Thursday, 16 July 2026

आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी



अयोध्या स्थित भव्य राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का प्रकरण पूरी दुनिया में चर्चित हो गया। सनातन में आस्था रखने वाले करोड़ों रामभक्तों को उक्त घटना ने पीड़ा पहुंचाई क्योंकि मसला केवल रुपये - पैसे की हेराफेरी तक सीमित न रहकर उन नैतिक मूल्यों और मर्यादाओं के उल्लंघन से भी जुड़ा हुआ है जिनका प्रभु श्री राम ने जीवन भर पालन किया और जिसकी वजह से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम जैसा पवित्र संबोधन प्राप्त हुआ। इस मामले की जाँच चल रही है और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा है। इसलिए उसके कानूनी पक्ष पर कुछ भी बोलना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन जो न्यास राम मंदिर की व्यवस्था देखता है उसके प्रशासनिक ढांचे में  शीर्ष स्तर पर हो रहे बदलाव से ही मामले की गंभीरता स्पष्ट हो जाती है। उक्त न्यास में रा.स्व.संघ से जुड़े लोग महत्वपूर्ण दायित्वों पर थे लिहाजा मामले को राजनीतिक रंग भी दिया जाने लगा जो कि स्वाभाविक  है। उ.प्र में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं ।  ये देखते हुए भाजपा विरोधी ताकतों को हमलावर होने का मौका मिल गया। जाहिर है केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता पक्ष इस मामले में रक्षात्मक होने के लिए मजबूर हो गया है। खैर, राजनीति के अपने तौर - तरीके होते हैं इसलिए इस मामले में भी दोनों पक्षों से जिस तरह के वार और पलटवार हो रहे हैं उनसे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन इस कांड के उजागर होते ही देश भर से विभिन्न मंदिरों, धर्म स्थलों और उनकी व्यवस्था देख रहे न्यासों के प्रबंधन में आर्थिक अनियमिताओं की खबरें निकलकर आने लगीं जिनके मूल में चंदे और चढ़ावे की चोरी ही मुख्य रूप से सामने आई है। कुछ प्रसिद्ध धर्मस्थलों से  बहुमूल्य मुकुट एवं आभूषण आदि गायब होने की शिकायतें भी मिल रही हैं। शुरुआत में ऐसा लगा कि सारी अव्यवस्था हिन्दू मंदिरों को लेकर ही है किंतु मुस्लिम समुदाय के बीच से भी वक्फ संपत्ति से जुड़े घोटाले सामने आने लगे। अन्य धार्मिक संगठनों के भीतर भी इसी तरह की हेराफेरी चर्चाओं में आ गई। देश के अनेक हिस्सों में ईसाई समुदाय से जुड़ी बेशकीमती जमीनों की बंदरबांट भी किसी से छिपी नहीं है। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि धर्म के नाम पर अधर्म करने वालों के हौसले बुलंद हैं जिन्हें न ईश्वरीय कोप का डर है और न ही कानून का। जहाँ तक बात धार्मिक केंद्रों और उनसे जुड़े आर्थिक प्रबंधन की है तो उसमें भावना का स्थान सर्वोपरि है। भले ही व्यक्ति बतौर कर्मचारी उससे जुड़ा हो किंतु उस स्थल या संस्थान की पवित्रता उसे प्रभावित करती होगी , ये विश्वास जनमानस में गहराई तक समाया हुआ था। इसीलिए मंदिर में पुजारी के आसन पर बैठे व्यक्ति की योग्यता और जाति के बारे में जाने बिना श्रृद्धालु जन उसे आदर देते हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि राम मंदिर से आई चंदा और चढ़ावा घोटाले की जानकारी  के बाद देश भर से ऐसी ही खबरों की बाढ़ सी आ गई।  सनातन धर्म के अलावा  अन्य धर्मों से जुड़ी संस्थाओं एवं संपत्तियों की लूटखसोट का पर्दाफ़ाश भी उन्हीं से जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा है। इन सबसे ये बात खुलकर सामने आ गई है कि लोग श्रद्धा भाव से धर्म स्थलों और उनका प्रबंधन देखने वाले संस्थानों को जो आर्थिक सहयोग देते हैं उसका निजी स्वार्थपूर्ति हेतु भी दुरूपयोग होता है। मंदिरों में चढ़ाई जाने वाली  बहुमूल्य वस्तुओं की पेशेवर चोरों द्वारा की जाने वाली चोरी पर किसी को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि उनसे ईमानदारी की अपेक्षा कोई नहीं करता । लेकिन मंदिरों और धर्मस्थलों में सेवा प्रदान करने वालों से तो ईमानदारी और समर्पण  की उम्मीद की जाती है क्योंकि किसी भी धर्म में चोरी - बेईमानी नहीं सिखाई जाती। यही वजह है कि अयोध्या में हुई चढ़ावे की चोरी के बाद लगातार आ रही खबरें धर्म प्रेमियों को धक्का पहुँचा रही हैं। कानून दोषियों को दंडित करेगा इसका भरोसा भी लोगों को है किंतु देश भर से आ रही खबरों से लोगों की आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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