Friday, 12 July 2024

पहाड़ धसकने की बढ़ती घटनाएं चिंता का विषय



उत्तराखंड के कुछ वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर छाए हैं। इनमें पहाड़ को धसकते हुए दिखाया गया है। कुछ में मलबे के साथ पानी की तेज धार भी आती दिख रही है जो नीचे बह रही नदी  में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देती है। बद्रीनाथ जाने का मार्ग अवरुद्ध है। हजारों यात्री  फंसे हैं जिन्हें होटल, गेस्ट हॉउस आदि के दोगुने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। ये स्थिति समूचे उत्तराखंड में देखी जा सकती है। जो लोग मोबाइल पर रील बनाकर प्रसारित कर रहे हैं उनका उद्देश्य महज मनोरंजन है या वे  सूचना के तौर पर लोगों को आगाह कर रहे हैं ये तो उनको ही पता होगा किंतु जो चित्र देखने मिल रहे है वे  डरावने हैं क्योंकि जिस आसानी से कहीं भी पहाड़ धसक रहा है उससे लगता है हिमालय की भू संरचना को जबरदस्त नुकसान पहुंचा है। भुरभुरी मिट्टी से खड़ी यह पर्वत माला जब तक वृक्षों से आच्छादित रही तब तक ऊपरी इलाकों में होने वाले हिमपात या बरसात का बोझ पहाड़ सह जाता था क्योंकि वृक्षों की जड़ें  बर्फ और पानी के बोझ को सहने की शक्ति मिट्टी को देती रहती थीं किन्तु धनपिपासु ठेकेदारों, भ्रष्ट सरकारी अमले और उनके सिर पर हाथ रखे राजनेताओं की तिकड़ी ने पहाड़ों पर छाई रहने वाली हरियाली छीन ली जिससे वे काले और कुरूप नजर आने लगे। बीते अनेक वर्षों से हिमस्खलन, भूस्खलन और बादल फटने से तबाही के दृश्य देखने मिलने लगे  हैं। दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। हजारों तीर्थ यात्री बीच रास्ते फंसे रहते हैं। कुछ अस्वस्थ होकर दम तोड़ देते हैं। राज्य और केंद्र सरकार के अलावा सेना तथा सीमा सड़क संगठन दुर्घटना स्थल पर पहुंचकर लोगों को राहत देने में पीछे नहीं रहते किंतु अब इस तरह की दुर्घटनाएं जिस तेजी से होने लगी हैं उसकी वजह से समस्या विकराल हो रही है। यद्यपि उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा में सबसे अधिक भीड़ वाला मौसम निकल चुका है किंतु अभी भी हजारों श्रद्धालु पहुँच रहे हैं। वर्षाकाल में पहाड़  धसकने के साथ बादल फटने की घटनाएं ज्यादा होती हैं लिहाजा इन दिनों सावधानी की ज्यादा आवश्यकता है। ऐसे में इस मौसम में यात्रा को रोक देने अथवा यात्रियों की संख्या नियंत्रित करने जैसे उपाय किये जाने चाहिए। इसमें दो मत नहीं है कि वाहनों की बेहिसाब आवाजाही से जो शोर और कंपन होता है वह भी कहीं न कहीं पहाड़ों के लिए कष्टदायी  है। सड़कों को बारहमासी के साथ फोर लेन बना देने से इस पर्वतीय क्षेत्र का सुख चैन छिनने लगा है। पहले तो चारधाम यात्रा अधिकतम दीपावली तक चलती थी किंतु सड़कों का स्तर और चौड़ाई बढ़ जाने से अनेक सैलानी उसके बाद भी वहाँ जाने का दुस्साहस करते हैं जिनका उद्देश्य तीर्थाटन कम और मौज - मस्ती ज्यादा होता है। इसलिए वे यहाँ की पवित्रता और पर्यावरण दोनों को क्षति पहुंचाते हैं। आशय ये है कि जिसे देवभूमि कहा  जाता है वह पर्यटन केंद्र का रूप लेती जा रही है। इस बारे में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में आबादी का पलायन मैदानी इलाकों की ओर होने से गाँव के गाँव खाली हो गए। इनमें रहने वाले लोगों को प्रकृति और पहाड़ की तासीर पता थी। इसलिए वे जल, जंगल और जमीन तीनों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता रखते थे। लेकिन जो लोग बाहर से आकर यहाँ निवेश कर रहे हैं उनका एकमात्र उद्देश्य येन केन प्रकारेण पैसा बटोरना है और उसी के फेर में समूचे यात्रा मार्ग पर कांक्रीट के ढांचे खड़े किये जा रहे हैं और सारी गंदगी पहाड़ और नदियों में  फैल रही है। ये देखते हुए अब उत्तराखंड सरकार को चार धाम यात्रा में आने वाले यात्रियों की संख्या पर नियंत्रण लगाना पड़ेगा। इसके अलावा वाहनों की बेहिसाब आवाजाही पर भी लगाम लगानी होगी जिनसे निकलने वाला धुंआ वृक्षों को क्षति पहुंचाता है। कांक्रीट के बढ़ते निर्माण भी रोके जाने चाहिए। कुल मिलाकर बात ये है कि चार धाम की यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को ये एहसास करवाया जाना जरूरी है कि यह देवभूमि है तो इसकी पवित्रता बनाये रखना उनका कर्तव्य है। तीर्थयात्रियों को भी थोड़ा संयम रखना चाहिए। चार धाम की यात्रा में आ रहे व्यवधानों के बाद भी लोगों का वहाँ जाकर भीड़ लगाना गैर जिम्मेदाराना रवैया है। उनको ये ध्यान रखना चाहिए कि जिसमें अनुशासन न हो वह धर्म नहीं ढकोसला है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

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