Thursday, 2 March 2023

म.प्र का बजट : चुनाव पर नजर , नहीं लगा नया कर




बजट चाहे केंद्र का हो या राज्य का उस पर दो प्रतिकियाएँ एक जैसी आती हैं | मसलन सत्ता पक्ष के लिए बजट समाज के सभी वर्गों के लिए हितकारी होता है जबकि विपक्ष की नजर में  जन विरोधी और आश्वासनों का झुनझुना | गत दिवस म.प्र की शिवराज सरकार ने इस कार्यकाल का जो अंतिम बजट विधानसभा में पेश किया उसे लेकर भी ऐसी ही  बातें सुनी जा सकती हैं | प्रदेश भर से जो भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं  वे भी राजनीतिक ध्रुवीकरण से प्रेरित हैं | एक वर्ग को बजट धरती पर स्वर्ग उतार लाने वाला लग रहा है  तो दूसरे  को आसमानी ख्वाब दिखाने वाला खोखला दस्तावेज | पहली बार डिजिटल तरीके से प्रस्तुत बजट में आने वाले विधानसभा चुनाव  की तैयारी साफ़ झलकती है | बजट के पहले ही लाड़ली बहना योजना के अंतर्गत महिलाओं को 1 हजार रु. प्रतिमाह देने के घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आधी आबादी को भाजपा के पक्ष में मोड़ने का जो ब्रह्मास्त्र चला उससे कांग्रेस किस हद तक चिंतित है इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उसके प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने सत्ता में आने पर इस राशि को 1500 रु. प्रतिमाह करने का वायदा उछाल दिया | लाड़ली लक्ष्मी योजना पहले से ही श्री चौहान की मामा छवि को लोकप्रिय बनाये हुए है | बजट में 12 वीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी  प्राप्त  करने वाली छात्राओं को ई स्कूटी देने का प्रस्ताव भी जबरदस्त चुनावी दांव है क्योंकि इनमें से ज्यादातर छात्राएं चुनाव तक मतदाता बन जायेंगी | ऐसा न होने पर भी कम से कम उनके परिजन तो भाजपा का समर्थन करेंगे ऐसा माना जा सकता है | बजट में किसानों के कर्ज  का ब्याज सरकार द्वारा भरे जाने का प्रावधान भी इस  समुदाय को लुभाने का प्रयास है | प्रदेश में सड़कों , फ्लायओवर , पुल सहित प्रतिभा विकास केंद्र खोलने जैसे निर्णयों के साथ ही 1 लाख नौकरियां देने का वायदा भी है | हालाँकि म.प्र की  वित्तीय  स्थिति अच्छी होने का दावा करने के बावजूद राज्य सरकार पेट्रोल और डीजल पर वैट घटाने का साहस नहीं कर पा रही | इसी तरह  सरकारी कर्मचारियों को भत्ता देने के मामले में उदारता बरतने के बावजूद पुरानी पेंशन योजना के बारे में चूंकि भाजपा की केन्द्रीय नीति अनुमति नहीं देती इसलिए म.प्र में उसका आश्वासन दिए जाने से वह बची | लेकिन कांग्रेस ने हिमाचल में इस हथियार का चूंकि सफल प्रयोग किया और छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में उसे लागू भी कर दिया इसलिए म.प्र के चुनाव में भी वह  इस कार्ड को चलेगी | यही देखते हुए शिवराज सरकार ने बजट में महिलाओं और पहली  बार मतदान करने वाली युवतियों को लुभाने का प्रयास किया है | ये भी  सुनने में आया है कि भाजपा ने अपने संगठन के जरिये महिलाओं को प्रति माह दिए जाने वाले 1 हजार रु. के अनुदान हेतु आवेदन पत्र भरवाना ही शुरू कर दिया है | इसी तरह 12 वीं के परीक्षाफल भी चुनाव के काफी पहले आ जायेंगे जिसमें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण छात्राओं  को ई स्कूटी देने का कार्यक्रम भी सम्पन्न करवा लिया जावेगा | जहां तक सवाल नई नौकरियों का है तो यदि राज्य सरकार चुनाव आचार संहिता लागू होने के पहले नियुक्ति पत्र जारी कर सकी तब तो यह भाजपा के लिए तुरुप का पत्ता साबित होगा अन्यथा इसका नुकसान भी हो सकता है | इसमें दो राय नहीं कि प्रदेश में सड़कों और बिजली की स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन पेय जल का संकट अनेक हिस्सों में समस्या बना हुआ है | केंद्र सरकार की अटल जल योजना पर काम हो तो रहा है लेकिन रफ़्तार बहुत धीमी है | वैसे एक बात की तारीफ़ तो की ही जायेगी कि इस बजट में वित्त मंत्री ने नया कर लगाने से परहेज किया | जिससे ये आशंका बढ़ गयी है कि सरकार को और कर्ज लेना पड़ेगा जो रिजर्व बैंक द्वारा स्वीकृत सीमा से थोड़ा सा ही कम है | राज्य के मेडीकल कालेजों में एमबीबीएस और  एमडी / एमएस की सीटें बढ़ाये जाने का प्रस्ताव अच्छा है | लेकिन नये मेडिकल कालेजों में शिक्षकों की कमी चिंता का विषय बनी रहेगी | वैसे भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट में और ध्यान दिए जाने की अपेक्षा है | बावजूद इस सबके चुनावी साल में ऐसे ही बजट की उम्मीद की जा सकती थी | वित्तमंत्री ने दरियादिली दिखाई जरूर लेकिन हाथ भी खींचकर रखा जिससे पता चलता है सरकार उदारता के बावजूद खजाना लुटाने का साहस नहीं दिखा पाई | हालाँकि आजकल बजट अर्थशास्त्र की बजाय राजनीति शास्त्र से प्रेरित और प्रभावित होते हैं | इसलिए सरकार किसी की भी हो वह वित्तीय स्थिति की बजाय सियासी गुणा - भाग  पर ज्यादा ध्यान देती है | ऐसे में  हो सकता है पेट्रोल – डीजल सस्ता करने का फैसला चुनाव के पहले किया जावे | ये भी सुनने में आ रहा है कि केंद्र सरकार तीन पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम देखने के बाद कर्नाटक , छत्तीसगढ़ , राजस्थान और म.प्र के मुकाबले की दृष्टि से पेट्रोल और डीजल सस्ता करने का फैसला ले सकती है  जिसके परिप्रेक्ष्य में राज्यों को भी वैट घटाना होगा | ये भी हो सकता है कि पेट्रोल, डीजल  को भी जीएसटी के तहत लाकर उनकी कीमतें घटाकर विपक्ष को पटकनी दे दी जाए | यही सोचकर शायद मुख्यमंत्री श्री चौहान की सरकार  ने बजट में इन चीजों के बारे में किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी | बहरहाल ये बजट चूंकि  चुनाव को  देखते हुए बनाया गया है इसलिए अपने मकसद में सफल नजर आता है |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 1 March 2023

सिसौदिया दोषी निकले तो केजरीवाल भी नहीं बचने वाले



मनीष सिसौदिया को जमानत मिलेगी या वे लम्बे समय तक  सीबीआई की गिरफ्त में रहेंगे ये सवाल फ़िलहाल अनिश्चितता के घेरे में है | दिल्ली के  घटनाक्रम  पर नजर रख रहे राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सीबीआई ने श्री सिसौदिया के विरुद्ध काफ़ी दस्तावेज जुटाए हैं और ये भी कि अभी उन पर ईडी द्वारा भी शिकंजा कसा  जायेगा | गत दिवस जैसे ही सर्वोच्च न्यायालय ने  जमानत देने से इंकार करते हुए उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी उसके बाद ही देर शाम उपमुख्यमंत्री के साथ ही बीते 9 महीनों से जेल में बंद मंत्री सत्येन्द्र जैन का इस्तीफा स्वीकार किये जाने की खबर आ गई | कहा जा रहा है कि दोनों ही इस्तीफे मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के पास पहले से ही रखे थे  | ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक  रूप से उठ खड़ा हुआ कि गत वर्ष 30 मई को गिरफ्तार किये गए मंत्री श्री जैन से त्यागपत्र अब तक क्यों नहीं  दिलवाया गया जबकि  श्री सिसौदिया को गिरफ्तारी के दो दिन बाद ही मंत्री पद  छोड़ना पड़ गया | इसके पीछे जो कारण बताया जा रहा है वह ये कि श्री जैन के पास जो विभाग थे वे भी श्री सिसौदिया को दिए जाने के बाद वे 18 विभागों को  देख रहे थे | उनके गिरफ्तार होने के बाद केजरीवाल मंत्रीमंडल में केवल 4 सदस्य बचे जिससे सरकार का कार्य प्रभावित होने लगा | नियमानुसार केवल 6 मंत्री ही हो सकते हैं | ऐसे में त्यागपत्र देने वाले मंत्रियों की जगह दो नए मंत्री बनाकर काम चलाया जायेगा | लेकिन इस सबके कारण न  सिर्फ मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल बल्कि आम आदमी पार्टी की साख को भी बड़ा धक्का लगा है | कहाँ तो पंजाब में सरकार बनाने के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर अपने पैर जमाने की कार्ययोजना पर आगे बढ़ रही थी और कहाँ दिल्ली और पंजाब दोनों में उसकी  साख और क्षमता सवालों के घेरे में आ गयी  है | भ्रष्टाचार के विरूद्ध अन्ना  हजारे के लोकपाल आन्दोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी का उदय जिस शानदार अंदाज में हुआ वह किसी आश्चर्य से कम न था | 2014 की मोदी लहर को महज एक साल के भीतर केजरीवाल के करिश्मे ने रोका वह मामूली बात नहीं थी | हालाँकि  नगर निगम चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में वह कुछ ख़ास न कर पाई लेकिन उसके बाद विधानसभा चुनाव और हाल ही में हुए नगर निगम के चुनाव में मिली जीत ने  दिल्ली को आम आदमी पार्टी का अभेद्य दुर्ग बना दिया | लेकिन ये बात भी सही है कि भ्रष्टाचार के आरोप लगातार केजरीवाल सरकार पर लगते रहे | उसी के साथ अब पंजाब सरकार के राज में जिस तरह से खालिस्तान समर्थक उग्रवादी तत्व सिर उठाने लगे हैं  उससे भी पार्टी की छवि और क्षमता पर संदेह बढ़ने लगा है | राजनीति के जानकारों के अनुसार श्री केजरीवाल राष्ट्रीय नेता बनने की जल्दबाजी  में वही सब करने पर मजबूर हो गये हैं जो अन्य राजनीतिक दल करते  हैं | इसी वजह से पार्टी  के संस्थापकों में से  अनेक उनका साथ छोडकर जा चुके हैं | केवल श्री सिसौदिया ही एक चेहरा हैं जो उनके विकल्प कहें या विश्वासपात्र के रूप में जाने जाते थे और बतौर शिक्षा मंत्री उन्होंने दिल्ली में सरकारी  शालाओं का जिस तरह से गुणवत्तापूर्ण उन्नयन किया उसकी देश के बाहर भी प्रशंसा हुई | मुख्यमंत्री एवं संजय सिंह जैसे नेताओं की तुलना में मनीष काफी शांत नजर आते हैं | ऐसे में सवाल है कि अपने पास कोई मंत्रालय न रखने का जो निर्णय श्री केजरीवाल ने लिया  उसके पीछे शायद  अपनी छवि बनाये रखते हुए मुसीबत आने पर अपने साथियों की बलि चढ़ा देने की सोच ही रही होगी | आम आदमी पार्टी को महीनों से  ये अंदेशा था कि सीबीआई उपमुख्यमंत्री के गिरेबान पर हाथ डालेगी | खुद मनीष भी इस बात को सार्वजानिक तौर पर कह चुके थे | जिस आबकारी नीति को लेकर ये बवाल हुआ यदि वह सही थी तब केजरीवाल सरकार  ने उसे वापिस क्यों लिया इस प्रश्न का कोई जवाब न दिया जाना सरकार के अपराध बोध का ही परिचायक था | आम आदमी पार्टी को श्री  सिसौदिया की गिरफ्तारी पर यूँ तो विपक्षी दलों की तरफ से जोरदार  समर्थन मिला लेकिन कांग्रेस इस मामले में भी दुविधा का शिकार होकर विभाजित हो गयी | राहुल गांधी तो लंदन में हैं किन्तु अशोक गहलोत , शशि थरूर ने जहां  केंद्र सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाया वहीं दिल्ली की अलका लाम्बा और अजय माकन ने इसे भ्रष्टाचार का मामला बताते हुए आम आदमी पार्टी की तीखी आलोचना कर डाली | इस मामले के बाद अरविन्द केजरीवाल की एकला चलो नीति को भी धक्का लग सकता है और बड़ी बात नहीं उनको अपनी ईमानदारी का अहंकार छोड़कर उन्हीं दलों और नेताओं के साथ गठबंधन करना पड़ जाए जो उनके द्वारा जारी भ्रष्ट नेताओं की सूची में शामिल थे | बहरहाल आम आदमी पार्टी और मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल के लिए मौजूदा स्थिति बहुत ही कठिन है | यदि मनीष भी सत्येन्द्र की तरह लम्बे समय तक हिरासत में रहे तब इस्तीफ़े का दबाव अरविन्द पर भी पड़ेगा | दिल्ली में ये चर्चा भी है कि मुख्यमंत्री स्वयं श्री सिसौदिया से छुटकारा पाना चाहते थे | सच्चाई जो भी हो लेकिन इस घटनाचक्र से  मुख्यमंत्री चाहकर भी  भी पाक - साफ़ नहीं निकल सकेंगे क्योंकि श्री सिसौदिया ने भ्रष्टाचार किया हो और श्री केजरीवाल को उसका पता न चले ये कोई नहीं मानेगा | और ऐसे में यदि सीबीआई के आरोप सही प्रमाणित  हो गये तब आम आदमी पार्टी के लिए वह डूब मरने वाली बात होगी | इससे ये विश्वास और प्रबल हो जाएगा कि आन्दोलन से निकली पार्टियाँ आख़िरकार अपने ही अंतर्विरोधों में फंसकर पतन के रास्ते पर चली जाती हैं | वैसे अब तक अन्ना  हजारे का मौन रहना भी चौंकाने वाला है |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 28 February 2023

मार्च में लू के खतरे के बाद भी न सुधरे तो ......



बसंत को भारतीय काल गणना में ऋतुराज कहा जाता है | इस ऋतु में मौसम बड़ा ही सुहावना रहता है | न ज्यादा सर्दी और न ही सूरज की तपन | बसन्ती बयार शीत ऋतु के प्रस्थान का सन्देश देती है | लेकिन बीते कुछ सालों से देखा जा रहा है कि सर्दियाँ खत्म होने के तत्काल बाद मौसम एकदम गर्म हो जाता है | गत वर्ष भी ऐसा ही देखने मिला था जिसके कारण खेतों में कटाई के लिए खड़े  गेंहू पर बुरा असर पड़ा | विशेष रूप से उन इलाकों में जहां शीतकालीन वर्षा  नहीं हुई या कम हुई | इस साल भी जब रेकॉर्ड उत्पादन के समाचार से किसानों  के साथ पूरा देश खुश था तभी अचानक फरवरी के तीसरे सप्ताह से ही मौसम ने ऐसी करवट ली कि बसंत के दौरान ही ग्रीष्म का एहसास होने लगा | फरवरी में उत्तर भारत के बड़े इलाके में पारे का 35 डिग्री तक जा पहुंचना भविष्य में आने वाले बड़े खतरों का संकेत है | मौसम वैज्ञानिकों ने पहले इस बात के लिए डराया था कि इस बार ठण्ड ज्यादा पड़ेगी और देर तक चलेगी | इसका आशय ये था कि मार्च के अंत तक सर्दी बनी रहेगी | लेकिन उस अनुमान के सर्वथा विपरीत अब ये कहा जा रहा है कि मार्च के मध्य से ही पारा उछलकर 40 डिग्री तक जाने लगेगा और तो और लू के रूप में गर्म हवा के थपेड़े सहने पड़ेंगे | यदि ऐसा हुआ तब ये निश्चित रूप से ऋतु चक्र में आ रहे बदलाव का जीवंत प्रमाण होगा जिसके खतरे को भांपकर बचाव के बारे में सोचना भावी पीढ़ी के हितों को देखते हुए अनिवार्य हो गया है  | उत्तर और पूर्वी भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली नदियों का स्रोत जिन हिमशैलों में है वे भी साल दर साल सिकुड़ते जा रहे हैं | इस सबका कारण पृथ्वी के तापमान में  हो रही वृद्धि है | हालाँकि सारी दुनिया इसे लेकर चिंतित है और ग्लोबल वार्मिंग के विरुद्ध सामूहिक प्रयास हेतु 2030 तक कोयले का उपयोग  बंद करने तथा कुछ अन्य उपायों से तापमान नियंत्रित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संधि  भी हुई किन्तु कोरोना के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर आये संकट की वजह से  अनेक विकसित देशों ने उससे किनारा करने के संकेत दे दिए | एक साल पहले शुरू हुए यूक्रेन और रूस के युद्ध ने समूचे यूरोप को सर्दियों के दौरान  गैस के अभाव में जो तकलीफ़ें उठानी पड़ीं उससे तो लगता है आग तापने के लिए लकड़ी जलाने के परम्परागत तरीके फिर से लौट आयेंगे | सवाल और भी हैं जिनमें प्रकृति और पर्यावरण के लिए उपस्थित खतरों के प्रति चिंता तो प्रकट होती है लेकिन विकास की अंधी दौड़ और सुविधा भोगी जीवन की चाहत में उनको दूर करने के बारे में कोई नहीं सोचता | हाल ही में देवभूमि कहे जाने वाले गढ़वाल के जोशीमठ कस्बे में जमीन धसने से जो नुकसान हुआ उसके असली कारणों को दूर करने के बजाय अस्थायी सोच से ही काम चलाया जा रहा है | जिस भ्रष्ट प्रशासन ने जोशीमठ में बड़े – बड़े होटलों के  निर्माण की  अनुमति दी वही उनको गिरवाकर अपनी कर्तव्यपरायणता का परिचय दे रहा है | लेकिन जब पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले लोगों ने भूस्खलन के बारे में आगाह करना शुरू किया तब उस पर ध्यान नहीं दिया गया | जोशीमठ के बाद उत्तराखंड के  कुमाऊँ अंचल में भी जमीन धसने की घटनाएँ हुईं | यहाँ तक कि जम्मू के निकट कुछ पहाड़ी इलाकों में भी वैसी ही भूगर्भीय हलचल महसूस होने से ये बात सामने आई कि खतरा  क्षेत्र विशेष तक सीमित न होकर  समूचे हिमालय में व्याप्त है | इसी तरह की अन्य प्राकृतिक आपदाएं समय – समय पर हमें चेतावनी देती रही हैं | लेकिन उनकी  अनदेखी किये जाने का नतीजा ही ऋतु परिवर्तन के रूप में सामने आ रहा है | इस बारे में ये समझना होगा कि प्रकृति एक समन्वित व्यवस्था है जिससे  जल , जंगल और  जमीन सभी  जुड़े हैं | एक भी अपनी भूमिका से अलग व्यवहार करने लगे तो उसका दुष्प्रभाव बाकी पर पड़े बिना नहीं रहेगा | लेकिन हमने  प्रकृति को टुकड़ों में बांटकर अपने उत्थान की जो जुर्रत की  उसी के कारण फरवरी में गर्मी और मार्च में लू चलने जैसी स्थिति का सामना करने की बाध्यता हमारे सामने है | इस संकट  के लिए समूचा समाज जिम्मेदार है क्योंकि जो जिस भूमिका में है उसने प्रकृति और पर्यवरण पर अत्याचार करने में संकोच किया होता तो आज ये नौबत न आई होती | हालाँकि बहुत कुछ तो बिगड़ चुका है लेकिन अब भी यदि हम नहीं चेते  और अपने पूर्वजों से मिले संस्कारों के अनुरूप अपनी सुविधाओं पर नियंत्रण रखकर  पर्यावरण के संरक्षण और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं करते तब ये मान लेना चाहिए कि कुछ साल बाद जनवरी में भी गर्मी सताये बिना नहीं  रहेगी , जिसके जिम्मेदार हम ही होंगे |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 27 February 2023

