Thursday, 10 September 2026

कश्मीरी पंडितों को मिल रही धमकियों को गंभीरता से लेना जरूरी



जम्मू कश्मीर में अलगाववाद को जन्म देने वाली धारा 370 को हटे सात वर्ष बीत गए। इन दौरान झेलम और चिनाब में न जाने कितना पानी बह चुका है। शुरुआत  में वहाँ  केंद्र सरकार के उस कदम को लेकर गुस्से से अधिक ये डर था कि धारा 370  हटने पर  जम्मू कश्मीर को प्राप्त विशेष हैसियत खत्म होने से  केंद्र सरकार की दखलंदाजी बढ़ जाएगी ।इससे भी बड़ा कारण था  पूर्ण राज्य की हैसियत खत्म कर उसे केंद्र शासित राज्य बनाने के साथ ही कारगिल और लद्दाख़ को  उससे अलग कर  देना। हालांकि जम्मू कश्मीर में विधानसभा कायम रखी गई किंतु पूर्ण राज्य के दर्जे के अभाव में केंद्र का नियंत्रण शासन - प्रशासन पर बढ़ गया। केंद्र सरकार ने इतने योजनाबद्ध  तरीके से सब किया कि अलगाववादी नेताओं के अलावा राजनीतिक पार्टियां भी  दंग रह गईं। विधानसभा भंग रहने से राज्य का प्रशासन चूंकि राज्यपाल के अधीन था  लिहाजा  संभावित प्रतिरोध से निपटने के सभी इंतजाम इतनी कुशलता से किये गए कि  अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की धमकियाँ धरी रह गईं। पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले हुर्रियत काँफ्रेस के अलगाववादी नेता भी चूं - चपाट नहीं कर सके। आम जनता शुरुआत में तो  सहमी - सहमी रही किंतु जल्द ही सब सामान्य होने लगा। उसके बाद केंद्र सरकार ने नये सिरे से परिसीमन करवाया । इसके कारण जम्मू और घाटी के बीच जो राजनीतिक असंतुलन बना हुआ था वह दूर किया जा सका। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में भारी मतदान से साबित हो गया कि अलगाववादियों की धमकियों को ठेंगा दिखाते हुए जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को महत्व दिया। राज्य में इतने निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव पहले कभी नहीं हुए। उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और पूर्ण राज्य के दर्जे की वापसी के मुद्दे के अलावा केंद्र के साथ रिश्ते भी बेहतर रहे।  कई मसलों पर मेहबूबा मुफ्ती भले ही केंद्र से टकराव के मूड में नजर आईं किंतु उमर और उनके पिता फारुख अब्दुल्ला ने बेहद सकारात्मक रुख दिखाया। राज्य में पर्यटन उद्योग के पुराने दिन लौटने से अर्थव्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ। यद्यपि पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना से माहौल खराब करने की कोशिश पाकिस्तान की तरफ से हुई जिसके जवाब में ऑपरेशन सिंदूर हुआ। उसके बाद घाटी में एक बार फिर सामान्य स्थितियाँ लौटीं जिसका प्रमाण पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। शिक्षण संस्थान भी नियमित चल रहे हैं। खेल प्रतियोगिताएं आयोजित होने लगीं। सिनेमा घरों में दर्शक बेखौफ आने लगे। कुल मिलाकर शांति - व्यवस्था बहाल होने से  खुशनुमा माहौल नज़र आने लगा । लेकिन अचानक कश्मीर घाटी में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत कश्मीरी हिंदू (पंडित) कर्मचारियों को आतंकवादी संगठनों द्वारा लगातार नौकरी छोड़ने या मौत का सामना करने की धमकियां मिलने की खबरों से चिंता के बादल मंडराने लगे। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े छद्म संगठन यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल द्वारा घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के नाम, फोन नंबर, पते और गाड़ियों के नंबर तक सार्वजनिक कर दिए जाने से  लगभग 7,000 कश्मीरी हिंदू कर्मचारी चिंता और दशहत में हैं।  सुरक्षा एजेंसियां कर्मचारियों की सुरक्षा पुख्ता करने के लिए प्रयासरत हैं किंतु अचानक उत्पन्न इस स्थिति ने घाटी में पंडितों के पुनर्वास की योजना को खतरे में डाल दिया क्योंकि अपनी और परिवार की सुरक्षा के प्रति उनकी चिंता सर्वोपरि है। हालांकि उमर सरकार ने इन धमकियों का विरोध किया है और अन्य किसी संगठन ने भी कश्मीरी पंडितों के विरोध में आवाज नहीं उठाई किंतु केंद्र सरकार को इस पर पैनी नज़र रखनी चाहिए। ऐसा लगता है जिस आतंकवाद को उसने बड़ी ही हिम्मत के साथ खत्म किया उसके कुछ बीज मिट्टी में दबे रह गए जो समय - समय पर अंकुरित होते रहते हैं। यद्यपि सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते वे कामयाब नहीं हो पा रहे। इसके अलावा स्थानीय लोगों का भी पहले जैसा सहयोग उनको नहीं मिल रहा। बावजूद इसके इन धमकियों को गंभीरता से लेना चाहिए। राज्य सरकार की गतिविधियों की भी चौकसी जरूरी है क्योंकि अब्दुल्ला परिवार के मन में अभी भी 370 हटने की कसक बाकी है। पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे सरकार विरोधी आंदोलन से भन्नाया पाकिस्तान नये सिरे से घाटी में आतंकवाद फैलाने का षडयंत्र रच सकता है। कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को दी जा धमकियाँ दरअसल भारत सरकार को चुनौती है। इसलिए इसके पहले कि आतंकवाद रूपी सांप फिर फन उठाये उसे कुचल देना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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