Monday, 8 July 2024

बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच मोदी की मॉस्को यात्रा पर सबकी निगाहें



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत - रूस सम्मेलन में भाग लेने मॉस्को जा रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद उनकी यह पहली रूस यात्रा है जो रूसी राष्ट्रपति पुतिन के निमंत्रण पर हो रही है।  यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि श्री मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद रूस जा रहे  हैं। इस बार उनकी सरकार सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर हैं। इसे उनके प्रभाव में कमी के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रपति पुतिन उनके प्रति किस प्रकार पेश आते हैं उससे दोनों देशों के संबंधों का भविष्य तय होगा। यूक्रेन युद्द के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण रूस , अमेरिका सहित समूचे पश्चिमी देशों से कट गया। ऐसे में केवल भारत और चीन ही हैं जिन्होंने उसके साथ व्यापारिक और सैन्य रिश्ते पहले से ज्यादा मजबूत किये। कच्चे तेल और गैस के अलावा अन्य तकनीकी चीजों की खरीदी बड़ी मात्रा में दोनों के द्वारा की गई। इससे अमेरिका थोड़ा नाराज जरूर हुआ किंतु वैश्विक स्तर पर भारत की जो मजबूत स्थिति है उसकी वजह से वह ज्यादा कुछ न कर सका। वैसे उसके साथ भी भारत के व्यापारिक और कूटनीतिक  संबंध अब तक के सबसे अच्छे दौर से गुजर रहे हैं।  इसका बड़ा कारण पाकिस्तान का लगातार कमजोर और अस्थिर होते जाना है। वहीं अमेरिका इस बात को भली - भाँति समझ चुका है कि भारत अब एक ऐसी शक्ति बन चुका है जो दक्षिण एशिया में चीन के विस्तारवाद को रोकने में सक्षम है। बीजिंग के साथ चले आ रहे सीमा विवाद पर नई दिल्ली के कड़े रुख और सीमावर्ती क्षेत्रों में आवागमन के बेहतरीन प्रबन्ध के साथ ही सैनिकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि से अमेरिका भी प्रभावित है। भारत द्वारा अग्रिम मोर्चे तक लड़ाकू विमान और लम्बी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें तैनात करने से चीन दबाव में आया है। उसकी वन बेल्ट वन रोड परियोजना भी खटाई में पड़  चुकी है।  पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में  पाकिस्तान और चीन के विरोध में जो आवाजें बुलंद हो रही हैं उससे अमेरिका भारत की उपेक्षा करने की जुर्रत नहीं कर सकता। लेकिन  यूक्रेन संकट के बाद  रूस और  चीन के बीच निकटता बढ़ने से भारत की चिंताएं बढ़ चली हैं। यद्यपि दोनों के बीच लम्बे समय तक तनावपूर्ण सम्बन्ध रहे।  