परीक्षा का मामला पूरे देश में चर्चित है क्योंकि इसमें सभी राज्यों के अभ्यर्थी शामिल होते हैं। लेकिन विभिन्न राज्यों में होने वाली प्रवेश या नौकरी हेतु चयन परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ी का प्रचार उसकी सीमाओं में सिमटकर रह जाता है। कुछ के प्रकरण जरूर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने से चर्चित हो जाते हैं। इनको लेकर राजनीति भी बहुत होती है किंतु सरकारें बदलने के बाद भी इनमें होने वाली धांधली यदि रुकने का नाम नहीं ले रही तो ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि सत्ता में परिवर्तन होने से व्यवस्था बदलने की उम्मीद व्यर्थ है। लेकिन सूचना तकनीक के इस दौर में परीक्षा के पूर्व प्रश्नपत्र उजागर हो जाना और उसके लिए मोटा लेन - देन होना इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकार की अपनी व्यवस्था या उसके द्वारा अधिकृत अन्य किसी एजेन्सी में कहीं न कहीं ऐसे बेईमान लोग बैठे हैं जो अपनी जेब भरने के फेर में लाखों नौजवानों के भविष्य के साथ खेलने का पाप करते हैं। नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी की जाँच कर रही सीबीआई द्वारा देश के अनेक शहरों में कुछ लोगों की गिरफ्तारियां की गईं हैं। इस बात के प्रमाण भी मिल रहे हैं कि परीक्षा के पहले प्रश्नपत्र प्राप्त करने के लिए बड़े सौदे हुए। प्रश्नपत्र परीक्षा के कुछ देर पहले लीक होने के स्पष्टीकरण पर गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई यह टिप्पणी काफी मायने रखती है कि कुछ मिनिटों पहले प्रश्नपत्र की जानकारी प्राप्त करने के लिए कोई 75 लाख जितनी बड़ी राशि भला क्यों देगा? इससे स्पष्ट है कि सब कुछ बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है जो संबंधित सरकारी विभागों के लोगों की मदद से ही संभव है। ऐसा ही खेल राज्यों में होने वाली सरकारी परीक्षाओं का है। प्रश्नपत्र के लीक हो जाने का प्रत्यक्ष प्रभाव हजारों - लाखों उन लड़के - लड़कियों पर पड़ता है जो दिन रात परीक्षा की तैयारी करते हुए अपना भविष्य संवारना चाहते हैं। परीक्षा टल जाने से बच्चों का परिश्रम और समय के अलावा उनके माता - पिता के पैसे और उम्मीदों पर भी अनिश्चितता के काले बादल मंडराने लगते हैं। प्रश्नपत्र लीक हो जाने की घटना कभी - कभार होती तब समझ में भी आती थी किंतु अब तो आये दिन ऐसी खबरें आने से लगता है पूरी व्यवस्था शिक्षा माफिया के हाथों बिक चुकी है। मामूली किस्म के दलाल पकड़े भी जाते हैं किंतु जो असली सरगना हैं उनकी गर्दन तक या तो जाँच एजेंसियों के हाथ नहीं पहुँच पाते या फिर उनको सत्ता प्रतिष्ठान रूपी रक्षा कवच हासिल है। सच्चाई जो भी हो लेकिन बेरोजगारी के भयावह आंकड़ों के बीच जब बड़ी संख्या में सरकारी पद रिक्त पड़े हैं तब किसी चयन परीक्षा के रद्द होने से उनको भरना संभव नहीं हो पाता। इसी तरह नीट सरीखी प्रवेश परीक्षा के पर्चे लीक होने जैसी घटना के कारण देश को समय पर आवश्यक चिकित्सकों की आपूर्ति विलंबित होती है। देश के समक्ष छोटी - बड़ी अनगिनत समस्याएं हैं। लेकिन प्रश्नपत्र लीक होने और उसकी वजह से परीक्षा रद्द होने की जो समस्या उत्पन्न हुई उससे देश का भविष्य जुड़ा होने से चिंता काफी बड़ी है। दुख इस बात का है कि इसके लिए शीर्ष पद पर बैठे जो मठाधीश सही मायने में जिम्मेदार हैं वे तो सत्ता के संरक्षण में बच जाते हैं जबकि सबसे पहला फंदा उनके गले में ही पड़ना चाहिए। सबसे बड़ी बात ये है कि एक बार रद्द होने के बाद अगली परीक्षा कब होगी इसकी कोई गारंटी नहीं होने से अभ्यर्थी मानसिक तौर पर परेशान होते हैं। इस बारे में जरूरत इस बात की है कि जिस तरह विधायक और सांसद का स्थान रिक्त होने पर उसकी पूर्ति एक निश्चित समय के भीतर करने की संवैधानिक व्यवस्था है उसी तरह से इस तरह की परीक्षा रद्द होने पर उसे दोबारा आयोजित करने की भी समय सीमा निश्चित होनी चाहिए। देश के भविष्य का भाग्य चौपट करना एक गंभीर अपराध है जिसके दोषियों को कड़े से कड़ा दंड मिलना अत्यावश्यक है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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