बीते काफी समय से ट्विटर अनेक कारणों से चर्चाओं में बना हुआ है | मुख्य रूप से  विशिष्ट हस्तियों के फालोअरों की संख्या विवाद में रही है | देखने में आया है कि किसी चर्चित व्यक्ति के ट्विटर पर आते ही  रातों - रात उसके फालोअरों की संख्या लाखों में जा पहुँचती है | इसके अलावा फेसबुक और व्हाट्स एप की तरह ट्विटर पर भी बड़ी संख्या में फर्जी नामों की भरमार है जो विवादास्पद और आपत्त्तिजनक सामग्री प्रसारित करते हुए माहौल गंदा करने के साथ ही सौहार्द्र बिगाड़ने का काम करते हैं | ट्विटर के प्रभाव का प्रमाण ये है कि दुनिया के लगभग सभी चर्चित उद्योगपति , लेखक , पत्रकार इसके जरिये  अपने विचार प्रेषित करते हैं | फालोअरों की संख्या इनकी लोकप्रियता  का मापदंड मानी जाती  है और इसी को लेकर बड़े – बड़े खेल होते हैं | फिलहाल ट्विटर के शीर्ष पदों पर बैठे भारतीय मूल के पराग और विजया को हटाये जाने की खबर भारत में चर्चा का विषय बनी हुई है | ये भी  सुनने में आया है कि मस्क ने चीनी दबाव में आकर ये कदम उठाया है | लेकिन किसी भारतीय की ताजपोशी या उसे अपदस्थ किया जाना मुद्दा न होकर विचार इस बात का होना चाहिये कि 135 करोड़ की आबादी वाला देश जहां के इंजीनियर और तकनीशियन अमेरिका के साफ्टवेयर उद्योग की रीढ़ बन चुके हों , अपना स्वयं का सोशल मीडिया माध्यम क्यों नहीं बनाता ? हालाँकि इस कार्य में ढेर सारी तकनीकी , आर्थिक और कूटनीतिक बाधाएं भी आयेंगी किन्तु समय आ गया है जब हमें इस बारे में सोचते हुए कदम आगे बढ़ाने चाहिए | चूंकि अन्तरिक्ष विज्ञान में भारत ने काफी महारत हासिल कर ली है इसलिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाये तो वह दिन दूर नहीं जब गूगल जैसा हमारा अपना सर्च इंजिन हो सकता है | उपग्रह प्रक्षेपण की क्षमता होने के कारण हम अपना संचार माध्यम विकसित करने में समर्थ हैं | सबसे बड़ी बात ये है कि सोशल मीडिया के जितने भी  माध्यम हैं उनमें भारतीयों की मौजूदगी जबरदस्त है | यही वजह है कि गूगल और फेसबुक जैसे संस्थानों ने भारतीय मूल के लोगों को अपने शीर्ष पदों पर बिठाया | ये उसी तरह है कि अनेक विदेशी चैनलों ने भारत में आने के बाद हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओँ में समाचार और मनोरंजन से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित करना शुरू कर दिए | चुनावों में फेसबुक भारत के राजनीतिक दलों से जमकर पैसा बटोरकर उनके पक्ष में माहौल बनाने के लिए आलोचना भी झेल चुकी है | ट्विटर के मुकाबले कू नामक एक माध्यम भारत में शुरू भी हो चुका है जिसकी पहुँच और पकड़ धीरे – धीरे बढ़ती जा रही है | फेसबुक जैसा माध्यम भी यदि भारत में तैयार हो सके तो वह भी क्रांतिकारी साबित होगा | भारतीय मूल के लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं | उन्हीं के कारण हमारे देश की फ़िल्में वहां प्रदर्शित होती हैं | फिल्मी  सितारों , गायकों और संगीतकारों के कार्यक्रम भी अप्रवासी भारतीय आयोजित करते हैं | वहीं साधु – महात्मा भी प्रवचन देने जाने लगे हैं | इन सबकी वजह से भारतीय सामाजिक जीवन की झलक दुनिया के हर कोने में कमोबेश मिल जाती है | ये देखते हुए भारत अपने सोशल मीडिया माध्यम प्रारंभ करे तो इसमें कोई शक नहीं है कि करोड़ों लोग उससे जुड़ जायेंगे जिससे आर्थिक दृष्टि से भी वह लाभ का सौदा रहेगा | इस बारे में विचारणीय मुद्दा ये है कि अमेरिका ही संचार माध्यमों का चौधरी क्यों बनता है ? पाठकों को याद होगा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका से संचालित दो काल्पनिक चरित्रों को  विश्वव्यापी लोकप्रियता और विस्तार मिला | ये थे फैंटम जिसे मृत्युंजय और भूतनाथ जैसे नाम भी मिले | और दूसरा था जादूगर मेंड्रेक | धारावाहिक शैली में अख़बारों और पत्रिकाओं में इनकी कहानियां अनेक