खुद को भाजपा का विकल्प साबित करने पर रहेगा कांग्रेस का फोकस



रायपुर में कांग्रेस के 85 वें अधिवेशन  में राजनीतिक , आर्थिक और अन्य प्रस्ताव पारित हुए। अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित अनेक नेताओं ने वर्तमान परिदृश्य पर विचार व्यक्त किए। लेकिन  पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और  राहुल गांधी के भाषण पर सबकी निगाहें लगी थीं। इसके पीछे भी कारण ये था कि पार्टी लंबे समय से अनिश्चितता में फंसी थी। 2019 में नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद राहुल ने अध्यक्ष पद त्याग तो दिया किंतु गांधी परिवार ने  कमान अपने पास ही रखी और श्रीमती गांधी कार्यकारी अध्यक्ष बन गईं। हालांकि राहुल लगातार दोहराते रहे कि  परिवार का कोई सदस्य उक्त पद पर नहीं बैठेगा। लेकिन  संगठन पर पूरा नियंत्रण उसी का बना रहा। उस दौरान कांग्रेस को अनेक राज्यों  के चुनावों में  मुंह की खानी पड़ी । पंजाब उसके हाथ से निकल गया। प.बंगाल में तो उसका सफ़ाया हो गया। उत्तराखंड और गोवा में भी निराशा हाथ लगी। पंजाब में तो पार्टी  विभाजित हो गई और वही कहानी राजस्थान में दोहराए जाने के हालात हैं। जहां गांधी परिवार के विश्वस्त अशोक गहलोत ने हाईकमान को अंगूठा दिखाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से इंकार करते हुए राज्य की सत्ता न छोड़ने का ऐलान कर दिया। गहलोत समर्थक विधायकों ने  सामूहिक  त्यागपत्र देकर सरकार गिराने तक की स्थिति बना दी और हाइकमान असहाय बना रहा। लेकिन इसके पहले से ही पार्टी में असंतोष के स्वर उठने लगे थे। जी 23 नामक समूह ने  अध्यक्ष सहित कांग्रेस वर्किंग कमेटी के चुनाव हेतु पत्र लिखकर उसे सार्वजनिक भी कर दिया । बिना किसी का नाम लिए परिवारवाद के विरुद्ध टिप्पणियां होने लगीं। जाहिर था  राहुल की विफलताओं के मद्देनजर जी 23 ने ऊर्जावान नेतृत्व को आगे बढ़ाने का अभियान छेड़ा। लेकिन असफलता हाथ लगने पर उनमें से अनेक पार्टी छोड़कर चलते बने। कैप्टन अमरिंदर सिंह , सुनील  जाखड़ , गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल , आरपीएन सिंह वे नाम हैं जो बीते दो साल में पार्टी छोड़ बैठे। गुजरात में हार्दिक पटेल भी उसी कतार में शामिल हो गए । इससे निपटने के लिए गांधी परिवार ने पार्टी अध्यक्ष के  चुनाव का ऐलान और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा जैसे दो कदम उठाए। पहले का मकसद असंतुष्टों को ये बताना था कि उसकी संगठन पर काबिज रहने की मंशा नहीं है। लेकिन जब श्री गहलोत पीछे हटे तो श्री खरगे पर दांव लगा दिया गया। उधर राहुल यात्रा पर निकल पड़े ये दर्शाने के लिए मानो वे पूरी तरह निर्लिप्त हों। हालांकि श्रीमती गांधी के श्री खरगे के साथ खड़े हो जाने से पूरी पार्टी को ये संदेश दे दिया गया कि प्रथम परिवार उनके साथ है। इसीलिए  शशि थरूर  बड़े  अंतर से हारे क्योंकि वे जी 23 समूह का हिस्सा थे। उसके बाद योजनाबद्ध तरीके से पूरा फोकस राहुल की यात्रा पर केंद्रित किया गया और इसीलिए यात्रा की चर्चा और प्रभाव कम होने के पहले ही अधिवेशन का आयोजन भी किया गया। जिसमें श्रीमती गांधी ने यात्रा को टर्निंग प्वाइंट बताकर ये जता दिया कि कांग्रेस को विजय पथ पर ले जाने की क्षमता उनके बेटे में ही है और उसे ये दायित्व देकर वे कार्यमुक्त हो रही हैं। भाषण प्रियंका का भी हुआ किंतु  केंद्र बिंदु राहुल रहे। उन्होंने वैसे तो लोकसभा में दिए अपने भाषण को ही लगभग दोहराया किंतु 52 साल में भी अपना घर न होने जैसी बातें करते हुए उपस्थित कांग्रेसजनों  के भावनात्मक दोहन का दांव भी चला। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के चुनाव को टालते हुए श्री खरगे को मनोनयन का अधिकार देना इस बात का प्रमाण है कि  भले ही अध्यक्ष का चुनाव कर लिया गया किंतु पार्टी की  सर्वोच्च संस्था के लोकतंत्रीकरण की बात गांधी परिवार को मंजूर नहीं है। चुनाव न कराने का कारण भी ये सुनने में आया कि विभिन्न  राज्यों में विधानसभा  चुनाव होने से चुनाव कराना पार्टी में फूट का कारण बन सकता है। हालांकि जी 23 में बचे खुचे नेताओं ने फिलहाल भले ही मौन साध रखा हो लेकिन ज्यादा समय तक ये स्थिति नहीं रहेगी। राजस्थान में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं किंतु गहलोत और पायलट का झगड़ा यथावत है। दूसरे राज्यों में भी संगठन की स्थिति अच्छी नहीं है। छत्तीसगढ़ में टी. एस.सिंहदेव मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के विरुद्ध मौके की तलाश कर रहे हैं वहीं म.प्र में मुख्यमंत्री के चेहरे पर बवाल है। लेकिन इस सब पर ध्यान दिए बिना भारत जोड़ो यात्रा के दूसरे चरण की घोषणा कर दी गई। त्रिपुरा ,मेघालय और नागालैंड विधानसभा चुनाव की भी गुजरात जैसी उपेक्षा की गई । ऐसा लगता है कांग्रेस का पूरा ध्यान राहुल के नेतृत्व को चमकाते हुए आगामी लोकसभा चुनाव पर लगा है। इसीलिए विपक्ष के साथ गठबंधन की कोई चर्चा नहीं हुई। उल्टे जयराम रमेश ये बोल गए कि इस साल 9 राज्यों के चुनाव को देखते हुए इस बारे में बात करने का ये समय नहीं है। इस प्रकार कांग्रेस के इस  बहुप्रतीक्षित अधिवेशन का सार यही है कि  जिस सर्वोच्च आसंदी पर अभी तक श्रीमती गांधी विराजमान थीं उस पर अब राहुल बैठेंगे।और विपक्ष से गठबंधन इसी शर्त पर होगा कि सब उनके नेतृत्व में लड़ने को तैयार हों। जहां तक बात कार्यसंस्कृति  की है तो उसमें किसी परिवर्तन का कोई संकेत नहीं मिला। आने वाले दिनों में कांग्रेस अरुणाचल से गुजरात तक की श्री गांधी की यात्रा पर पूरा ध्यान लगायेगी। ये सोचकर कि इससे उसके आंतरिक झगड़े तो दबे रहेंगे ही साथ ही अन्य विपक्षी दलों को भी ये संदेश जाएगा कि वही राष्ट्रीय दल है इसलिए भाजपा को रोकने की शक्ति उसी में है। पहली यात्रा से उसका उत्साह निश्चित तौर पर बढ़ा है लेकिन दूसरी यात्रा जिन राज्यों से गुजरेगी वहां क्षेत्रीय दल काफी ताकतवर हैं । इसलिए आने वाले कुछ महीने राष्ट्रीय राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे । विशेष रूप से कांग्रेस की भूमिका पर सबकी नजर रहेगी।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 25 February 2023

