Monday, 20 July 2026

समान नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय


मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

 नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय

मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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