दशकों तक प्रकाशित्त होती रहीं | इसके माध्यम से अमेरिका ने अपने आपको वैश्विक शक्ति के रूप में पूरी दुनिया में स्थापित किया | इन आभासी  चरित्रों की सबसे रोचक बात  ये थी कि इनके मुख्य पात्र फैंटम और मेंड्रेक के सहयोगी अफ्रीकी  थे | इसके जरिये अमेरिका ने ये संदेश दिया कि वह गोरी – काली चमड़ी के आधार पर नस्लीय भेदभाव में विश्वास नहीं रखता | दुनिया के बाजार में पैठ बनाने में वह माध्यम मनोवैज्ञानिक रूप से काफी सफल रहा | ये भी देखने वाली बात है कि अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम के तौर पर लोकप्रिय माध्यम सिनेमा के सबसे बड़े केंद्र के रूप में अमेरिका में  लॉस एंजेल्स स्थित हॉलीवुड है | यहाँ दिए जाने वाले ऑस्कर अवार्ड को इस विधा में सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है | जब इन्टरनेट का आविष्कार हुआ तब बाकी देश समझ पाते  उसके पहले  ही अमेरिका ने उसे संचालित करने वाले समूचे तन्त्र को अपने नियन्त्रण में ले लिया | इसके जरिये सोशल मीडिया का विकास हुआ जिसका सहारा लेकर दुनिया भर से अरबों लोगों की निजी जानकारी अमेरिका के पास जा पहुँची जिसका उपयोग बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कारोबार के प्रसार हेतु करती हैं | ये सब देखते हुए इस बात की जरूरत महसूस होने लगी है कि भारत भी अपने सर्च इंजिन और सोशल मीडिया माध्यमों का विकास करने की दिशा में पहल करे |  सरकार के साथ देश के दिग्गज उद्योगपतियों को भी इस चुनौती को स्वीकार करना चाहिए | विश्व की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहे देश के पास अपना सोशल मीडिया माध्यम होना ही चाहिए क्योंकि इसका केवल सामाजिक और आर्थिक ही नहीं अपितु कूटनीतिक प्रभाव भी होता है |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 28 October 2022

अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री की मांग एक खतरनाक विचार



दीपावली के शोर में ये मुद्दा दबकर रह गया लेकिन भारत में भी अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री की मांग उठाना बेहद गैर जिम्मेदाराना सोच है | दुर्भाग्य ये है कि यह बात कांग्रेस नेता पी. चिदम्बरम और शशि थरूर जैसे उन नेताओं ने उछाली जो विश्व के सुप्रसिद्ध संस्थानों में उच्च शिक्षा प्राप्त हैं | दोनों के पास राजनीति के अलावा लम्बा पेशेवर अनुभव है और उनकी छवि बुद्धिजीवी की है | दरअसल ब्रिटेन में ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने की खबर आते ही समूचे भारत में स्वाभाविक रूप से खुशी का अनुभव किया गया | इसके प्रमुख कारणों में पहला उनकी पत्नी का भारतीय होना और दूसरा ब्रिटेन में जन्म लेने के बावजूद हिन्दू बने रहना | यद्यपि एक तबके ने ब्रिटिश लोकतंत्र की तारीफ के पुल बांधते हुए विदेशी मूल के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाये जाने को उसके उदारवाद का प्रतीक बताया | कुछ लोगों ने  सुनक के बहाने इस बात पर तंज भी  कसा कि ब्रिटेन ने एक विदेशी मूल के व्यक्ति को देश की सत्ता सौंपने में संकोच नहीं किया जबकि भारत में इसकी सम्भावना नजर आते ही आसमान सिर पर उठा लिया गया था | ज़ाहिर है निशाना 2004 में  सोनिया गांधी को  प्रधानमंत्री बनाये जाने के विरोध पर था | अमेरिका में कमला हैरिस के उपराष्ट्रपति बनने का जिक्र भी हुआ | लेकिन भारत में अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री बनाये जाने जैसा सुझाव ऐसे अवसर पर न सिर्फ अनावश्यक और अप्रत्याशित अपितु आपत्तिजनक भी कहा जाएगा | और इसीलिये बिना देर लगाये कांग्रेस की ओर से महामंत्री ( संचार  ) जयराम रमेश ने श्री चिदम्बरम और श्री  थरूर के बयान पर बिना नाम लिए टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत को किसी से सीखने के जरूरत नहीं है | हमारे देश में डा.