पंजाब में खालिस्तानी आतंक के उभार को नजरंदाज करना घातक होगा



पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए एक वर्ष होने जा रहा है। इस दौरान भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में बनी आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली मॉडल के अनुरूप बिजली , पानी , चिकित्सा और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर जो काम किया उसके प्रति जनता की प्रतिक्रिया मिली जुली है क्योंकि राज्य की वित्तीय स्थिति दयनीय होने से बहुत सारे चुनावी वायदे अब तक पूरे होने की राह देख रहे हैं। लेकिन इस सबसे अलग हटकर  पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन जिस तरह जोर पकड़ रहा है उसे देखते हुए ये कहना गलत न होगा कि पंजाब में एक बार फिर अलगाववाद की चिंगारी फूटने को है। वारिस पंजाब दे नामक संगठन के मुखिया अभिनेता दीप सिद्धू की गत वर्ष गैंगवार में मौत हो जाने के बाद अमृतपाल सिंह नामक नौजवान इस संगठन का अध्यक्ष बन गया। ये वही दीप था जो 26 जनवरी 2021 को किसान आंदोलन के दौरान लालकिले पर चढ़कर खालिस्तानी नारे लगाने के मामले में आरोपी था। उसने पंजाब के युवकों में आजादी का जहर फैलाने का बीड़ा उठा रखा था। उसकी मौत के बाद दुबई में ट्रांसपोर्ट का काम करने वाले अमृत पाल सिंह ने आकर  उसका स्थान ले लिया । हालांकि वारिस दे पंजाब से जुड़े अनेक नेता उसके मुखिया बन जाने से नाराज हैं किंतु अपने भड़काऊ भाषणों से अमृत पाल खालिस्तान  समर्थकों को रास आ रहा है। यहां तक कि उसे दूसरा  भिंडरावाले कहा जाने लगा है। बीते दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बयान दिया था कि पंजाब में खालिस्तान का आंदोलन चलाने वालों पर केंद्र सरकार की नजर है। उस पर अमृत पाल ने धमकी दी कि इंदिरा ने भी दबाने की कोशिश की थी क्या हुआ , अब अमित शाह भी अपनी इच्छा पूरी कर लें । इसके साथ ही उसने ये भी जोड़ा कि पंजाब का बच्चा बच्चा खालिस्तान चाहता है। अमृतपाल की कार्यप्रणाली भी भिंडरावाले जैसी ही है। तीन दिन पूर्व अमृतसर जिले के अजनाला थाने में बंद उसके खासमखास लवप्रीत सिंह तूफान  को रिहा करवाने हजारों लोग बंदूक , तलवार और भाले लेकर जा पहुंचे। उनके दबाव के बाद पुलिस  लवप्रीत  को रिहा करने मजबूर हो गई। ऐसी ही अनेक घटनाएं पंजाब में आए दिन हो रही हैं किंतु सभी प्रकाश में नहीं आ पातीं। खालिस्तानी आंदोलन बीते कई दशकों तक दबा रहने के  बाद 2020 में  शुरू हुए किसान आंदोलन की आड़ में जोर पकड़ने लगा। उस आंदोलन को कैनेडा और ब्रिटेन में बसे खालिस्तान समर्थक संगठनों ने जिस प्रकार समर्थन दिया उसके बाद उसे विदेशी आर्थिक सहायता मिलने की  चर्चा  भी खूब हुई। किसानों के आंदोलन में जिस तरह से उग्रवादी सिख घुस आए उसने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए। प्रधानमंत्री द्वारा कृषि कानूनों को वापिस लेने की घोषणा के बाद आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु दीप सिद्धू ने  पंजाब में घूम घूमकर ये कहना शुरू दिया कि कानून वापस होने के बाद भी सिख युवकों को शांत नहीं बैठना चाहिए। और उसी के बाद पंजाब में सिखों और हिंदुओं के बीच झगड़ा फैलाने का कुचक्र रचा जाने लगा। आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद अनेक हिंदू मंदिरों पर सिखों द्वारा किए गए हमले नए खतरे का संकेत है क्योंकि ऐसा तो अस्सी नब्बे के दशक में भी नहीं हुआ जब खालिस्तान के नाम पर पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था। इस आधार पर यह आशंका मजबूत होने लगी है कि पंजाब में कश्मीर जैसी स्थिति बनाकर हिंदुओं को विशेष रूप से जो गांवों में हैं , आतंकित करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। इससे लगता है विदेशों में बैठे खालिस्तानी संगठन अब बदली हुई रणनीति पर काम कर रहे हैं। उस दृष्टि से पंजाब सरकार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन ऐसा लगता है आम आदमी पार्टी की सरकार इस बारे में बेहद लापरवाह रवैया अपना रही है। पंजाब की राजनीति में अकाली दल के कमजोर हो जाने से  सिख समुदाय नेतृत्व विहीन हो गया है। जिसका लाभ लेते हुए खालिस्तानी पंजाब में अलगाववाद को पनपाने में लगे हैं। किसान आंदोलन से जुड़े सिखों में इस बात को लेकर निराशा है कि एक साल तक चले संघर्ष के बावजूद उनके हाथ कुछ नहीं लगा। आंदोलन की समाप्ति के बाद राजनीतिक दलों ने किसान संगठनों की मांगों से किनारा करना शुरू कर दिया। यही वजह है कि वे भगवंत मान सरकार के विरुद्ध भी आवाज उठा रहे हैं । जिसका लाभ उठाकर खालिस्तानी संगठन अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। ऐसी ही गलती इंदिरा गांधी के दौर में हुई जब भिंडरावाले को अपने लिए फायदेमंद मानकर उसकी गतिविधियों को नजरंदाज किया जाता रहा जिसका दुष्परिणाम ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार और अंततः इंदिरा जी की हत्या के रूप में सामने आया। उस अनुभव से सबक लेते हुए केंद्र सरकार को पंजाब पर विशेष ध्यान देना चाहिए जिससे अमृत पाल सिंह को भिंडरावाले पार्ट 2 बनने से रोका जाए। जिस तरह उसने गृह मंत्री अमित शाह को धमकी दी है वह साधारण बात नहीं है क्योंकि उसकी भाषा से उसके खतरनाक इरादे झलकते हैं।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 24 February 2023

पहले कांग्रेस खुद को सक्षम विपक्ष तो साबित करे



कांग्रेस का 85 वां राष्ट्रीय अधिवेशन आज से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रारंभ हो रहा है। मल्लिकार्जुन खरगे के अध्यक्ष बन जाने के बाद पार्टी को गतिशील बनाने का यह प्रयास न सिर्फ कांग्रेस अपितु प्रजातंत्र के लिए भी शुभ संकेत है । देश के समक्ष इस समय चिंता के जो विषय हैं उनमें से एक  मजबूत विपक्ष का अभाव भी है। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है जिसने आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया। स्वाधीन भारत में लंबे समय देश और प्रदेशों पर  उसने राज किया । ये कहना भी गलत नहीं है कि वामपंथियों को छोड़कर शेष सभी राजनीतिक दल कांग्रेस से ही निकले। समाजवादी आंदोलन के अलावा आज की भाजपा के  पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी पंडित नेहरू के मंत्रीमंडल से स्तीफा देकर बाहर आए थे।कहने का आशय ये कि आजादी के बाद विपक्ष का जो स्वरूप बना वह कांग्रेस से वैचारिक मतभेदों से ही उभरा । और इसीलिए लंबे समय तक भारतीय  राजनीति में कांग्रेस संस्कृति शब्द एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता रहा। ये कहना  भी गलत नहीं है कि कांग्रेस ने ही बाकी दलों को सत्ता के लिए जाति और धार्मिक तुष्टीकरण के फार्मूले सिखाए जिसका उसे जबर्दस्त नुकसान हुआ। कालांतर में उभरे क्षेत्रीय दलों में भी अधिकतर उसी से टूटकर या फिर उसकी नीतियों से नाराज होकर बने। धार्मिक तुष्टीकरण के लिए अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा एवं भाषावार प्रांतों का गठन कांग्रेस की उन गलतियों में से है जिनका नुकसान देश भुगत रहा है। इनकी वजह से क्षेत्रीयतावाद के अलावा धार्मिक कट्टरता को भी धीरे धीरे बढ़ावा मिला।इन सबकी वजह से कांग्रेस का प्रभाव क्षीण होते होते ये स्थिति बन गई कि वह राज्यों की  सत्ता से अलग होते  होते केंद्र की सत्ता भी गंवा बैठी। यहां तक कि लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष बनने की पात्रता भी उससे छिन गई । लेकिन इसका दुष्परिणाम ये हो रहा है कि राष्ट्रीय सोच रखने वाले विपक्ष का अभाव हो गया तथा छोटे छोटे दल राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं पाल बैठे । यही वजह है कि ममता बैनर्जी और के. सी.राव जैसे नेता तक कांग्रेस के झंडे तले भाजपा विरोधी विपक्षी मोर्चा बनाने में आगे पीछे हो रहे हैं। ममता तो पहले ही खुद को नरेंद्र मोदी का  विकल्प घोषित कर चुकी हैं । कांग्रेस अधिवेशन के शुरु होने के पहले ही तृणमूल कांग्रेस की मुखर सांसद महुआ मोइत्रा का ये बयान ध्यान देने योग्य है कि उनकी पार्टी ही भाजपा का विकल्प है। ये सब देखते हुए कांग्रेस को इस अधिवेशन के जरिए ये स्पष्ट करना होगा कि वह चुनाव पूर्व विपक्षी गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में रहते हुए राहुल गांधी को श्री मोदी के मुकाबले पेश करने का दबाव बनाएगी या फिर गठबंधन को बहुमत मिलने के बाद ही प्रधानमंत्री का मसला हल होगा। इसके साथ ही कांग्रेस को ये भी स्पष्ट करना होगा कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण पर उसका क्या रवैया रहेगा।बीते कुछ वर्षों में  पार्टी नर्म हिंदुत्व को अपनाने का प्रयास तो कर रही है किंतु वह आधा अधूरा प्रतीत होता है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने विभिन्न धार्मिक केंद्रों पर पूजा अर्चना की । लेकिन पार्टी चाहकर भी भाजपा की तरह खुलकर धार्मिक और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण व्यक्त नहीं कर पाती। उ.प्र ,  बिहार , प.बंगाल जैसे बड़े राज्यों में वह घुटनों के बल पर है। वर्तमान  में  वह राजस्थान , म. प्र, गुजरात, छत्तीसगढ़ और हिमाचल में ही भाजपा से सीधे मुकाबले में है। बाकी के राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनना पड़ता है । इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस का राष्ट्रीय पार्टी की तरह व्यवहार  न करना ही है। ज्वलंत मुद्दों पर नीतिगत अस्पष्टता और वैचारिक भटकाव की वजह से आज देश की सबसे पुरानी पार्टी   अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। यदि वह चाहती है कि 2024 के  चुनाव में नरेंद्र मोदी को टक्कर दे सके तो उसे राहुल गांधी का मोह छोड़कर नीतिगत साहस दिखाना होगा। उसे उन कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण करना चाहिए जिनकी वजह से उसका पराभव शुरू हुआ। दुर्भाग्य से आज भी  गांधी परिवार के अभिनंदन पत्र का वाचन करने वाले चंद नेता ही उस पर हावी हैं । भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल पूरे समय  जिस तरह रास्वसंघ और सावरकर को गालियां देते रहे उससे उनको और कांग्रेस दोनों को कुछ हासिल नहीं हुआ। धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर पार्टी का रुख जनभावनाओं के विपरीत होने से वह एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली स्थिति में पहुंच जाती है । कांग्रेस को ये मुगालता छोड़ना होगा कि भारत छोड़ो यात्रा से राहुल गांधी इतने लोकप्रिय और ताकतवर हो गए हैं कि सभी विपक्षी दल उनको अपना नेता मान लेंगे। सत्ता की लालसा छोड़ उसको इस अधिवेशन के जरिए खुद को सक्षम विपक्ष के तौर पर पेश करना होगा क्योंकि फिलहाल तो देश को उससे यही अपेक्षा है।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 23 February 2023

