दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में गत दिवस संसद भवन तक छात्रों का मार्च आयोजित किया गया था। पुलिस के रोकने पर भी हज़ारों लोग उस ओर बढ़े। संसद का सत्र भी चूंकि कल से है शुरू हुआ था लिहाजा सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी थी। जब प्रदर्शनकारी अनियंत्रित होने लगे तब पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस जैसे परंपरागत तरीके अपनाकर भीड़ को तितर - बितर किया गया। दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं। पुलिस का कहना है भीड़ द्वारा पथराव एवं सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के बाद स्थिति बिगड़ी वहीं आंदोलन के कर्ताधर्ताओं की मानें तो पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस छोड़े जाने से भीड़ भड़क उठी। विभिन्न वीडियो देखने पर पता चलता है कि दोनों तरफ के आरोप काफी हद तक सही हैं। भीड़ द्वारा पत्थर फेंके जाने के साथ पुलिस के वाहनों को क्षति पहुंचाए जाने के दृश्य साफ नजर आये वहीं पुलिस को भी डंडे बरसाते हुए देखा गया। ये बात पूरी तरह सच है कि सुरक्षा बल सख्ती न दिखाते तो प्रदर्शनकारी संसद परिसर में घुसकर अकल्पनीय स्थिति उत्पन्न कर सकते थे। ये आशंका इसलिए पैदा हुई क्योंकि छात्रों के नाम पर उपद्रवी तत्व भी प्रदर्शन में शामिल थे जिनका उद्देश्य अराजकता फैलाना था। दरअसल इस आंदोलन को गैर राजनीतिक बनाये रखने के दावे झूठे निकले जब आम आदमी पार्टी के अलावा भीम आर्मी सांसद दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने पहले तो धरना स्थल पर मंच साझा किया और फिर प्रदर्शन में भी मौजूद रहे। सपा सांसद डिंपल यादव ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। योगेंद्र यादव,शबाना आज़मी अरुंधति रॉय, प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसी घोषित मोदी विरोधी हस्तियां भी नजर आईं। जेएनयू से जुड़े सरकार विरोधी संगठनों ने तो धरना स्थल पर पहले दिन से ही कब्जा जमा लिया था। इस आयोजन के पीछे नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने से परीक्षार्थियों में उपजी नाराजगी थी जिसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग जोर पकड़ती गई। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का इस आंदोलन से जुड़ना आज तक रहस्य बना हुआ है क्योंकि उसका प्रादुर्भाव देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किये एक कटाक्ष की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था। इसके अलावा सोनम वांगचुक का लद्दाख़ से आकर इस आंदोलन से जुड़ना भी चौंकाने वाला रहा। धीरे - धीरे यह मुहिम छात्रों के हाथ से निकालकर पेशेवर आंदोलनजीवियों के नियन्त्रण में आ गई। इसी के चलते वहाँ वही नारे गूंजने लगे जो जेएनयू परिसर की पहचान बन चुके हैं। हिंदू देवी - देवताओं का उपहास, मनुवाद को कोसते हुए जय भीम के नारे और क्रांति के नाम पर अल्लाह की तारीफ जैसी भड़काऊ बातें सुनाई दीं। देश विरोधी शर्जील इमाम और खालिद उमर को महान बताने की जुर्रत के साथ ही धारा 370 की वापसी का दंभ भरा गया। कल जो प्रदर्शन हुआ उसमें भीम आर्मी की जुटाई भीड़ छात्रों पर भारी पड़ी। इन्हीं सब कारणों से आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। सोनम वांगचुक तक सांसदों से मिलकर अनशन तोड़ने के लिए राजी हो गए। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक माइग्रेन नामक बीमारी की आड़ लेकर भूख हड़ताल से पीछे हट गए। सरकार के बुलावे पर पार्टी के दो प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से मिलने जा पहुंचे लेकिन रात में दोबारा जंतर मंतर पर तम्बू तानकर आंदोलन जारी रखने की डींग हाँकी गई। लेकिन अब तक ये समझ से परे है कि इस आयोजन का असली सूत्रधार कौन है? अभिजीत दीपके के भारत लौटते ही उसकी आम आदमी पार्टी से निकटता स्पष्ट हो गई थी। इसीलिए इस आंदोलन में उस पार्टी का पूरा शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहा। यही वजह थी की कांग्रेस ने कल के प्रदर्शन से दूरी बनाये रखी। राहुल गाँधी का बयान प्रधानमंत्री के विरुद्ध तो आया किंतु कॉकरोच जनता पार्टी की तरफदारी से वे बचे और तो और सोनम वांगचुक की मिजाजपुर्सी की जरूरत भी नहीं समझी। स्मरणीय है किसी आंदोलन की सफलता के लिए किसी या कुछ राजनीतिक पार्टियों की हिस्सेदारी जरूरी होती है जिसका इस अभियान में अभाव है। हालांकि आम आदमी पार्टी पर्दे के पीछे है, लेकिन दीपके एण्ड कम्पनी का कोई ढांचा नहीं है। ऐसे में कुछ दिन के होहल्ले के बाद इसकी वजनदारी कम होती जायेगी। सबसे खास बात ये है कि भारत - अमेरिका के बीच होने वाली व्यापार संधि के विरोध में दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर किसान जमा होने लगे हैं। ऐसे में अब आंदोलन का केन्द्र जंतर मंतर से खिसक कर किसानों के धरने पर पहुँच जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक दलों और मीडिया को भी किसानों में ज्यादा रुचि होगी विशेष रूप से पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव को देखते हुए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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