जाकिर हुसैन , फखरुद्दीन अली अहमद और डा.अब्दुल कलाम के रूप में तीन मुस्लिम राष्ट्रपति और बरकतुल्ला खान तथा अब्दुल रहमान अंतुले मुख्यमंत्री रह चुके हैं | जब उनसे  संदर्भित बयान का समर्थन करने वाले विपक्ष के अन्य नेताओं के बारे में पूछा गया तब श्री रमेश ने टालते हुए कहा कि वे सिर्फ राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा पर बात करेंगे | चूंकि  श्री रमेश इन दिनों श्री गांधी के साथ यात्रा में  समाचार माध्यमों  से सम्पर्क का काम देख रहे हैं इसलिए ये मान लिया गया कि उनके द्वारा श्री चिदम्बरम और श्री थरूर के बयान से असहमति व्यक्त किया जाना एक तरह से कांग्रेस की अधिकृत प्रतिक्रिया थी | पार्टी के नये अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस बारे में मौन साधे रखा | ये भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में श्री चिदम्बरम के सांसद पुत्र कार्ति , श्री थरूर के चुनाव संयोजक थे | सही बात ये है कि भाजपा ने दोनों नेताओं के बयान पर जब ये कहते हुए हमलावर रुख अपनाया कि क्या कांग्रेस दस साल तक प्रधानमंत्री रहे डा.,मनमोहन सिंह को अल्पसंख्यक नहीं मानती तब पार्टी को लगा कि  देर की तो मामला उसके गले पड़ जाएगा और इसीलिये श्री रमेश के मार्फत फटाफट अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री वाले बयान से किनारा कर लिया गया | लेकिन तीर तो तरकश से निकल ही चुका था | कांग्रेस के दो वरिष्ट नेताओं के बयान का  जम्मू – कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा के अलावा सपा के विवादस्पद सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने भी खुलकर समर्थन कर डाला | ऐसे में कांग्रेस को लगा कि अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री का मुद्दा गुजरात और हिमाचल के चुनाव में उसके गले की फांस बन सकता है  | इसीलिए उसने उससे पल्ला झाड लिया लेकिन भाजपा ने मौके को लपकते हुए इसको मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़ दिया |  श्री चिदम्बरम और श्री थरूर के बयान के बाद श्री रमेश ने निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी को फजीहत से बचाने की कोशिश की लेकिन उनसे उनके बयान की जरूरत और मकसद के बारे में न पूछकर भाजपा को ये कहते रहने का अवसर दे दिया है कि कांग्रेस देश में मुस्लिम प्रधानमंत्री चाहती है | डा.मनमोहन सिंह को अल्पसंख्यक न मानने जैसा सवाल उठाकर भाजपा ने उक्त दोनों नेताओं को कठघरे में खड़ा करते हुए अप्रत्यक्ष तौर पर कांग्रेस को भी घेरने का दांव चला है | इसीलिये श्री रमेश को सामने करते हुए पार्टी ने नुकसान से बचने की कोशिश की | इस बारे में श्री चिदम्बरम और श्री थरूर जैसे नेताओं की समझ पर भी हंसी आती है | उनको इस बात का एहसास अच्छी तरह से है कि अल्पंख्यक  प्रधानमंत्री की मांग से अभिप्राय मुस्लिम ही होता है और भाजपा ऐसे किसी भी मुद्दे पर आक्रामक होने से नहीं चूकती | सवाल ये है कि उन दोनों ने अपनी पार्टी से ये मांग क्यों नहीं की कि वह आगामी लोकसभा चुनाव में किसी अल्पसंख्यक नेता को नरेंद्र मोदी की टक्कर में प्रधानमंत्री पद के  उम्मीदवार के रूप में पेश करे | दरअसल  ब्रिटेन में एक अल्पसंख्यक  के प्रधानमंत्री बनने पर भारत में भी वैसा ही किये जाने की मांग श्री मोदी पर छोड़ा गया तीर था लेकिन वह कांग्रेस की तरफ घूम गया | अब यदि कांग्रेस  ये मानती है कि श्री चिदम्बरम और श्री थरूर का बयान शरारतपूर्ण है तब उसे उन पर कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि उसकी वजह से देश के राजनीतिक माहौल में बेवजह ज़हर घोलने की कोशिश शुरू हो गयी है | प्रश्न ये भी है कि क्या कांग्रेस ने डा.जाकिर हुसैन और फखरुद्दीन अली अहमद को उनके मुसलमान होने के कारण राष्ट्रपति बनाया था ? और क्या डा. कलाम इसलिए समाज के हर तबके में लोकप्रिय हुए क्योंकि वे मुसलमान थे ?  