Monday, 7 September 2026

ज़हरीली शराब के कारोबारियों को संरक्षण देने वाले भी बराबरी के कसूरवार




म.प्र के सागर जिले में जहरीली शराब पीने से डेढ़ दर्जन लोग अपनी जान गँवा बैठे। अस्पताल में इलाजरत 100 से अधिक लोगों में से भी अनेक की हालत चिंताजनक  है। इतने लोगों की मौत होने की खबर मिलते ही प्रदेश सरकार हरकत में आई और आबकारी विभाग के स्थानीय अमले पर निलंबन और स्थानांतरण जैसी कारवाई की गई। आबकारी आयुक्त और स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने सागर पहुँचकर हालात का जायजा भी लिया। शराब  व्यवसाय से जुड़े  दर्जनों लोगों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज होने के साथ ही कुछ गिरफ़्तरियाँ भी हो चुकी हैं। मामला स्थानीय स्तर पर सस्ती शराब बनाने का था। दाम कम होने के लालच में पियक्कड़ों ने वह शराब खरीदकर उसका सेवन किया जिसके बाद मौत का मंजर सामने आया। चूंकि मामला बेहद गंभीर है इसलिए ये विश्वास किया जा सकता है कि प्रदेश सरकार कठोर कार्रवाई करने में पीछे नहीं हटेगी ।  अन्यथा उसे जनता के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन यह मुद्दा केवल इस कांड के लिए कसूरवार लोगों को  सजा दिलवाने तक सीमित नहीं है । अपितु देखने वाली बात ये है कि शराब के कारोबार से जुड़ा भ्रष्टाचार और उसे मिलने वाले प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण पर रोकथाम कैसे लगे? शराब की बुराइयों से सभी वाक़िफ़ हैं। संपन्न वर्ग के पास तो महंगे ब्रांड की शराब पीने की सामर्थ्य होती है जो उसके साथ अच्छी खुराक लेने में भी सक्षम है। कुछ लोग शराब का सेवन औषधि के तौर पर सीमित मात्रा में करते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के लिए भी आजकल शराब पीने का फैशन है। अभिजात्य वर्ग में महिलाओं के सुरा पान का चलन भी बढ़ता जा रहा है। युवाओं में भी शराब का आकर्षण वृद्धि की ओर है। लेकिन सागर में गत दिवस जो हादसा हुआ उसका शिकार गरीब तबके के लोग हुए। बताया जा रहा है मात्र 20 रु.कीमत कम होने की वजह से सेकड़ों लोगों ने स्थानीय कुछ लोगों द्वारा बनाई जो शराब खरीदकर पी उसने अनेक जिंदगियां छीन लीं। इस घटना से शराब के कारोबार के साथ जुड़ी अमानवीयता एक बार उजागर हो गई। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि नशे का ये कारोबार  भले ही उसे बनाने और बेचने वालों के साथ ही भ्रष्ट नौकरशाहों और उनको संरक्षण प्रदान करने वाले नेताओं को मालामाल करता हो लेकिन समाज के निचले तबके के लिए ये बर्बादी का कारण है। शराब के सेवन से लाखों लोगों का स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि पारिवारिक जीवन भी  तबाह हो रहा है। असंख्य ऐसे नशैड़ी मिल जाएंगे जो पीने की लत की वजह से कर्ज के बोझ में दबे हुए हैं। गरीबों की बस्तियों में साहूकारों द्वारा  उनको मोटी ब्याज दरों पर कर्ज दिये जाने के बाद उसकी वसूली के लिए बेरहमी बरती जाती है। शराब के नशे में धुत होकर किये जाने वाले अपराधों के बारे में भी शासन, प्रशासन और राजनेता पूरी जानकारी रखते हैं। बावजूद इसके शराब से जुड़े काले - कारनामों पर अंकुश लगाने के बारे में कोई गंभीर नहीं है। सबसे बड़ा मजाक तो ये है कि एक तरफ तो सरकार अपना खजाना भरने के लिए शराब की दुकानें खुलवाती है और दूसरी तरफ नशा उन्मूलन का अभियान चलाती है। नशा मुक्ति केंद्र जिस प्रशासन द्वारा संचालित हैं, वही कुछ अपवाद छोड़कर शराब के अवैध व्यवसाय को प्रश्रय प्रदान करने वाला है। इस आधार पर ये संदेह करना गलत नहीं लगता कि सागर में जहरीली शराब बनाने और बेचने वालों को आबकारी विभाग में बैठे उन लोगों का खुला संरक्षण होगा जो सिर से पाँव तक भ्रष्ट होने से पैसे के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार रहते हैं। अब इतनी इंसानी जानें जहरीली शराब की बलि चढ़ गईं तब कठोर कार्रवाई का कर्मकांड तो होगा ही परंतु आबकारी विभाग के इंच - इंच में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगने की कोई उम्मीद  दूर - दराज तक दिखाई नहीं देती। इसका कारण ये है कि शराब की बिक्री से एक तरफ जहाँ सरकार का खजाना भरता है वहीं दूसरी तरफ ये नेता - नौकरशाह गठजोड़ के लिए भी मुफ्त कमाई का स्रोत है। गौरतलब है सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत चलने वाले शराब कारोबार से तो उसे राजस्व मिलता है लेकिन अवैध रूप से शराब बनाने और बेचने के कारोबार से केवल भ्रष्ट सरकारी अमले की जेबें ही गर्म होती हैं। सागर में जो हुआ उसके बाद मुख्यमंत्री ने दोषियों को नहीं बख्शे जाने का ऐलान तो कर दिया। इसलिए उनकी धरपकड़ होने और सजा मिलने की उम्मीद की जा सकती है किंतु ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति तभी रोकी जा सकेगी जब आबकारी विभाग में ईमानदारी और जनता के प्रति संवेदनशीलता का भाव हो , जिसकी संभावना फिलहाल तो नहीं लग रही। 

-रवीन्द्र वाजपेयी

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