Thursday, 25 July 2024

पूरे देश के किसानों के शामिल हुए बिना आंदोलन अधूरा ही रहेगा


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पंजाब - हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें हरियाणा सरकार को एक सप्ताह में शंभु बॉर्डर खोलने कहा था ताकि वहाँ फंसे किसान अपने ट्रैक्टरों से दिल्ली जा सकें।  न्यायालय में हरियाणा सरकार ने तर्क रखा कि किसानों के दिल्ली जाने पर उसे आपत्ति नहीं है किंतु उन्होंने अपने जिन ट्रैक्टरों को बख्तरबंद गाड़ी और टैंक जैसा बना दिया उनको लेकर दिल्ली आने में कानून - व्यवस्था बिगड़ सकती है। अदालत का अभिमत इस बारे में ये था कि पिछली बार  किसानों और  मंत्रियों की वार्ताएं बेनतीजा रहीं क्योंकि मंत्री गण उनकी समस्याओं से अनभिज्ञ थे। ऐसे में स्वतन्त्र वार्ताकार नियुक्त किये जाएं जो एक अच्छी पहल हो सकती है। न्यायालय का ये कहना पूरी तरह सही है कि दोनों पक्षों में आपसी विश्वास का अभाव होने से गतिरोध बना हुआ है।  प्रश्न ये है कि ये अविश्वास क्यों उत्पन्न हुआ? और इसका जवाब ये है कि दिल्ली में साल भर चला किसान आंदोलन शुरू तो तीन कृषि कानूनों के विरोध से हुआ था किंतु धीरे - धीरे  नई -  नई मांगें जुड़ जाने से  वार्ता निष्फल रही । दरअसल पंजाब के किसानों को तत्कालीन काँग्रेस सरकार ने योजनापूर्वक दिल्ली की ओर जाने बाध्य किया जिससे उसका सिरदर्द दूर हो सके। सही बात ये है कि भले ही तीन कृषि कानूनों के विरोध के अलावा एम.एस.पी ( न्यूनतम समर्थन मूल्य) सहित अन्य मुद्दों पर देश भर में किसानों के कुछ संगठन नाराज चल रहे थे लेकिन दिल्ली जाकर लम्बा धरना देने से वे पीछे हट रहे थे। इसीलिए जब दिल्ली में किसान सड़क घेरकर बैठे तब उनके साथ ज्यादा हुजूम नहीं था किंतु दूसरे की सजाई दुकान पर अपना बोर्ड टांगने में सिद्धहस्त मंडली ने उसमें घुसपैठ की जिससे आंदोलन का कुछ - कुछ असर  उ.प्र  के पश्चिमी इलाकों के अलावा तराई क्षेत्र, हरियाणा और राजस्थान में भी दिखने लगा। देश के अन्य हिस्सों से भी गिनती के किसान उसमें शामिल हुए लेकिन मुख्य रूप से वह धरना पंजाब के सिखों के साथ ही  हरियाणा, उ.प्र और राजस्थान के जाटों के प्रभाव में चला गया। उसके साथ चिंताजनक बात ये जुड़ गई कि कैनेडा और ब्रिटेन में बसे खालिस्तानी संगठनों ने उसमें दखल देना शुरू कर दिया और देखते - देखते किसानों के बीच में भिंडरावाले के चित्र युक्त टी शर्ट पहने सिख युवा नजर आने लगे। गुरुद्वारों ने लंगर लगा दिये। जिसके कारण आंदोलन का स्वरूप ही बिगड़ गया। रही - सही कसर पूरी कर दी योगेंद्र यादव जैसे लोगों ने जिनका उक्त आंदोलन से दूर - दूर तक सम्बन्ध न था। कुछ विघ्नसंतोषी पत्रकारों ने  आंदोलन को भाजपा विरोधी बनाने का खेल खेला। और जब भी किसी समझौते की संभावना दिखी तो राकेश टिकैत  और उनकी मंडली ने दूध में नींबू निचोड़ने की शरारत कर डाली। केंद्र सरकार भी समझ चुकी थी कि वह आंदोलन उसके विरोधी खेमे के हाथ चला गया है जो किसानों के कन्धों पर बंदूक रखकर अपना उल्लू सीधा करना चाह रहा था। उ.प्र , पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव सिर पर होने से प्रधानमंत्री ने सबको चौंकाते हुए तीनों कृषि कानून वापस ले लिए।  उ.प्र और उत्तराखण्ड तो  भाजपा के पास ही रहे। लेकिन पंजाब में भाजपा और अकालियों के अलग- अलग होने से दोनों कमजोर हो चले थे ऐसे में टक्कर आम आदमी पार्टी और काँग्रेस में थी जिसमें काँग्रेस का सफाया हो गया। किसान आंदोलन से जुड़े किसान आम आदमी पार्टी  के मुफ्त बिजली और एम. एस.पी की गारंटी के वायदे से आकर्षित हो गए। उसके बाद से कई बार कोशिशें हुईं आंदोलन को पुनर्जीवित करने की किंतु सफलता हाथ न लगी। इसका कारण यही है कि किसानों का न तो कोई सर्व मान्य नेता है और न ही संगठन। इसलिए वह पंजाब के चन्द समृद्ध किसानों  की स्वार्थ पूर्ति का जरिया बन गया। जिस आम आदमी पार्टी ने उनको आसमानी ख्वाब दिखाये थे उसे लोकसभा चुनाव में पंजाब में कुल 3 सीटें मिल सकीं। कल किसान नेता दिल्ली आकर राहुल गाँधी से मिले किंतु जिनकी अपनी पार्टी  किसानों की गुनाहगार है जिसने सत्ता में रहते हुए कभी भी एम.एस.पी को कानूनी गारंटी में शामिल करने का प्रयास नहीं  किया। इसका कारण उसका आर्थिक दृष्टि से अव्यवहारिक होना है। लेकिन आज श्री गाँधी उसका ढोल बजा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस किसानों के मुद्दों को समझने वाले निष्पक्ष वार्ताकार  नियुक्त करने का सुझाव देकर जो दिशा तय की उसे देखते हुए ही किसानों को भी उन लोगों के सामने समर्थन की भीख नहीं माँगना चाहिए जो कृषि के बारे में शून्य हैं। और ये भी कि किसान केवल पंजाब और हरियाणा के अलावा भी पूरे देश में पाए जाते हैं। जब तक पूरे देश का किसान इस आंदोलन से नहीं जुड़ता  उसकी प्रामाणिकता पर संदेह बना रहेगा। हरियाणा विधानसभा के चुनाव जल्द होने वाले हैं। आंदोलन के पीछे एक कारण ये भी है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी




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