ये भी विचारणीय है कि कहने को भले ही सिख , जैन और बौद्ध धार्मिक अल्पसंख्यक की श्रेणी में आते हों लेकिन वास्तविकता ये है कि भारत में केवल मुस्लिम और ईसाइयों को ही अल्पसंख्यक माना जाता है | और उस पर भी राजनीतिक तौर पर मुस्लिम समुदाय ज्यादा मुखर और आक्रामक है | इनके अलावा पारसी समुदाय  भी है जिसका भारत के आर्थिक विकास में बड़ा योगदान है लेकिन उसकी तरफ से कभी किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति नहीं हुई | ये देखते हुए कांग्रेस को चाहिए कि यदि वह श्री चिदम्बरम और श्री थरूर के बयान से असहमत है तो उसे इनके विरुद्ध कड़े कदम उठाने चाहिए अन्यथा ममता बैनर्जी ,  अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के अलावा  ओवैसी जैसे नेता समाज के माहौल में ज़हर घोलने में जुट जायेंगे |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 27 October 2022

सड़कें चमकदार ही नहीं टिकाऊ भी होनी चाहिए



राजतन्त्र के ज़माने में कुछ राजा भेस बदलकर प्रजा के हाल - चाल जानने के साथ ही ये पता लगाने की कोशिश भी किया करते थे कि वह उनके बारे में क्या राय रखती है ? कुछ शासकों के बारे में ये भी पढ़ने मिलता है कि वे रात में साधारण नागरिक बनकर घूमते हुए ये देखते थे कि उनके राज में कानून व्यवस्था चाक – चौबंद हैं या नहीं ? आशय ये कि बजाय महल में आराम की ज़िन्दगी गुजारने के वे जनता की तकलीफों का प्रत्यक्ष अवलोकन करते हुए इस बात की जाँच करते थे कि उनके मंत्री तथा अन्य दरबारी उन्हें जो जानकारी देते हैं वह सही है अथवा नहीं | शासक की लोकप्रियता केवल उसकी सम्पन्नता और सैन्यबल पर नहीं अपितु प्रजा के प्रति उसकी संवेदनशीलता और प्रशासनिक दक्षता पर निर्भर होती है | इसीलिये लोक कल्याणकारी राज्य के जो मापदंड सदियों पहले तय किये गए थे वे आज भी  प्रासंगिक हैं | ताजा सन्दर्भ म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा गत दिवस राजधानी भोपाल की अधिकतर सड़कों की खस्ता हालत पर व्यक्त की गयी नाराजगी है | इस साल हुई रिकॉर्ड तोड़ बरसात ने भोपाल की सड़कों के चीथड़े उड़ाकर रख दिए है | गड्ढे और धूल से राहगीर परेशान हैं | मुख्यमंत्री ने सम्बन्धित अमले को 15 दिनों का समय  देते हुए कहा है कि वे दोबारा जब निरीक्षण करें तब तक सड़कें चकाचक हो जानी चाहिए | खबर है प्रदेश के मुखिया की नाराजगी से सरकारी मशीनरी सक्रिय हो उठी है | आज भोपाल में लोक निर्माण विभाग और नगर निगम के अधिकारियों  की बड़ी बैठक में सड़कों को दुरस्त करने की कार्ययोजना बनाई जावेगी | इस बारे में ध्यान देने वाली बात ये है कि राजधानी चाहे देश की हो या प्रदेशों की , उनकी सड़कों तथा अन्य कार्यों की गुणवत्ता अन्य शहरों की अपेक्षा बेहतर होती है | राजधानी परियोजना के अंतर्गत अतिरिक्त धन भी आवंटित होता है | और फिर सरकार का मुख्यालय होने से सारे बड़े नेताओं और नौकरशाहों का   निवास राजधानी में होने से उसका रंग - रूप निखारने के प्रयास भी निरंतर चलते रहते हैं | उस दृष्टि से भोपाल दूसरे प्रदेशों की राजधानियों की तुलना में बेहद साफ़ - सुथरा और सुविधा - संपन्न है | लेकिन हाल में विदा हुए मानसून ने बीते अनेक दशकों का रिकॉर्ड तोड़कर रख दिया | जिससे सबसे ज्यादा नुकसान सड़कों को पहुंचा | मुख्यमंत्री ने  निरीक्षण के बाद जिस सख्त लहजे में प्रशासन को फटकारा उसका असर होना स्वाभाविक है | ये मान लेना गलत नहीं होगा कि भोपाल में बैठे नौकरशाह आज से ही मुख्यमंत्री के निर्देशों का पालन करने में दिन - रात एक कर देंगे और जो समय सीमा श्री चौहान ने तय की है उसके पहले ही राजधानी की सड़कों को गड्ढा मुक्त करते हुए चमका दिया जाएगा | किसी शासक का अपने प्रशासनिक अमले पर इतना दबदबा होना उसकी मजबूत पकड़ का प्रमाण है | वैसे भी श्री चौहान लम्बे समय से मुख्यमंत्री हैं इसलिए नौकरशाही को हांकने और हड़काने की महारत उनमें होना स्वाभाविक है | बीते एक साल से उनकी शैली काफी बदली हुई है जिसे कुछ लोग उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रेरित बताते हैं | लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि श्री चौहान जनता से सीधे जुड़ाव रखने की कला में बहुत अच्छी तरह पारंगत हैं | और इसीलिए उनसे ये अपेक्षा करना वाजिब है कि जो नाराजगी उन्होंने राजधानी की सड़कों को लेकर व्यक्त की वैसी ही वे पूरे प्रदेश के बारे में दिखाते हुए प्रशासन को हिदायत दें कि निर्धारित सीमा में हर जिले में युद्धस्तर पर सड़कों का सुधार कार्य किया जावे | इसके लिए अतिरिक्त धन का  आवंटन करने के अलावा ये भी ध्यान रखना होगा कि मुख्यमंत्री को खुश करने के फेर में केवल ऊपरी  रंग - रोगन न हो , अपितु टिकाऊ सड़कें बनाई  जावें | इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हर साल बरसात में पूरे प्रदेश की  सड़कें खराब हो जाती हैं | उनके सुधार हेतु नए बजट में धनराशि स्वीकृत होती है | काम शुरू होते - होते अप्रैल – मई का महीना आ जाता है और जून में नया मानसून आ धमकता है | इस प्रकार देखें तो आम जनता को आधे से ज्यादा साल खस्ता हाल सड़कों पर चलना होता है | जिन शहरों में स्मार्ट सिटी के नाम पर विकास कार्य हो रहे हैं उनकी दशा तो बहुत ही ख़राब है | म.प्र एक ज़माने में सड़कों के मामले में बेहद बदनाम था | दिग्विजय सिंह की सरकार के जाने के लिये खराब सड़कें भी बड़ा कारण थीं | हालाँकि भाजपा की सरकार के दौर में सड़कों की स्थिति में जबरदस्त सुधार हुआ लेकिन यहाँ के मौसम और जमीन को देखते हुए  जिस तरह की सड़कें बननी चाहिए उस ओर ध्यान न दिये जाने का दुष्परिणाम ये है कि करोड़ों रूपये की लागत से बनने वाली सड़क पहली बरसात में ही गड्ढों में बदल जाती है | इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नई – नई तकनीक विकसित होने के बावजूद म.प्र में टिकाऊ सड़कों का निर्माण न होना अनेकानेक सवाल खड़े करता है | इसलिए श्री चौहान को चाहिए कि जिस तरह उनके  राज में म.प्र कृषि में अग्रणी बन गया उसी तरह उन्हें  सड़कों के निर्माण में गुणवत्ता पर ध्यान  देना चाहिए | ये बात वाकई गौर तलब है कि जब राजधानी भोपाल की सड़कें बरसात नहीं झेल नहीं पाईं तब तहसील और कस्बों में क्या हालत होगी ? बेहतर हो श्री चौहान प्रशासन को सख्त हिदायत दें कि 15 दिन में सड़कों की दशा सुधारने के काम में गुणवत्ता का ध्यान न दिया तो दोषी अमले पर गाज गिरे बिना नहीं रहेगी | बीते काफ़ी समय से मुख्यमंत्री की कार्यशैली में काफी बदलाव आया है | इसके कारण उन्हें सिंघम  अवतार भी कहा जा रहा है | लेकिन इस तरह के विशेषणों से आत्ममुग्ध हुए बिना उनको चाहिये कि वे म.प्र की सड़कों को इस तरह का बनवाएं जिससे उन पर खर्च होने वाला जनता का धन सार्थक हो | बरसात में सड़क खराब न हो इसके लिए जो तकनीकी सलाह लेनी हो वह ली जानी चाहिए | आईआईटी जैसे संस्थान इस बारे में उपयोगी सलाह दे  सकते हैं | चुनाव वर्ष में श्री चौहान यदि प्रदेश को गुणवता युक्त  दे सड़कें दे सकें  तो यह उनके लिए बेहतर होगा क्योंकि अगले साल बरसात के तुरंत बाद उनको विधानसभा चुनाव लड़ना होगा और तब खस्ता हाल सड़कें झटका साबित हो सकती हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 October 2022

सुख – समृद्धि की कामना का अधिकार सभी को है



