दिल्ली में नीट परीक्षा प्रश्न पत्र लीक होने के विरोध में चल रहा आंदोलन दो टुकड़ों में बट चुका है। उल्लेखनीय है नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर राजधानी के जंतर मंतर पर काफी दिनों से धरना दिया जा रहा है। बाद में इसमें लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी उसी मांग को लेकर अनशन शुरू कर दिया तो आंदोलन की चर्चा सर्वत्र फैलने लगी। विभिन्न पार्टियों के नेता उनसे मिलने आये और समर्थन दिया। लेकिन श्री वांगचुक के आग्रह पर भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी धरना स्थल पर नहीं आये और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा को भेजकर रस्म अदायगी कर दी। अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी जंतर मंतर से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी। लेकिन आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल सहित तमाम नेता धरना स्थल पर उपस्थिति दर्ज करवाने में सबसे आगे दिखे। इस वजह से पहले से चल रही इस चर्चा को बल मिला कि सोशल मीडिया से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी भी आम आदमी पार्टी की मानस पुत्री ही है। वामपंथी छात्र संगठनों ने भी इस आंदोलन में खुलकर हिस्सेदारी दिखाई। राहुल गाँधी के धरनास्थल पर आकर सोनम वांगचुक से न मिलने का कारण जल्द स्पष्ट हो गया। दरअसल कांग्रेस इस बात को भांप गई कि जनता पार्टी की आड़ में अरविंद केजरीवाल खुद को पुनर्स्थापित करना चाह रहे हैं ताकि निकट भविष्य में होने जा रहे विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी मजबूती से खड़ी हो सके। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पंजाब जहाँ आम आदमी पार्टी ही सत्ता में है। लेकिन उसकी लोकप्रियता लगातार गिरने से कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं। दूसरी ओर भाजपा भी प. बंगाल जैसा उलटफेर करने की तैयारी कर रही है। हिमाचल प्रदेश में भी आम आदमी पार्टी , कांग्रेस के मतों में सेंध लागाएगी । दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता हाथ से निकल जाने के लिए राहुल को जिम्मेदार मानते हैं जिन्होंने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर भाजपा की राह आसान बना दी। उसके बाद से ही दोनों में छत्तीस का आंकड़ा चला आ रहा था। इसीलिए कांग्रेस जो पहले से ही नीट परीक्षा मामले में मुखर थी, जंतर मंतर के धरने से कटी - कटी रही। 20 जुलाई को जब संसद भवन की ओर बढ़ रही भीड़ पर लाठीचार्ज हुआ और पूरे देश में उसकी चर्चा हुई तब कांग्रेस को लगा कि अब भी वह इस आंदोलन से दूर रही तो फिर मुद्दा उसके हाथ से पूरी तरह फिसल चुका होगा और वह युवा विरोधी कहलायेगी। इसीलिए गत दिवस राहुल गाँधी ने सबको चौंकाते हुए प्रधानमंत्री निवास पर डेरा जमाया और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह की समझाइश पर भी नहीं उठे तब पुलिस ने उन्हें और प्रियंका वाड्रा को हिरासत में लेकर कुछ देर बाद रिहा कर दिया। राजनीतिक तौर पर ये सामान्य घटना थी किंतु इसके जरिये काँग्रेस ने आंदोलन की लगाम अपने हाथ में लेने का दांव चल दिया। इसका असर भी फौरन दिखा जब आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमन्त्री आतिशी मार्लेना ने सोशल मीडिया पर इसे जंतर मंतर का आंदोलन कमजोर करने के लिए कांग्रेस और भाजपा की जुगलबंदी बता दिया। स्मरणीय है कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी को भाजपा की बी टीम कहा जाता रहा है। इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी के लोगों ने देर रात कनाट प्लेस में उपद्रव मचाकर अपनी खीझ निकाली। लेकिन कल के घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि छात्रों के नाम पर राजनीतिक पार्टियां अपना स्वार्थ सिद्ध करने में जुटी हैं। न जंतर मंतर पर नीट पीड़ित छात्र नजर आ रहे हैं और न ही राहुल के साथ दिखे। संसद जाते हुए लाठी खाने वालों में भी छात्र कम आंदोलनजीवी ज्यादा थे। भले ही दोनों पक्ष अपने - अपने मतलब के लिए आंदोलन को आगे खींचते रहें किंतु उसकी गंभीरता और वजनदारी रोज घटती जा रही है। संसद का सत्र चलने के कारण जो सरगर्मी है वह भी जल्द खत्म होना तय है। विडंबना ये है कि इस आंदोलन का चेहरा बने लोगों का छात्रों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे में पहले दिन से दिशाहीन नजर आ रही ये मुहिम पूरी तरह भटकते हुए राजनेताओं के शिकंजे में आ चुकी है। रही बात कॉकरोच जनता पार्टी की तो उसका वही हश्र होना तय है जो कॉकरोच का होता है। वैसे भी उसका नियंत्रण विदेश में बैठी उन अदृश्य शक्तियों के हाथ में है जो भारत में अराजकता फैलाना चाह रही हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment