Tuesday, 8 September 2026

राष्ट्रीय राजधानी में दम तोड़ती व्यवस्था



दिल्ली के एक निजी हॉस्टल में चल रही मरम्मत के दौरान अचानक वह इमारत धराशायी होने से उसमें रह रहे 7 छात्र मौत का शिकार हो गए। भवन स्वामी को पत्नी और पुत्र सहित गिरफ्तार कर लिया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने नगर निगम को भी इसके लिए दोषी माना है। घटना के बाद परंपरानुसार शासन -  प्रशासन , मंत्री, जनप्रतिनिधि मोर्चे पर नजर आने लगे। लापरवाही की पहली गाज गिरी कुछ अधिकारियों पर  निलंबन के रूप में। दिल्ली का मामला है तो सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक भी पहुंच गया। न्यायालय की फटकार के बाद अब दिल्ली में चल रहे सभी हॉस्टलों की जांच के निर्देश दे दिये गए हैं। हाल ही में एक निजी गेस्ट हाउस में आग  लग जाने के कारण कुछ लोगों की मौत होने के बाद भी अवैध निर्माणों की जाँच का अभियान छेड़ा गया और  उस इलाके में पदस्थ नगरीय निकाय के अमले पर भी दंडात्मक कार्रवाई की गई। उसके कुछ समय पहले एक तलघर में चल रहे कोचिंग संस्थान में बाढ़ का पानी भर जाने के कारण कई छात्र जान से हाथ धो बैठे। उस घटना के बाद राजधानी में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कोचिंग संस्थानों में व्याप्त अनियमितताओं की जाँच एवं नियम विरुद्ध किये गए अवैध निर्माणों पर कार्रवाई का ऐलान किया गया। कुछ दिनों तक नेता और नौकरशाह मुस्तैद नजर भी आये और न्यायपालिका ने भी रुचि दिखाई किंतु जल्द ही सारी सक्रियता फुस्स होकर रह गई। सही बात ये है कि हमारे देश में अवैध कार्यों का पर्दाफ़ाश तभी होता है जब कोई दुर्घटना हो जाए। दिल्ली देश की राजधानी होने से अंतर्राष्ट्रीय शहर माना जाता है। इसमें होने वाली किसी भी घटना का प्रचार दुनिया भर में होता है। वैसे भी यह एक ऐतिहासिक महानगर है। लेकिन दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में इसकी गणना होना शर्मिंदा भी करता है। चार दिन बाद दिल्ली में ब्रिक्स नामक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें पुतिन और जिनपिंग जैसे वैश्विक दिग्गजों के अलावा द. अफ्रीका और ब्राजील आदि देशों के राष्ट्राध्यक्ष आने की संभावना है। ऐसे समय  राजधानी में हुआ  उक्त हादसा देश की छवि खराब करने का कारण भी बन सकता है। उल्लेखनीय बात ये है कि एक तरफ तो दिल्ली के अनेक इलाके अत्यंत विकसित हैं जहाँ ये लगता ही नहीं कि हम भारत में हैं । वहीं इसी महानगर के अन्य क्षेत्रों में व्यवस्था पूरी तरह दम तोड़ चुकी है। होना तो ये चाहिए कि देश की राजधानी न सिर्फ हमारे अन्य शहरों अपितु दुनिया भर में अपनी खूबसूरती और व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध हो। लेकिन धीरे - धीरे उसकी घनी बसाहट वाले क्षेत्र अव्यवस्था के बोझ तले दबे जा रहे हैं। इस विसंगति को दूर करने की जिम्मेदारी जिन सरकारी विभागों की है वे गले तक भ्रष्टाचार में डूबे होने से विकास एवं नगरीय नियोजन की सारी नीतियां मिट्टी में मिल जाती हैं। राजधानी में बैठी केन्द्र सरकार देश भर के शहरों में स्वच्छता के साथ शुद्ध हवा का सर्वेक्षण करवाकर उन्हें पुरस्कृत करती है। लेकिन उसकी नाक के नीचे राष्ट्रीय राजधानी न स्वच्छता में कोई स्थान रखती है और न ही प्रदूषण रहित हवा में। इसका कारण वहाँ के नगरीय निकायों का निकम्मापन ही है।  केन्द्र शासित होने की बावजूद दिल्ली में विधानसभा और प्रदेश सरकार है। उसमें बैठे लोगों को चाहिए वे इस महानगर को बदहाली से निकालने ईमानदारी से प्रयास करें। केवल मुफ्त बिजली, पेय जल और बस यात्रा जैसी खैरात बांटने से वोट तो हासिल किये जा सकते हैं किंतु दिल्ली की दुर्दशा दूर नहीं हो सकती। राजधानी में बाहर के लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। कम बजट के चलते उन्हें होस्टल में रहना होता है जिनके मालिक किराया तो वसूलते हैं किंतु सुविधा और सुरक्षा की उपेक्षा की जाती है। नगरीय निकाय के साथ ही पुलिस और प्रशासन का भी दायित्व है कि ऐसे स्थानों की जाँच कर देखे कि वे नियमानुसार संचालित हैं या नहीं? लेकिन जब तक कोई दुर्घटना नहीं होती तब तक समूचा तंत्र कुंभकर्ण की तरह सोता रहता है। ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब राष्ट्रीय राजधानी में व्यवस्था इतनी लचर है तब देश के छोटे और मध्यम श्रेणी शहरों का क्या हाल होगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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