साम्यवादी विचारधारा के बावजूद सोवियत संघ की सर्वोच्चता चीन ने कभी स्वीकार नहीं की। लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तब चीन को रूस के साथ रिश्ते सुधारने के फायदे नजर आने लगे। रूस द्वारा बेचे जाने वाले कच्चे तेल का चीन सबसे बड़ा खरीददार  बन गया। सैन्य तकनीक भी उसने वहाँ से ली। बदले में रूस ने भी चीन को कूटनीतिक समर्थन देने में कोई कंजूसी नहीं की। ताईवान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दोनों देश सुरक्षा परिषद के सदस्य हैं जहाँ कश्मीर विवाद में रूस सदैव भारत के साथ खड़ा रहा जबकि चीन विरोध में। इसलिए पुतिन और जिनपिंग के बीच बढ़ती नजदीकी नई दिल्ली की चिंता बढ़ाने वाली है।  उस परिप्रेक्ष्य में श्री मोदी की मॉस्को यात्रा का रणनीतिक महत्व है। उल्लेखनीय है यूक्रेन पर हमले का भारत ने न तो समर्थन किया और न ही विरोध।  ये बात भी सही है कि इस युद्ध से वैश्विक स्तर पर जो उथल - पुथल हुई उसका प्रत्यक्ष न सही किंतु अप्रत्यक्ष असर तो हम पर भी पड़ा है। कोरोना के बाद आये इस संकट ने दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। भारतीय प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के समय ही अमेरिका में नाटो देशों का शिखर सम्मेलन हो रहा है। यूक्रेन युद्ध के एक कारणों में यूक्रेन का नाटो की तरफ झुकना भी था। पुतिन को भय था कि इस बहाने अमेरिका उसके दरवाजे पर आकर बैठ जाएगा। सोवियत संघ के हिस्से रहे पूर्वी यूरोप के कुछ देशों के नाटो से जुड़ने के कारण भी रूस काफी चिंतित था। ऐसे समय में भारत ने युद्ध रोकने की अपील तो की परंतु अमेरिकी अपेक्षाओं के विरुद्ध रूस की निंदा से परहेज किया। इसलिए राष्ट्रपति पुतिन भी भारत को महत्व देते आये हैं किंतु कुछ समय से चीन की तरफ उनका झुकाव शंका उत्पन्न करने वाला है। तीसरी बार सरकार बनाने के बाद श्री मोदी की मॉस्को यात्रा का बहुआयामी महत्व है। रूसी राष्ट्रपति से आमने - सामने की बातचीत में वे आपसी सम्बन्धों की मजबूती के बारे में उनका रुख जानने का प्रयास करेंगे और भारत - चीन के बीच विवाद के बारे में जानकारी देकर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करेंगे। अमेरिका में इसी साल राष्ट्रपति चुनाव होंगे। मौजूदा राष्ट्रपति बाईडेन की गद्दी खतरे में है। लेकिन यदि डोनाल्ड ट्रंप वापस व्हाइट हाउस पर काबिज हुए तब यूक्रेन संकट और गहरा जायेगा। फ्रांस में भी सत्ता परिवर्तन के आसार हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बन गई ।  वहीं ईरान में हिज़ाब विरोधी उदारवादी राष्ट्रपति चुनकर आ गए जो अमेरिका और यूरोपीय देशों से रिश्ते सुधारने इच्छुक हैं। इस प्रकार दुनिया के बदलते परिदृश्य के बीच हो रही श्री मोदी की मॉस्को यात्रा पर चीन सहित पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 6 July 2024

ईरान में सुधारवादी राष्ट्रपति भारत के लिए शुभ संकेत



  ब्रिटेन के साथ ही ईरान में भी राष्ट्रपति का चुनाव हुआ जिसमें सुधारवादी उम्मीदवार मसूद पेजेशकियान ने  जीत हासिल करते हुए  कट्टरवादी सईद जलीली को बड़े अंतर से हराया। कुरान के शिक्षक और पेशे से चिकित्सक श्री पेजेशकियान की छवि एक ऐसे नेता के तौर पर  है, जो सुधारों में यकीन रखता है। वे अमेरिका के घोर विरोधी होने के बाद भी  वे पश्चिमी मुल्कों के साथ संबंधों को सुधारने पर यकीन रखने वाले नेता हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि वे हिजाब का ऐलनिया विरोध कर चुके हैं तथा शरीया लागू करने के लिए लागू की गई मॉरल पुलुसिंग से भी सहमत नहीं हैं। यही वजह है उन्हें युवाओं का भरपूर समर्थन मिला।  श्री पेजेशकियान ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को शिथिल करवाने के लिए परमाणु अप्रसार संधि मानने के  लिए भी राजी हैं। यद्यपि देश के सत्ता संचालन पर हावी कट्टरपंथी उनकी सुधारवादी नीतियों को किस हद तक लागू होने देंगे ये कह पाना अभी कठिन है किंतु यदि वे युवा शक्ति को संगठित कर उनमें सफल हो सके तब वह  भारत के लिए काफी अनुकूल होगा। उदाहरण के लिए पश्चिमी मुल्कों के साथ ईरान के रिश्ते सुधर जाते हैं तब भारत और ईरान के  बीच सस्ते कच्चे तेल सम्बन्धी समझौता पूरी तरह से अमल में आ जायेगा जिसके चलते हमारी अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिलेगा। ईरान के रिश्ते पाकिस्तान से चूँकि बेहद खराब हैं इसलिए भी यह देश हमारे लिए उपयोगी है। देखने वाली बात ये होगी कि हमारा विदेश मंत्रालय ब्रिटेन और ईरान के नये शासकों को भारतीय हितों के अनुकूल किस तरह ढाल पाता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


     

ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि करने पर जोर दिया जाए


गत दिवस ब्रिटेन के आम चुनाव में 14 साल बाद कंजरवेटिव पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और लेबर पार्टी भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। इसके कूटनीतिक फलितार्थ तो भविष्य में देखने मिलेंगे किंतु भावनात्मक तौर पर भारतीय मूल के  ऋषि सुनक चूँकि प्रधानमंत्री थे इसलिए भारत को ऐसा लगता था कि उनकी सरकार हमारे लिए हितकर रहेगी। यद्यपि इस दौरान दोनों देशों के रिश्ते तो काफी मधुर रहे किंतु प्रधानमंत्री रहते श्री सुनक ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे प्रतीत होता कि अपने पूर्वजों के देश के प्रति उनके मन में कुछ कर गुजरने का भाव हो। उल्लेखनीय है ब्रिटेन उनकी मातृभूमि है किंतु परिवार हिन्दू धर्म का पालन करता है। और तो और पत्नी अक्षता , भारत की प्रख्यात सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की बेटी हैं। उनकी माँ सुधा मूर्ति भी राज्यसभा में मनोनीत सांसद हैं। जी - 20 सम्मेलन में जब श्री सुनक और अक्षता दिल्ली आये तब वे अक्षरधाम मंदिर भी गए थे। उनकी पराजय से निश्चित तौर पर भारत को भावनात्मक तौर पर धक्का लगा किंतु नये प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चूंकि कश्मीर विवाद को भारत - पाकिस्तान के बीच का मामला मानने की बात कह चुके हैं इसलिए उनकी जीत से दोनों देशों के रिश्ते और अच्छे होने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन चिंता की एक बात ये है कि इस चुनाव में भारतीय मूल के जो 28 सांसद जीते उनमें से 12 सिख हैं। 28 में अधिकांश कंजरवेटिव पार्टी के हैं। जो सिख सांसद जीतकर आये  उनमें से कुछ खालिस्तानी मानसिकता के भी हैं । वे भारतीय हितों के विरुद्ध काम करने प्रधानमंत्री को बाध्य कर सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये है कि श्री स्टार्मर के पास चूँकि भारी बहुमत है इसलिए वे बिना दबाव में आये काम  करते रहेंगे। सबसे बड़ा मसला है दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार संधि । सिद्धांत रूप में तो इस पर सहमति बन चुकी है किंतु कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिसके चलते उस पर हस्ताक्षर न हो सके। ब्रिटेन इन दिनों  भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है। सुनक सरकार की करारी पराजय के पीछे भी यही वजह बना। जबकि प्रधानमंत्री बनने के पूर्व वे वित्त मंत्री रह चुके थे। कोरोना और उसके बाद यूक्रेन - रूस युद्ध शुरू होने से पूरा यूरोप चपेट में आ गया किंतु ब्रिटेन  सर्वाधिक प्रभावित हुआ। ऐसे में भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि उसके लिए भी फायदेमंद रहेगी। नये प्रधानमंत्री पर इसके लिए दबाव डालने के लिए भारतीय मूल के सांसदों और बड़े उद्योगपतियों को मध्यस्थ बनाने से  बात बन सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 July 2024

अवैध कालोनियां बनवाने वाले नौकरशाहों और नेताओं पर भी लगाम कसी जाए

म.प्र के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गत दिवस विधानसभा में स्पष्ट किया कि अवैध कालोनियों को वैध नहीं किया जाएगा । उल्टे उनको बसाने वालों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कारवाई की जाएगी। दूसरी तरफ उन्होंने ये घोषणा भी कर दी कि सस्ते प्लाटों के लालच में जिन लोगों ने वहाँ मकान बनवा लिए हैं उनके नक्शे स्वीकृत कर अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रबंध किया जाएगा। भविष्य में अवैध कालोनियों को बनने से रोकने के लिए कड़ा कानून बनाये जाने की बात भी मंत्री जी ने कही। वैसे ये समस्या राष्ट्रव्यापी है। महानगर तक इससे अछूते नहीं रहे। प्रश्न ये है  कि अवैध कालोनी बिना स्थानीय निकाय के अमले की जानकारी के कैसे बन सकती है ? एक - दो घरों का निर्माण हो तो उसकी अनदेखी होना भी स्वीकार किया जा सकता है किंतु जहाँ दर्जनों मकानों का  निर्माण हो रहा हो और संबंधित सरकारी विभाग को कानों कान खबर न हो इससे बड़ा असत्य कोई  हो नहीं सकता। विधानसभा में ये बात भी उठी कि अवैध कालोनी में रहने वाले मतदाता चुनाव प्रचार हेतु आने वाले प्रत्याशियों को घेरकर वहाँ बिजली, पानी और सड़क की मांग करते हैं, लिहाजा उनको वैध घोषित किया जाए। श्री विजयवर्गीय का ये कहना तो उचित  है कि अवैध कालोनी को वैध नहीं किया जाएगा किंतु जब उनमें बने मकानों के नक्शे स्वीकृत कर अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाएंगी तब उन्हें वैध स्वरूप अपने आप हासिल हो जाएगा। इस बारे में नया कानून जब बनेगा तब की तब देखी जाएगी किंतु जिन इलाकों में अवैध कालोनियाँ बन चुकी हैं वहाँ  स्थानीय निकायों के उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी तो कारवाई होनी चाहिए जिनकी लापरवाही कहें या मिलीभगत से हर शहर और कस्बे  में  धड़ाधड़ गैर कानूनी कालोनियों बन गईं। ये भी गौरतलब है कि  जनप्रतिनिधि मतों के लालच में अवैध कालोनियों में बिजली, सड़क और पानी का इंतजाम करवा देते हैं। यही हाल झुग्गी- झोपड़ियों का है जो कुकुरमुत्तों की तरह सरकारी भूमि पर फैलती जाती हैं किंतु शुरुआत में उन्हें रोकने के बजाय शासकीय अमला और नेता बिरादरी उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। अनेक झुग्गियों को कोई माफिया बसाकर वहाँ रहने वालों से वसूली करता है। जो पार्षद, विधायक और सांसद इन बस्तियों में पक्की सड़कें, बिजली के खम्बे और पेय जल की व्यवस्था करते हैं उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि ये जानते हुए कि संबंधित बस्ती सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर बसाई गई , उन्होंने वहाँ विकास कार्य क्यों करवाए? ये वोट बैंक का ही खेल है कि जब ऐसी बस्ती को अतिक्रमण विरोधी अभियान के अंतर्गत हटाने का प्रयास होता है तब नेताओं की फौज गरीबों की हितैषी बनकर आ जाती है । और जब इन्हें हटाया जाता है तब उसके वॅाशिंदों को गरीबी का हवाला देकर वैकल्पिक स्थान या मकान देने की व्यवस्था की जाती है। यही स्थिति अवैध मानी जाने वाली कालोनियों की है। उनमें बने मकानों का निर्माण बिना नक्शा स्वीकृत करवाए किये जाने  के बाद भी मानवीयता के आधार पर तोड़े जाने से परहेज किया जाता है । चूँकि उनके निवासी मतदाता हैं इसलिए उनको सभी सुविधाएं दिलवाना नेताओं के राजनीतिक स्वार्थों से जुड़ा होता है। कुल मिलाकर ये पूरा मामला नौकरशाही और नेताओं के अपवित्र गठजोड़ से जुड़ा हुआ है। श्री विजयवर्गीय पहले भी इस विभाग के मंत्री रह चुके हैं। उसके अलावा इंदौर के महापौर का दायित्व भी वे संभाल चुके हैं। इसलिए उन्हें समस्या का मूल कारण पता होगा। बेहतर हो वे अपने घर अर्थात नगरीय निकायों के उस अमले को कठघरे में खड़ा करते हुए दंडित करें जिसके कार्यक्षेत्र में अवैध कालोनी अथवा अवैध बस्तियाँ बेरोकटोक आबाद होती चली गईं। इसी के साथ ही उन जनप्रतिनिधियों  से भी ये पूछताछ की जानी चाहिए कि उन्होंने गैरकानूनी आवासीय क्षेत्र में विकास कार्य क्यों करवाया? मंत्री महोदय यदि कानून बनाने से पहले कारवाई की शुरुआत उन नौकरशाह और नेताओं से करें जो अवैध कालोनियों और झोपड़पट्टी को बसाने के सूत्रधार हैं तो उससे सरकार की ईमानदारी  प्रमाणित होने के साथ उस भूमाफिया पर भी शिकंजा कस सकेगा जो अफसरों और राजनेताओं के संरक्षण में बेखौफ अवैध निर्माण करवाता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 July 2024

म.प्र का बजट : मौजूदा परिस्थितियों में इससे ज्यादा करना संभव नहीं था


म.प्र की मोहन यादव सरकार का पहला बजट गत दिवस पेश हुआ। चूँकि सरकार ने कोई नया करारोपण नहीं किया इसलिए आम जनता की नजर में वह अच्छा है। हालांकि बजट में लोक लुभावन घोषणाओं से भी परहेज किया गया है। यहाँ तक कि  पिछली शिवराज सरकार द्वारा प्रारंभ की गई लाड़ली बहना योजना की मौजूदा राशि 1250 रु. प्रतिमाह को भी यथावत रखा गया है जबकि 1000 रु. से शुरू की गई इस योजना में शिवराज सरकार ने 250 रु. बढ़ा दिये थे और इसे 3 हजार तक ले जाने का वायदा किया था। विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबरदस्त जीत में यही योजना तुरुप का पत्ता साबित हुई थी। हालांकि शिवराज यदि प्रदेश की सत्ता में वापस आते तब शायद वे बजट में इस योजना की राशि में उत्तरोत्तर वृद्धि का प्रावधान अवश्य करते किंतु मोहन यादव के सामने खजाने के खाली होने की भी समस्या है। इसीलिए उन्होंने लोक लुभावन घोषणाओं और कार्यक्रमों  से परहेज किया। फिलहाल चुनाव रूपी कोई चुनौती भी सामने नहीं है।  वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने बजट में अधो संरचना, महिलाओं और आदिवासियों पर काफी ध्यान दिया गया है। तीन नये मेडिकल कालेज खोलने का प्रावधान भी किया गया  है। इसी तरह बड़े शहरों में ई बसें चलाने की योजना भी घोषित की गई है। धार्मिक पर्यटन पर भी मोहन सरकार शुरू से काफी जोर दे रही है। इसके लाभ भी मिलने लगे हैं। उज्जैन में महाकाल लोक और ओंकारेश्वर में आद्य शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा खड़ी हो जाने के बाद इन स्थानों पर पर्यटकों की रिकार्ड संख्या आने लगी है। इसीलिए नर्मदा पथ के निर्माण को भी प्राथमिकता सूची में रखा गया है। प्रदेश में संरक्षित वन भी बहुत हैं जो बड़ी संख्या में देशी - विदेशी वन्य प्रेमी सैलानियों को आकर्षित करते हैं। शेरों के मामले में तो म.प्र सबसे अग्रणी है। 2014 के बाद से पूरे देश में राजमार्गों का जो विकास हुआ उससे म.प्र को जबरदस्त लाभ हुआ क्योंकि हृदय प्रदेश होने से सभी दिशाओं को जोड़ने वाले राजमार्गों का कुछ हिस्सा प्रदेश से होकर गुजरता है। इससे सड़क परिवहन में भी काफी वृद्धि हुई है। वहीं प्रदेश में हवाई सेवाओं का जिस तरह विस्तार हुआ वह विकास को प्रमाणित करता है। यद्यपि उद्योगों को लेकर अभी भी बहुत कुछ करना शेष है किंतु ये कहना गलत नहीं होगा कि प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं। बीते वर्षों में हुए निवेशक सम्मेलनों से अच्छा प्रतिसाद मिला। यदि सरकार नियोजित ढंग से प्रयास करे तो आने वाले वर्षो में औद्योगिक दृष्टि से प्रदेश विकसित राज्य की श्रेणी में आ खड़ा होगा। म.प्र को बीमारू राज्य की शर्मनाक स्थिति से निकालने में कृषि क्षेत्र  ने भी शानदार योगदान दिया है। गेंहूँ की पैदावार में तो प्रदेश पंजाब और हरियाणा से आगे आ चुका है। वन संपदा प्रदेश की बड़ी दौलत है जिसकी वजह से यहाँ का पर्यावरण संतुलन बना हुआ है। नर्मदा जैसी सदानीरा नदी यहाँ की जीवन रेखा है। लोक लुभावन घोषणाओं से बचने के बावजूद शवों को घर पहुंचाने के लिए वाहन व्यवस्था इस बजट के मानवीय पक्ष को उजागर करती है। शिक्षकों और पुलिस में भर्ती की घोषणा भी बेरोजगारों के चेहरे पर मुस्कान लाने का काम करेगी। किसानों को शून्य ब्याज दर पर ऋण अच्छी सोच का परिचायक है। प्रदेश में चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने के लिए 3 नये मेडिकल कालेज खोलने का फैसला स्वागत योग्य है किंतु इनमें पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की कमी कैसे दूर होगी ये बड़ा सवाल है। राज्य सरकार को ये तो पता ही होगा कि जो मेडिकल कालेज पहले से चले आ रहे हैं जब वे ही बीमार हों तब नये खोलने का क्या औचित्य है? लड़कियों की शिक्षा हेतु सरकार काफी कोशिशें कर रही है किंतु निजी क्षेत्र की तुलना में शासकीय शिक्षण संस्थानों की दशा बेहद खराब हैं। मोहन सरकार की कार्ययोजनाओं के लिए चूँकि काफी आर्थिक संसाधन चाहिए इसलिए उनमें से बहुत सी बजट का हिस्सा नहीं बन सकीं। विधानसभा चुनाव के पहले पिछली सरकार ने जो दरियादिली दिखाई उसके कारण मौजूदा मुख्यमंत्री के हाथ काफी बंधे हुए थे जिसका असर बजट पर दिख रहा है। लोकसभा चुनाव बीच में आने से संसाधनों का समुचित प्रबंध भी नहीं हो सका। ये देखते हुए श्री देवड़ा ने जो बजट पेश किया वह प्रशंसनीय है। अगले साल जो बजट आयेगा उसमें इस सरकार का आर्थिक दर्शन और स्पष्ट होगा ये उम्मीद की जा सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 July 2024

सत्संग में मौत : आस्था के अतिरेक का दुष्परिणाम


पश्चिमी  उ.प्र के हाथरस जिले के एक गाँव में किसी बाबा के सत्संग में हजारों लोग जमा थे । कार्यक्रम के बाद जब बाबा जाने लगे तब उनके चरण छूने श्रद्धालुओं में होड़ मची। बाबा के निजी सेवादारों ने श्रद्धालुओं को रोकने धक्का - मुक्की  शुरू कर दी। बाबा तो किसी तरह वहाँ से निकल लिए किंतु 122 लोग कुचलकर मारे गए। बड़ी संख्या घायलों की भी है। घटनास्थल से आये चित्र दिल दहला देने वाले हैं। इतने बड़े आयोजन हेतु पुलिस की जो अनुमति ली गई उसमें लोगों के आने की अनुमानित संख्या वाला स्थान रिक्त छोड़ दिया गया। बताया जाता है हजारों की भीड़ के लिए  मात्र 50 पुलिस वाले तैनात किये गए थे। सत्संग में आने वालों की अनुमानित संख्या आयोजकों द्वारा छिपाई गई या उन्हें खुद अंदाज नहीं  था , ये जाँच का विषय है। पुलिस ने गैर  इरादतन ह्त्या का प्रकरण दर्ज कर लिया जो स्वाभाविक है। इस हादसे में गलती किसकी थी ये फ़िलहाल कहना मुश्किल है। बाबा जी तो ये कहकर बच जायेंगे कि सत्संग तो शांति पूर्वक संपन्न हो गया था जो कुछ घटा वह उनके वहाँ से जाते समय हुआ। लेकिन 100 से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौत जिन हालातों में हुई वह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि धार्मिक आयोजनों या किसी देवस्थान के दर्शनों हेतु उमड़ने वाली भीड़ के कारण इस तरह की जानलेवा घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। उनकी जाँच करने के बाद  भविष्य में ऐसा न हो इसकी कार्य योजना  भी बनी किंतु सभी जगह एक जैसा इंतजाम संभव नहीं है। ऐसे में ये स्थानीय प्रशासन का दायित्व है कि  कार्यक्रम की अनुमति देने के पहले सभी सावधानियां बरते। इस हादसे के बारे में जो जानकारी आई उससे स्पष्ट है कि पुलिस का प्रबंध भीड़ को देखते हुए  बहुत कम था। खुफिया विभाग भी अपनी जिम्मेदारी से चूक गया। लेकिन असली दोषी तो इस तरह का आयोजन में आने वाले बाबा हैं जो श्रद्धा का व्यवसायीकरण करते हैं। देश में अनेक प्रवचन करने वाले महानुभाव हैं जो फिल्मी सितारों जैसे नखरे दिखाते हैं। उनका रहन  - सहन रईसी होता है। महँगी गाड़ियों में चलना उनका शौक है। राजनेता इनके आयोजनों में हाजिरी देकर इनका भाव बढ़ा देते हैं। इस वजह से इन पर भी नेतागिरी का भूत सवार हो जाता है। विवादास्पद बयान देकर सुर्खियां बटोरने का शौक भी ये पाल लेते हैं जिसके कारण फजीहत भी झेलनी पड़ जाती है। ताजा उदाहरण म.प्र के एक नामी कथा वाचक का है जिन्हें  हाल ही में नाक रगड़कर माफी मांगनी पड़ी। हालांकि सारे बाबा या कथावाचक एक जैसे हैं ये कहना तो अन्याय होगा किंतु जिस तरह  अर्थशास्त्र में कहावत है कि खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है , वैसे ही कुकुरमुत्तों जैसे बढ़ते जा रहे कतिपय बाबाओं ने आध्यात्मिक जगत में प्रदूषण फैला दिया है। हालांकि जनता भी कम कसूरवार नहीं है जो इनकी अंधभक्त हो जाती है। हाथरस की घटना भी इसी का नतीजा है। बाबा की चरण रज प्राप्त करने के लिए हुई धक्का - मुक्की में 122 लोग अपने प्राण गँवा बैठे। पुलिस द्वारा दर्ज प्रकरण में बाबा का नाम नहीं है लेकिन घटना के बाद उनका  गायब हो जाना संवेदनहीनता नहीं तो और क्या है?  आस्था के अतिरेक और पेशेवर बाबाओं की बढ़ती जमात के चलते इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकना कठिन होता जा रहा है। धार्मिक आयोजनों की  भव्यता के कारण इनका आकर्षण बढ़ता जा रहा है। राजनेता भी बाबाओं का उपयोग अपना जनाधार बढ़ाने में करने लगे हैं । इसके चलते चुनाव के मौसम में प्रवचनों के बड़े - बड़े आयोजन होते हैं। राजनेताओं से निकटता की वजह से अनेक बाबाओं को प्रशासन और पुलिस विशेष महत्व देती है। इस तरह के बाबा ट्रांसफर और पोस्टिंग जैसे कार्य नेताओं से करवाने के कारण काफी प्रभावशाली हो जाते हैं। यही वजह है कि इन पर कोई रोक - टोक नहीं रहती। लेकिन हाथरस हादसा बहुत बड़ी त्रासदी है। कुम्भ जैसे विराट आयोजन तक में इतनी बड़ी दुर्घटना हाल के वर्षों में सुनने नहीं मिली। इसके पीछे किसकी गलती थी ये पता लगाने के लिए ईमानदारी से जाँच करवाई जाना जरूरी है ताकि इसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 July 2024

मुस्लिमों की खुशामद में करोड़ों हिंदुओं को आहत कर गए राहुल



संसद के भीतर कुछ भी बोलने पर चूंकि मानहानि का मुकदमा नहीं लग सकता इसलिए अनेक सांसद वहाँ बहुत कुछ ऐसा बोल जाते हैं जो  बाहर आकर बोलने का साहस नहीं करते। गत दिवस लोकसभा में बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने भी कुछ बातें ऐसी कहीं जो बाहर बोलने पर उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज हो सकता है। श्री गाँधी के उक्त भाषण की काफी चर्चा हो रही है जिसमें उन्होंने  कहा कि जो लोग अपने को हिन्दू कहते हैं वे हिंसक हैं और असत्य का सहारा लेते हैं। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समूचे हिन्दू समाज को हिंसक कहे जाने पर आपत्ति की तब वे पलटी मारते हुए बोले उन्होंने तो भाजपा को लेकर कहा था। उसके बाद उन्होंने भाजपा और रास्वसंघ पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ हिंदुओं के ठेकेदार नहीं है । प्रधानमंत्री से मुखातिब होकर वे यहाँ तक बोल गए कि आप लोग हिन्दू हो ही नहीं। वैसे श्री गाँधी ने अन्य विषयों पर भी सरकार को घेरने का प्रयास किया किंतु सबसे ज्यादा विवाद हिंदुओं को हिंसक कहने वाली बात पर हुआ। ऐसा लगता है जोश -- जोश में वे होश खो बैठे। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर अपने प्रथम भाषण से उन्होंने पप्पू की छवि से निकलने की जो कोशिश की वह फुस्स हो गई । हिंदुओं को हिंसक कहने के बाद भले ही उन्होंने बात को संभालने का भरपूर प्रयास किया किंतु उनकी जुबान से निकले ये शब्द वापस नहीं आ सकते थे कि अपने को हिन्दू कहने वाले हिंसक होते हैं और असत्य का सहारा लेते हैं। प्रधानमंत्री से ये कहना भी कि आप हिन्दू हो ही नहीं इस बात का परिचायक है कि 54 साल के हो जाने के बाद भी उनमें न गंभीरता है और न ही परिपक्वता। अन्यथा श्री मोदी को हिन्दू न बताना सिवाय मूर्खता के और क्या हो सकता है? और वह भी उन जैसे व्यक्ति द्वारा जिसके अपने धर्म की कोई प्रामाणिकता ही नहीं है। भाजपा और संघ को हिंसक बताना भी उस नेता को शोभा नहीं देता जिसकी पार्टी पर हजारों सिखों के नरसंहार का आरोप हो और  उसके कई नेता और पूर्व मंत्री अदालत द्वारा दंडित हो चुके हैं। कुछ पर अब तक मुकदमा चल रहा है। उस नरसंहार के औचित्य को सिद्ध करने संबंधी उनके स्वर्गीय पिता राजीव गाँधी की वह टिप्पणी  शायद वे भूल गए कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। असल में उनके भाषण का निहित उद्देश्य भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीनना था किंतु रामभक्तों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश और सनातन की तुलना डेंगू और कोरोना से करने वाली द्रमुक के साथ बैठने वाले राहुल यदि हिंदुओं को हिंसक बताएं तो वह  संगत का असर है या गठबंधन की मजबूरी ये वही बेहतर जानते होंगे ।  लेकिन उनमें हिम्मत है तो  उन लोगों  को हिंसक बताने की जुर्रत करें जो सिर तन से जुदा के नारे लगाते हैं। नेता प्रतिपक्ष के मुँह से  प. बंगाल और केरल में आये दिन होने वाली राजनीतिक हत्याओं के बारे में शायद ही एक शब्द किसी ने सुना हो। इसका कारण वहाँ की सत्ता में बैठी तृणमूल काँग्रेस और वामपंथियों का इंडिया गठबंधन का सदस्य होना है। इसी तरह क्या वे उद्धव ठाकरे को हिंसक कह सकते हैं जो हिंदुत्व को लेकर भाजपा से कहीं अधिक आक्रामक और मुखर रहे हैं।   श्री गाँधी के पास इस बात का क्या उत्तर है कि अचानक उन्होंने सावरकर का नाम लेना क्यों बंद कर दिया? सही बात ये है कि जबसे शरद पवार ने सावरकर की आलोचना से महाराष्ट्र में राजनीतिक  नुकसान होने का भय दिखाया, श्री गाँधी ने डर के कारण उनका नाम लेना बंद कर दिया । द्रमुक तो खैर , अलग पार्टी है लेकिन काँग्रेस पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी जब सनातन विरोधी बयान का समर्थन किया तब भी श्री गाँधी शांत रहे। कभी खुद को जनेऊधारी सारस्वत ब्राह्मण प्रचारित करने वाले राहुल ने हिंदुओं को हिंसक बताकर उस मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टीकरण का दांव चला है जो श्री मोदी को तीसरी बार सत्ता में आने से रोकने के लिए इंडिया गठबंधन के पक्ष में पूरी तरह  गोलबंद हो गया था। लेकिन इस कोशिश में उन्होंने करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर दिया। आश्चर्य की बात है उद्धव ठाकरे और उनके बड़बोले प्रवक्ता संजय राउत ने अब तक अपने को हिन्दू कहने वालों के हिंसक होने वाले श्री गाँधी के विचार पर प्रतिक्रिया  नहीं दी।


- रवीन्द्र वाजपेयी