आज कारगिल विजय की रजत जयंती है। हालांकि युद्ध में विजय भारत के लिए वह पहला अवसर नहीं था। 1962 में चीन ने हमारी पीठ में छुरा भोंककर दोस्ती और कूटनीति दोनों को कलंकित किया। उस पराजय ने जो ठेस पहुंचाई उसकी कसक आज भी दिल में है। यद्यपि उस युद्ध के महज तीन वर्ष बाद ही 1965 में पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठ का दुस्साहस किया । वह युद्ध राजस्थान तक फैल गया किंतु भारत ने उसको जबरदस्त शिकस्त दी। अमेरिका से खैरात में मिले पैटन टैंक और सैबर जेट नामक लड़ाकू विमानों के बल पर जनरल अयूब खान ने कश्मीर हड़पने का सपना देखा किंतु उल्टे भारतीय सेना लाहौर तक जा पहुंची। उस जंग में केवल पाकिस्तान ही नहीं अपितु अमेरिका को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ी क्योंकि भारतीय सेना ने सीमित संसाधनों के बावजूद उसके अत्याधुनिक टैकों और लड़ाकू विमानों के परखच्चे उड़ाकर रख दिये। 1962 में मिली पराजय के बाद सेना के पास साधनों की कमी के साथ - साथ सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँचने के लिए सड़कों का अभाव भी देखने मिला। यद्यपि 1965 तक बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ किंतु वह जंग ज्यादातर मैदानी क्षेत्रों में हुई इसलिए सेना को पराक्रम दिखाने का समुचित अवसर मिला। लेकिन सबसे बड़ी बात रही राजनीतिक नेतृत्व की दृढ़ता । प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को उसी की शैली में जवाब दिया। हालांकि बाद में ताशकंद में हुई वार्ता के दौरान भारत ने युद्ध में कब्जा की पाकिस्तान की भूमि खाली करने के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये। उसकी विपरीत प्रतिक्रिया देश में हो पाती उसके पूर्व ही खबर आ गई कि शास्त्री जी की मृत्यु हो गई। आज भी उस पर रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है। उस युद्ध के बाद चीन से अनेक बार झड़पें हुईं किंतु भारतीय सैनिक भारी पड़े। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान की आंतरिक परिस्थितियाँ बिगड़ने से भारत में शरणार्थियों का तांता लग गया। अंततः दिसंबर में भारत ने सैन्य कारवाई की जिसके बाद पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। लेकिन शर्मनाक पराजय से बड़ा धक्का पाकिस्तान को ये लगा कि उसका पूर्वी हिस्सा टूटकर बांग्ला देश नामक नया राष्ट्र बन गया। उस युद्ध ने भारतीय सैन्य शक्ति और रणनीतिक कुशलता की धाक पूरे विश्व में जमा दी। लेकिन पाकिस्तान ने इसके बाद आतंकवाद रूपी छद्म युद्ध शुरू कर दिया जिसमें पहले पंजाब जला और उसके बाद जम्मू कश्मीर में उसने अशांति फैलाने का कुचक्र रचा जिससे वह राज्य आज तक जूझ रहा है। इसी बीच 1999 में पाकिस्तान के फौजी जनरल परवेज मुशर्रफ ने श्रीनगर से लेह जाने वाले मार्ग में कारगिल क्षेत्र की पहाड़ियों मैं घुसपैठ की योजना को अंजाम दिया। दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि सर्दियों में बर्फबारी होने पर उनके सैनिक निचले इलाकों में चले आयेंगे। लेकिन पाकिस्तान ने अपनी आदतानुसार भारतीय सैनिकों की गैर मौजूदगी का लाभ लेकर सर्दियों में टाइगर हिल के साथ और कुछ चोटियों पर बंकर बना लिए। गर्मियां आने पर इसका खुलासा होते ही भारत ने सैन्य कारवाई की। शत्रु के ऊंचाई पर जमे होने से उन तक पहुंचना बेहद खतरनाक था किंतु अदम्य साहस और वीरता की नई दास्ताँ उस युद्ध में भारतीय सेना ने लिख डाली। दूसरी तरफ पाकिस्तानी सैनिकों ने एक बार फिर हैवानियत का परिचय दिया। युद्धबंदी बने भारतीय सैनिकों और लड़ाकू पायलटों के साथ उन्होंने जिस नृशंसता का परिचय दिया उसने जिनेवा संधि से ज्यादा इंसानियत के कायदों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। उस युद्ध में पाकिस्तान कूटनीतिक मोर्चे पर भी बुरी तरह परास्त हुआ। अमेरिका और चीन जैसे परंपरागत मित्रों ने भी उसका साथ नहीं दिया। जिसके कारण उसे पीछे हटना पड़ा। कारगिल युद्ध कई मायनों में उल्लेखनीय बन गया। जिन हालातों में भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर तिरंगा लहराया उन्होंने सैन्य दृष्टि से नया इतिहास बना दिया। उसके बाद से भारतीय सेना ने कारगिल के साथ ही समूचे लद्दाख़ और अरुणाचल क्षेत्र में जबरदस्त इंफ्रा स्ट्रक्चर तैयार कर दिया जिसमें सड़कें और पुल के अलावा हवाई पट्टी तक शामिल हैं। इसीलिए कारगिल का वह युद्ध भारत के आत्मविश्वास में वृद्धि के साथ ही वैश्विक स्तर पर उसे एक महाशक्ति के रूप में मान्यता दिलवाने में मददगार साबित हुआ। आज उस विजय की रजत जयंती निश्चित रूप से आत्म गौरव की अनुभूति के साथ ही उन वीर जवानों के सर्वोच्च बलिदान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का पावन अवसर है जिन्होंने अपने जीवन को भारत माँ के चरणों में हँसते - हँसते निछावर कर दिया था। कारगिल की उस ऐतिहासिक लड़ाई का नेतृत्व करने वाले सेना के समस्त अधिकारी और जवान भी अभिनंदन के पात्र हैं जिन्होंने भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ और जोड़ दिया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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