 दुनिया जब अर्थव्यवस्था के बारे में जानती भी नहीं थी तब से भारत में दीपावली का त्यौहार मनाया जा रहा है | कालान्तर में इसके साथ लगातार पौराणिक प्रसंग जुड़ते चले गए | न सिर्फ सनातन धर्म के अनुयायियों अपितु जैन , बौद्ध , सिख सभी इस पर्व पर हर्षोल्लास से भर उठते हैं | इस्लाम को मानने वाले कुछ व्यवसायी भी दीपावली अपने ढंग से मनाते हैं | ये कहना भी गलत न होगा कि दीपावली भारत का सबसे बड़ा लोक महोत्सव है | इसका प्रमाण ये है कि पूरे विश्व में फैले भारतवंशी इसका आयोजन पूरे उत्साह और उमंग से करते हैं | अब  तो अमेरिका , कैनेडा और ब्रिटेन तक में सरकारी तौर पर भी दीपावली पर जलसा होने लगा है | इसका कारण वहां भारतीयों की बढ़ती संख्या ही नहीं बल्कि शैक्षणिक , आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में भारतीय मूल के लोगों की प्रभावशाली उपस्थिति है | वैसे अन्य भारतीय तीज – त्यौहारों की तरह दीपावली भी कृषि आधारित पर्व ही है | वर्षा ऋतु की विदाई के बाद नई फसल आते ही आर्थिक और धार्मिक गतिविधियाँ शुरू होने के साथ शुरू हो जाता है शीतकाल  जिसमें रबी फसल की तैयारी होती है | इस प्रकार दीपावली न सिर्फ एक धार्मिक बल्कि व्यापारिक महत्त्व का अवसर भी है |  इसे दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक मेला भी कह सकते हैं |  भारत की अर्थव्यवस्था आज  भी कृषि आधारित है और  दीपावली भी उसी से जुडी हुई है | अच्छी फसल से समाज के हर वर्ग को  उत्साह के साथ ही भविष्य के आर्थिक नियोजन में  मदद मिलती है | जब फसल अच्छी आती है तब शादियाँ भी खूब होती हैं जिनकी वजह से बाजार में रौनक आती है | इसीलिए दीपावली पर होने वाले व्यापार को अर्थव्यवस्था का मापदंड मानते हुए वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत इसे वणिक ( व्यवसायी )  समुदाय का त्यौहार कहा जाता है | दीपावली पर धन -  धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की पूजा का महात्म्य भी इसी वजह से है | बावजूद इसके इस त्यौहार से जुड़ी परंपराओं में सामाजिक ढांचे का भी ध्यान रखा गया था | इसीलिए तमाम चमक – दमक के बावजूद मिट्टी का दिया और दीपावली एक दूसरे के पूरक हैं | आधुनिकता के साथ सजावट के अनेकानेक साधन विकसित होने पर भी धनकुबेरों से लेकर तो झोपड़ी में रहने वाला निर्धन भी दीपक के माध्यम से ही दीपावली मनाता है जिसके पीछे भी एक प्रतीकात्मक सोच रही है | दीपावली पर  चूंकि अमावश्या की रात होती है इसलिए दीपमालिका के माध्यम से ये प्रदर्शित किया जाता है  कि निराशा के माहौल में भी आशावान होना हमारा स्वभाव है | इस दृष्टि से यह अँधेरे में प्रकाश उत्पन्न करने रूपी पौरुष का प्रतीक पर्व है | लक्ष्मी की पूजा और आराधना  को केवल धन – संपत्ति की प्राप्ति से जोड़ना अधकचरापन है | सही मायनों में दीपावली श्रम और नैतिकता से अर्जित सम्पन्नता की प्रेरणा देती है | अमावस की अंधियारी रात को दीपों के माध्यम से आलोकित करने की परम्परा इस बात का द्योतक है कि हमारे आचरण में पारदर्शिता हो और हम ऐसा कुछ न करें जिसे छिपाने की जरूरत पड़े | इसके साथ ही ये पर्व हमारी सामाजिक व्यवस्था में निहित सामजंस्य के भाव और समतामूलक सोच का सर्वोत्तम उदाहरण है | इसीलिये भले ही यह लक्ष्मी जी को समर्पित है किन्तु सुख और समृद्धि की कामना करने का अधिकार सभी को है , ये इस त्यौहार का संदेश है | पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा के विपरीत भारतीय सामाजिक व्यवस्था ऊंच – नीच और वर्ग  संघर्ष जैसे दर्शन से अलग हटकर वर्ग समन्वय को पोषित करने  वाली है | इस अवसर पर रोजगारमूलक सामाजिक ढांचे का सर्वोत्तम स्वरूप उभरकर सामने आता है | धन के साथ धान्य शब्द का संगम सांकेतिक भाषा में बहुत कुछ कह जाता है | आधुनिकता के प्रसार के कारण माटी के दिए से लेकर साज - सज्जा के सामान से बढ़ते – बढ़ते बात इलेक्ट्रानिक सामान , कार , हीरे जवाहरात तक जा पहुंची हो लेकिन सहस्त्रों साल पहले जब मुद्रा बाजार ने जन्म नहीं लिया था और वस्तु विनिमय ही लेन - देन का माध्य्म था तब भी हमारे समाज में धातु में निवेश करने