बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीदें धीरे - धीरे खत्म होती जा रही हैं। चीन को मोंगला बंदरगाह के समीप इकौनोमिक ज़ोन के विकास का काम सौंपने के बाद गत दिवस उसने भारतीय सीमा से बेहद नजदीक स्थित तीस्ता परियोजना भी उसको सौंप दी जो इसके लिए उसे 7 हजार डॉलर का ऋण देगा। भारत ने इसके लिए 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव दिया था। ऐसा ही मोंगला परियोजना को लेकर हुआ था। उल्लेखनीय है शेख हसीना के शासनकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफी सुधर गए थे। यद्यपि कट्टरपंथी मुस्लिम वहाँ रह रही हिन्दु आबादी पर अत्याचार करने से बाज नहीं आते थे। मंदिरों सहित हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले आम बात थी। बावजूद इसके सरकारी स्तर पर संवाद बना रहा और अनेक लंबित विवाद भी सुलझे । लेकिन हसीना का तख्ता उलटने के बाद स्थितियाँ पूरी तरह बिगड़ गईं। दरअसल उनको भारत में। पनाह दिये जाने से बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के मुखिया मो. युनुस को बहाना मिल गया। हालांकि उनका झुकाव पहले से ही चीन की तरफ था। लेकिन चुनाव के बाद जब तारिक रहमान भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने तब शुरुआत में ये लगा था कि संभवतः बांग्लादेश दोबारा भारत के साथ सम्बन्ध सुधारेगा। लेकिन शेख हसीना का भारत में बने रहना आड़े आ गया। उनकी गैर मौजूदगी में ही उन्हें मृत्युदंड सुनाया जा चुका है। बांग्लादेश सरकार लगातार उनकी वापसी के लिए दबाव बनाती रही है जिसे भारत ने नजरंदाज कर दिया। जाहिर है इससे उसकी नाराजगी बढ़ी होगी। हालांकि अपने जन्म के कुछ बरस बाद शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या होने के बाद से बांग्लादेश में बैठे सभी शासक भारत से दुश्मनी की राह पर चले। हसीना के कार्यकाल को जरूर अपवाद कहा जा सकता है। लेकिन उसके बाद से ये देश भारत विरोधी ताकतों से जुड़ने लगा। बांग्लादेश के नये शासक तारिक रहमान लंबे समय तक विदेश में रहे हैं। इसीलिए उनसे उम्मीद रही कि वे कट्टरता को त्यागकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के साथ संबंध कायम करने आगे आयेंगे। लेकिन चीन के साथ किये ताजा समझौतों से ये साफ हो चला है कि वे भी अपने मरहूम पिता और माँ की तरह से ही भारत विरोध की मानसिकता के वशीभूत हैं। यद्यपि हाल ही में शेख हसीना ने ये कहते हुए सबको चौंका दिया था कि वे आगामी दिसम्बर माह में ढाका लौटकर अदालत के समक्ष आत्म समर्पण करते हुए फांसी की सजा रद्द करने की अपील करेंगी। उसके बाद ऐसा लगा था कि दोनों देशों के रिश्तों में चली आ रही तल्खी दूर होने लगी है। लेकिन तारिक रहमान द्वारा चीन की यात्रा और फिर दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं के विकास हेतु भारत के प्रस्तावों को ठुकराते हुए चीन की गोद में बैठ जाने के बाद इस बात में कोई शंका नहीं रह गई है कि हमारा ये पड़ोसी भी हमारे दुश्मनों के साथ मिल गया है। तीस्ता परियोजना भारत की सीमा से महज 20 - 22 कि.मी दूर होने से हमारी सुरक्षा के लिए खतरा है। सिलिगुड़ी कारीडोर वैसे भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। प. बंगाल में भाजपा सरकार बन जाने के बाद बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के अभियान में तेजी के अलावा घुसपैठियों को वापस भेजने जैसी कारवाई से बांग्लादेश भन्नाया हुआ है। असम की भाजपा सरकार भी अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए बेहद आक्रामक है। चीन के साथ तारिक रहमान सरकार रक्षा समझौते भी कर रही है। निश्चित रूप से उसके ताजा कदम विशुद्ध रूप से भारत विरोधी मोर्चेबंदी ही है। आश्चर्य तो तब होता है जब बांग्लादेश उस पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ करने में भी नहीं हिचकता जिसने उसकी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। पाकिस्तान के कब्जे से से उसे मुक्त करने में भारत ने जो सैन्य कारवाई की और करोड़ों बांग्लादेशियों को शरण दी उसके प्रति कृतज्ञता की बजाय बांग्लादेश भारत के साथ हर वह हरकत करने पर आमादा है जो किसी शत्रु देश के साथ की जाती है। ऐसे में भारत को उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति रखने से बचते हुए कड़ाई से पेश आना चाहिए क्योंकि चीन का वहाँ बैठना हमारी सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करने वाला है। सबसे बड़ा कदम उन घुसपैठियों की वापसी का उठाया जाए जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment