Saturday, 6 July 2024

ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि करने पर जोर दिया जाए


गत दिवस ब्रिटेन के आम चुनाव में 14 साल बाद कंजरवेटिव पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और लेबर पार्टी भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। इसके कूटनीतिक फलितार्थ तो भविष्य में देखने मिलेंगे किंतु भावनात्मक तौर पर भारतीय मूल के  ऋषि सुनक चूँकि प्रधानमंत्री थे इसलिए भारत को ऐसा लगता था कि उनकी सरकार हमारे लिए हितकर रहेगी। यद्यपि इस दौरान दोनों देशों के रिश्ते तो काफी मधुर रहे किंतु प्रधानमंत्री रहते श्री सुनक ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे प्रतीत होता कि अपने पूर्वजों के देश के प्रति उनके मन में कुछ कर गुजरने का भाव हो। उल्लेखनीय है ब्रिटेन उनकी मातृभूमि है किंतु परिवार हिन्दू धर्म का पालन करता है। और तो और पत्नी अक्षता , भारत की प्रख्यात सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की बेटी हैं। उनकी माँ सुधा मूर्ति भी राज्यसभा में मनोनीत सांसद हैं। जी - 20 सम्मेलन में जब श्री सुनक और अक्षता दिल्ली आये तब वे अक्षरधाम मंदिर भी गए थे। उनकी पराजय से निश्चित तौर पर भारत को भावनात्मक तौर पर धक्का लगा किंतु नये प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चूंकि कश्मीर विवाद को भारत - पाकिस्तान के बीच का मामला मानने की बात कह चुके हैं इसलिए उनकी जीत से दोनों देशों के रिश्ते और अच्छे होने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन चिंता की एक बात ये है कि इस चुनाव में भारतीय मूल के जो 28 सांसद जीते उनमें से 12 सिख हैं। 28 में अधिकांश कंजरवेटिव पार्टी के हैं। जो सिख सांसद जीतकर आये  उनमें से कुछ खालिस्तानी मानसिकता के भी हैं । वे भारतीय हितों के विरुद्ध काम करने प्रधानमंत्री को बाध्य कर सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये है कि श्री स्टार्मर के पास चूँकि भारी बहुमत है इसलिए वे बिना दबाव में आये काम  करते रहेंगे। सबसे बड़ा मसला है दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार संधि । सिद्धांत रूप में तो इस पर सहमति बन चुकी है किंतु कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिसके चलते उस पर हस्ताक्षर न हो सके। ब्रिटेन इन दिनों  भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है। सुनक सरकार की करारी पराजय के पीछे भी यही वजह बना। जबकि प्रधानमंत्री बनने के पूर्व वे वित्त मंत्री रह चुके थे। कोरोना और उसके बाद यूक्रेन - रूस युद्ध शुरू होने से पूरा यूरोप चपेट में आ गया किंतु ब्रिटेन  सर्वाधिक प्रभावित हुआ। ऐसे में भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि उसके लिए भी फायदेमंद रहेगी। नये प्रधानमंत्री पर इसके लिए दबाव डालने के लिए भारतीय मूल के सांसदों और बड़े उद्योगपतियों को मध्यस्थ बनाने से  बात बन सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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