का चलन होने से  हर आय वर्ग का व्यक्ति अपनी हैसियत के अनुसार पीतल , ताम्बे , कांसे , चांदी या स्वर्ण की खरीद कर सुरक्षित निवेश करता था | बाजारवादी व्यवस्था ने यद्यपि काफी कुछ बदलकर रख दिया किन्तु धातु में निवेश की प्रवृत्ति के कारण ही हमारा देश कभी सोने की चिड़िया कहलाता था | 21 वीं सदी ने यद्यपि काफी कुछ बदल डाला लेकिन आज भी बचत और संयम का जो संस्कार  हमें विरासत में मिला उसने अनगिनत झंझावातों के बावजूद भारत को संगठित और सुरक्षित रखा | सदियों  की गुलामी भी हमारे सांस्कृतिक व्यवहार को नहीं बदल सकी तो उसका बड़ा कारण हमारी पर्व परम्परा है जो हमें जड़ों से जोड़े रखती है | दीपावली इस परम्परा का शिखर है | मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में हमारे देश की भूमिका की ओर पूरा विश्व निहार रहा है | आर्थिक मजबूती के साथ सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़ती आत्मनिर्भरता के कारण ही भारत दुनिया की बड़ी ताकतों की कतार में शामिल हो सका है | नई पीढ़ी ने ज्ञान – विज्ञान की हर विधा में अपनी प्रतिभा प्रमाणित की है | स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद की भविष्यवाणी के अनुरूप भारत विश्व का नेतृत्व करने के आत्मविश्वास से भरा हुआ है | हालाँकि राह में बाधाएं भी हैं किन्तु आज का भारत समस्याओं के समाधान के सामर्थ्य से भरपूर है | दीपावली इस आत्मविश्वास को और सुदृढ़ बनाने का पुनीत अवसर है | आइये , अपनी उन्नति के साथ ही हम अपने देश की समृद्धि हेतु भी प्रार्थना करें क्योंकि उसी के साथ हमारा भविष्य भी जुड़ा हुआ है |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 22 October 2022

वीआईपी संस्कृति का विरोध : बात निकली है तो फिर ....



दिल्ली स्थित देश के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा केंद्र एम्स (अ.भा आयुर्विज्ञान  संस्थान ) के चिकित्सकों ने सांसदों को अति विशिष्ट व्यक्ति मानकर उनके इलाज के लिए विशेष व्यवस्था किये जाने संबंधी परिपत्र का जिस जोरदारी से विरोध करते हुए प्रबंधन को उसे वापस लेने मजबूर किया वह शुभ संकेत है | उल्लेखनीय है एम्स के निदेशक द्वारा हाल ही में ये निर्देशित किया गया था कि किसी सांसद के वहां  आने पर एक विशेष अधिकारी  उनके इलाज और देखभाल में समन्वय स्थापित करेगा जो अस्पताल का चिकित्सक ही रहेगा | सांसद  को चिकित्सक के पास ले जाने का कार्य अस्पताल प्रबन्धक करेगा और उसके लिए लैंडलाइन और मोबाइल फोन अदि की व्यवस्था हर समय रहेगी |  यही नहीं इस व्यवस्था के अंतर्गत सांसद  द्वारा भेजे गये मरीज का इलाज भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाना था  | हालाँकि इस तरह की  व्यवस्था एम्स में अघोषित तौर पर पहले से ही लागू है | सही मायनों में इस अस्पताल की स्थापना देश की आजादी के बाद राजधानी में रहने वाले अति विशिष्ट लोगों की चिकित्सा हेतु ही की गई थी | उस समय निजी क्षेत्र के बड़े अस्पताल भी नहीं थे | कालान्तर में उक्त संस्थान अस्पताल के साथ ही चिकित्सा की शिक्षा और शोध का बड़ा केंद्र बन गया | यहाँ से शिक्षित होकर निकले चिकित्सक न सिर्फ देश अपितु विदेशों तक में अपनी सफलता के झंडे फाहरा रहे हैं } धीरे – धीरे न सिर्फ दिल्ली अपितु पूरे उत्तर भारत में एम्स सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र के तौर पर प्रसिद्ध हो गया | सरकारी होने से यहाँ का इलाज सस्ता तो है ही लेकिन उससे भी बढ़कर वह विदेशों के किसी भी नामी  अस्पताल से कम नहीं होने के कारण पड़ोसी देशों से भी मरीज यहाँ आने लगे | इस प्रकार एम्स में भीड़ बढती गई जिसकी वजह से अच्छा इलाज होने के बावजूद जल्द इलाज करवाने की समस्या होने लगी | और यहीं से आम और खास का फर्क शुरू हुआ जो बढ़ते – बढ़ते उस स्तर तक आ गया जिसके विरोध