विधानसभा चुनाव के कुछ महीनों पहले पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार और केंद्र के बीच पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर टकराव बढ़ गया। भगवंत मान सरकार द्वारा केंद्र पर संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कैबिनेट बैठक में उक्त नियुक्ति के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया। श्री मान ने आरोप लगाया कि केंद्र ने राज्य सरकार की सहमति लिए बिना नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया जो कि स्थापित प्रक्रिया के सर्वथा विरुद्ध है । लेकिन इसके विपरीत विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने न्यायमूर्ति मिश्रा को मुख्य न्यायाधीश बनने पर बधाई देते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक भूमिका की सराहना करते हुए पंजाब सरकार पर निशाना साधा। साथ ही मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का विरोध करने और शपथ ग्रहण समारोह से दूर रहने के भगवंत मान सरकार के फैसले की निंदा करते हुए कहा कि सरकारों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। श्री बाजवा का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस केन्द्र की नरेंद्र मोदी सरकार की ऐलानिया विरोधी है । इस विवाद में नया मोड़ तब आया जब वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि राज्य सरकार पंजाब के राज्यपाल को भी पत्र लिखकर आग्रह करेगी कि नव नियुक्त चीफ जस्टिस को पद की शपथ न दिलाई जाए क्योंकि यह नियुक्ति पंजाब को अनदेखा करके की गई है। लेकिन पंजाब सरकार की आपत्ति के जबाब में भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति श्री मिश्रा की नियुक्ति पर पंजाब सरकार के विरोध को दुर्भाग्यपूर्ण और अनावश्यक बताया। उन्होंने कहा कि नियुक्ति राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 217(1) के तहत की है और न्यायाधीशों की नियुक्ति की तय प्रक्रिया का पूरी तरह पालन हुआ है। अधिकृत जानकारी के मुताबिक बीते 6 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उक्त नियुक्ति की सिफारिश की थी जिस पर 10 अगस्त को पंजाब व हरियाणा सरकारों से राय मांगी गई। हरियाणा ने तो समय पर राय दे दी, परंतु पंजाब ने अपनी राय नहीं भेजी। श्री जैन ने कहा कि राज्य की राय जरूरी है, लेकिन बाध्यकारी नहीं और न ही उसके पास वीटो का अधिकार ही है। इस सबके बीच पंजाब और हरियाणा बार एसोसियेशन भी मुख्यमंत्री के विरोध में कूद पड़ा। एसोसियेशन के ऑनरेरी सेक्रेटरी परमप्रीत सिंह बाजवा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति का पंजाब सरकार द्वारा विरोध किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और कार्यपालिका को न्यायिक नियुक्तियों पर राजनीतिक दबाव नहीं बनाना चाहिए। एसोसिएशन की आपात बैठक में कार्यकारिणी ने पंजाब सरकार से नियुक्ति प्रक्रिया का सम्मान करने और हाईकोर्ट की गरिमा बनाए रखने की अपील की। एसोसिएशन ने न्यायपालिका के साथ मजबूती से खड़े रहने का संकल्प भी लिया। इस प्रकार मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान और आम आदमी पार्टी इस मामले में अकेले पड़ गए। उन्हें उम्मीद थी कि कांग्रेस मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में पंजाब सरकार की उपेक्षा किये जाने के लिए केन्द्र सरकार पर हमला करेगी। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। और तो और बार एसोसियेशन ने भी राज्य सरकार के विरोध को गलत ठहराकर मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा कर दिया। सवाल ये है कि मान सरकार ने मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति पर क्या सोचकर ऐतराज किया ? संभवतः वे विधानसभा चुनाव के पहले ये प्रचारित करना चाह रहे थे कि केन्द्र पंजाब से दुर्भावना रखता है। लेकिन कांग्रेस और बार एसोसियेशन ने उनके विरोध में बयान देकर राज्य सरकार को ही कटघरे में ला खड़ा किया। वैसे भी ये ऐसा मुद्दा नहीं था जिस पर इस नाजुक मौके पर केन्द्र से पंगा लिया जाए। ये देखते हुए लगता है मुख्यमंत्री मान अपने राजनीतिक संरक्षक दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नक्शे कदम पर चल रहे हैं जिनका 10 वर्षीय कार्यकाल केन्द्र की मोदी सरकार से लड़ते - भिड़ते बीता और अंततः वे सत्ता और प्रतिष्ठा दोनों गँवा बैठे। पंजाब से आ रहे संकेत वहाँ भी दिल्ली जैसा तख्ता पलट होने की संभावना जता रहे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री मान की हरकतें सुनिश्चित बना रही हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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