दिल्ली नगर निगम में हंगामा प्रजातंत्र के लिए अशुभ संकेत




दिल्ली नगर निगम  चुनाव के परिणाम  दिसंबर 2022 में हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधान सभा के नतीजों के पहले ही आ चुके थे । उन दोनों राज्यों में मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद मंत्रीमंडल भी बन गया लेकिन दिल्ली को महीनों के इंतजार के बाद कल किसी तरह से  नया महापौर मिल सका। इसके पहले दो तीन बार नव निर्वाचित पार्षदों की बैठक हुई किंतु हंगामे की वजह से सदन स्थगित करना पड़ा। ये कहना गलत न होगा कि इस मामले में भाजपा की तरफ़ से की गई अड़ंगेबाजी अनावश्यक और अनुचित थी। 12 मनोनीत पार्षदों को मताधिकार दिलाकर तोड़फोड़ के जरिए महापौर बनवाने की उसकी कोशिश के नैतिक और व्यवहारिक दोनों पक्ष कमजोर थे। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया जिसके कड़े निर्देश के बाद अंततः उपराज्यपाल को चुनाव करवाने बाध्य होना पड़ा और तनावपूर्ण वातावरण में आखिरकार सदन में स्पष्ट बहुमत प्राप्त  आम आदमी पार्टी अपना महापौर और उपमहापौर चुनवाने में सफल हो गई। भाजपा द्वारा अपना उम्मीदवार खड़ा किया जाना सांकेतिक विरोध के लिहाज से गलत नहीं था लेकिन उसके बाद स्थायी समिति के चुनाव के लिए सदन  में हुए होहल्ले ,मारपीट और तोड़फोड़ को देखकर प्रजातंत्र के प्रति श्रद्धा रखने वाले हर किसी का मन दुखी होगा । विपक्ष संसदीय तरीकों से सत्ता पक्ष पर दबाव बनाए उसमें कुछ भी गलत नहीं है । लेकिन  ये जानते हुए भी कि वह अल्पमत में है और सत्ता पक्ष का एक भी निर्वाचित सदस्य  उसके साथ आने तैयार नहीं है , तब बिना ठोस आधार के महापौर के चुनाव में रुकावट पैदा करने से दिल्ली के मतदाताओं को  दो माह तक महापौर से वंचित रहना पड़ा। उसके बाद स्थायी समिति के चुनाव में भी हंगामा और मारपीट की परिस्थिति उत्पन्न करना अच्छा नहीं है। आम आदमी पार्टी दूध की धुली है और उसके सारे व्यवहार लोकतंत्र की कसौटी पर खरे साबित हुए ये कहना तो सही नहीं है किंतु दिल्ली की जनता ने उसे लगातार दो बार विधानसभा में भारी बहुमत दिया तो लोकसभा में बुरी तरह से परास्त भी किया। इससे ये एहसास होता है कि राष्ट्रीय राजधानी के मतदाता एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार से संतुष्ट हैं वहीं उन्होंने देश की सत्ता चलाने के लिए भारतीय जनता पार्टी को उपयुक्त समझा। इसी तरह 2015 में आम आदमी पार्टी को प्रदेश की सत्ता सौंपने के बावजूद 2017 में तीनों नगर निगमों में भाजपा को बहुमत प्रदान कर दिया। इस बार तीनों को मिलाकर एक नगर निगम बनाकर चुनाव हुए जिसमें भाजपा से छीनकर जनता ने आम आदमी पार्टी को बहुमत दे दिया। हालांकि वह विधानसभा चुनाव जैसा भारी भरकम न होकर काम चलाऊ ही है जिससे आम  आदमी पार्टी का सिर भी न चढ़े। दरअसल अरविंद केजरीवाल ये दावा कर रहे थे कि भाजपा को 20 सीटें भी मिल जाएं तो बहुत होगा किंतु  उनकी पार्टी जहां 134 सीटें जीत सकी वहीं भाजपा को 106 सीटें मिलने से मजबूत विपक्ष की स्थिति बन गई । कांग्रेस के 9 और 3 निर्दलीय पार्षद जीते। इस प्रकार मतदाताओं ने विधानसभा के बाद आम आदमी पार्टी को नगर निगम भी सौंपने का फैसला किया किंतु भाजपा को  100 से अधिक सीटें देते हुए  विपक्ष को भी मज़बूत बना दिया। अब इसके बाद तोड़फोड़ के जरिए बहुमत हासिल करने और महापौर के चुनाव को रोकने के लिए उठाए गए कदम रचनात्मक विपक्ष की भूमिका के मद्देनजर किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है । जब ऐसी ही हरकत विपक्ष संसद में करता है तो भाजपा उसकी निन्दा करती है किंतु जहां उसे विपक्ष में बैठना होता है वहां उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करने में वह नहीं  झिझकती । आम आदमी पार्टी को भाजपा अपने लिए चुनौती मान रही है किंतु बेहतर होगा वह राजनीतिक और वैचारिक  तौर तरीके आजमाकर उसके विस्तार को रोकने का प्रयास करे। साथ ही उसे उन कमियों को  दूर करना होगा जिनकी वजह से दिल्ली के मतदाताओं  ने उसे दो बार विधानसभा और एक बार नगर निगम चुनाव में शिकस्त दी। राष्ट्रीय परिदृश्य पर निगाह डालें तो निश्चित रूप से भाजपा बहुत शक्तिशाली है लेकिन अनेक राज्यों में अभी भी वह उस तुलना में कमजोर है। जिन राज्यों में उसे लोकसभा चुनाव में भारी सफलता मिलती रही उनके  मतदाताओं ने प्रदेश की सत्ता किसी और पार्टी को दे दी तो इससे खीजने की बजाय आत्मावलोकन करना चाहिए। उस दृष्टि से दिल्ली नगर निगम में महापौर चुनाव हेतु अब तक का घटनाक्रम अच्छा संकेत नहीं है। जब नगर निगम में ये सब हो रहा है तब विधान सभा और संसद में होने वाले हंगामों को देखकर ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि सत्ता का नशा राजनीतिक दलों पर इस कदर तक चढ़ चुका है कि वे लोकतंत्र के मंदिर तक को अपवित्र करने में भी नहीं लजाते ।


रवीन्द्र वाजपेयी