में वहां के चिकित्सकों ने आवाज बुलंद की | इसमें दो राय नहीं है कि एम्स में चिकित्सा और चिकित्सक दोनों उच्च कोटि के हैं | लेकिन बढ़ती आबादी के मद्देनजर अकेले दिल्ली में ही ऐसे कुछ और संस्थान खुल जाएँ तो भी कम पड़ेंगे | आश्चर्य की बात है कि इस दिशा में काफी देर से विचार शुरू हुआ और वाजपेयी सरकार के समय प्रदेश की राजधानियों में एम्स खोलने की योजना बनी जिसके परिणामस्वरूप  हर प्रदेश में एम्स के स्तर का चिकित्सा संस्थान प्रारम्भ हो सका | लेकिन दूसरी तरफ ये भी  सही है कि दिल्ली का एम्स आज भी चिकित्सा क्षेत्र का सिरमौर बना हुआ है | रही बात वीआईपी संस्कृति की तो ये समस्या केवल दिल्ली ही नहीं अपितु पूरे देश में है | सांसद तो खैर बड़ी बात हैं किन्तु शासन और प्रशासन में बैठा हर ओहदेदार चाहता है कि वह जब ऐसे संस्थान में  जाए तो बाअदब - बामुलाहिजा होशियार की पुकार लगे और समूची व्यवस्था उनकी सेवा में जुट जाए | एम्स से आई ताजा खबर ने इस बारे में सोचने की जरूरत एक बार फिर पैदा कर  दी है | बतौर जनप्रतिनिधि सांसद को कुछ तो सुविधा मिलनी ही चाहिए | इसी तरह उसके जरिये आये मरीज की मदद यदि हो सके तो वह भी स्वीकार्य है | लेकिन इसके कारण आम मरीज के इलाज में कमी न हो ये देखने वाली बात है | इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि आम जनता की परेशानी या नाराजगी इस बात पर नहीं है कि किसी को विशेष  सुविधा मिले | उसे कोफ़्त तब होती है जब उसकी उपेक्षा कर किसी को महज इसलिए महत्व दिया जाता है कि वह मंत्री , सांसद , विधायक या कोई बड़ा नेता या सरकारी साहब है | और फिर किसी चिकित्सक को वीआईपी की सेवा में बतौर शिष्टाचार अधिकारी तैनात करना भी  अनुचित प्रतीत  होता है | एम्स , दिल्ली में न सिर्फ सांसदों अपितु राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री सहित अन्य अति विशिष्ट जनों का इलाज होता रहा है  | शायद यही कारण है कि आम जनता को भी इस  संस्थान की गुणवत्ता में विश्वास है | यह विश्वास बना रहे इसके लिये जरूरी है उसके इलाज को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जावे | इस बारे में ये भी गौर तलब है कि कोरोना संकट के बाद रेलवे द्वारा वरिष्ट नागरिकों आदि को मिलने वाली रियायतें बंद किये जाने के कारण आम जनता में ये मुद्दा अक्सर जनचर्चा में आता रहा है कि सांसदों की पेंशन और मुफ्त यात्राएँ बंद क्यों नहीं की जातीं ? इस तरह के और भी  सवाल उठते  रहते हैं जिनकी वजह से जनप्रतिनिधियों के प्रति ईर्ष्या और गुस्सा पैदा होता है | एम्स प्रबंधन ने अपने संदर्भित परिपत्र को वापिस लेकर बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया | भले ही सांसदों को मिल रही विशेष सुविधाएँ और वीआईपी व्यवहार पूर्ववत रहेगा लेकिन इस घटना के बाद सांसदों के मन में भी ये भावना जन्म ले सकती है कि उनको मिलने वाली प्राथमिकता अब जनता ही नहीं अपितु उन चिकित्सकों की नाराजगी का कारण भी बनने लगी है जिन्हें उनका इलाज करने का दायित्व सौंपा जाता है | बहरहाल एम्स से शुरू हुई ये मुहिम देश भर में फैलना चाहिए क्योंकि वीआईपी संस्कृति ने समाज में वर्गभेद पैदा कर  दिया है | यद्यपि अनेक नेता और अधिकारी बेहद सरल स्वभाव के होने के कारण अपने रुतबे के बेहूदे प्रदर्शन से दूर रहते हैं लेकिन उनके साथ चिपके लोग अपने आप को किसी सामंत से कम नहीं समझते | एम्स के चिकित्सकों का विरोध और प्रबंधन का कदम पीछे खींच लेना निश्चित रूप से एक बड़ा संकेत है वीआईपी संस्कृति के विरुद्ध उठ रही भावनाओं के सतह पर आने का | जिन लोगों को लोकतंत्रिक व्यवस्था में भी शासक वर्ग जैसी सुविधा और अधिकार मिले हुए हैं उनको एम्स की घटना से सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि बात निकली है तो दूर तलक जायेगी |

-रवीन्द्र वाजपेयी