Thursday, 11 July 2024

सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता के मुद्दे को फिर जिंदा कर दिया


लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने मुसलमानों के निजी कानूनों के संरक्षण का वायदा किया था।  पार्टी के घोषणापत्र के अलावा  अन्य नेताओं ने प्रचार के दौरान मुस्लिम समुदाय को आश्वस्त किया कि वे शरीयत में वर्णित प्रावधानों से छेड़छाड़ नहीं होने देंगे । दरअसल उसे ऐसा करने की जरूरत इसलिए पड़ गई क्योंकि  भाजपा समान नागरिक संहिता लाने की बात कह चुकी थी। 400 पार के उसके नारे को कांग्रेस ने दलितों और मुसलमानों के बीच ये कहकर प्रचारित किया कि भाजपा तीन चौथाई बहुमत इसलिए हासिल करना चाहती थी ताकि संविधान में बदलाव करते हुए आरक्षण खत्म करे और मुसलमानों के पर्सनल लॉ समाप्त करते हुए समान नागरिक संहिता लागू कर दे। कांग्रेस का यह दाँव कारगर साबित हुआ। यद्यपि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो गए किंतु ये भी सच है कि जनता दल (यू). और तेलुगु देशम जैसे दलों से समर्थन लेने के कारण अब वे समान नागरिक संहिता सदृश मुद्दों पर नीतिगत फैसले लेने का खतरा नहीं उठाना चाहेंगे। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने परोक्ष  तौर पर ही सही किंतु  समान नागरिक संहिता का मुद्दा फिर से जीवित कर दिया। तेलंगाना की एक मुस्लिम महिला ने तलाक़ के बाद परिवार न्यायालय में सी.आर.पी.सी की धारा 125 के अंतर्गत  गुजारा भत्ता हेतु आवेदन दिया। उस पर विचार करने के बाद न्यायालय ने उसके पति को  20 हजार रु. प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। उसके विरुद्ध पति ने उच्च न्यायालय में अपील की जिसने तलाक़शुदा पत्नी को  गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकारी तो माना किंतु राशि घटाकर 10 हजार कर दी। पति महोदय ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में ये कहते हुए चुनौती दी कि शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे ही फैसले को संसद ने 1986 में पलट दिया था जिसके अनुसार मुस्लिम महिला द्वारा गुजारा भत्ता प्राप्त करने के अधिकार को खत्म कर दिया था। बताने की जरूरत नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के उक्त निर्णय को संसद में उलटवा देने की कितनी बड़ी कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ी। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना के मुस्लिम याचिकाकर्ता की अपील ठुकराते हुए अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा कि 1986 में संसद द्वारा पारित कानून सी. आर.पी.सी की धारा 125 के आड़े नहीं आता जिसके अंतर्गत हर विवाहित महिला चाहे वह मुस्लिम ही क्यों न हो, गुजारा भत्ते की पात्र और हकदार है। हालांकि न्यायालय ने ये निर्णय मुस्लिम महिला पर छोड़ दिया कि वह 1986 में  पारित कानून को माने या फिर सी.आर.पी.सी की धारा 125 के अंतर्गत गुजारा भत्ता हासिल करने का विकल्प चुने। इस ताजा फैसले का मुस्लिम समाज निःसंदेह विरोध करेगा क्योंकि इसके कारण तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं द्वारा गुजारा भत्ता लेने का रास्ता खुल गया। देखने वाली बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में रत्ती भर बदलाव भी सहन न करने वाले मुस्लिम धर्मगुरु इस फैसले को किस प्रकार स्वीकार कर सकेंगे जिसमें साफ लिखा है कि  मुस्लिम  सहित हर विवाहित महिला तलाक़ के बाद गुजारा भत्ते की अधिकारी है।  दूसरे शब्दों में कहें तो गत दिवस आये फैसले ने संसद और शरीयत दोनों को एक तरह से चुनौती दे डाली। स्व. राजीव गाँधी ने शाहबानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को तो संसद में अपने विशाल बहुमत के बल पर रद्द करवा दिया किंतु गत दिवस आये फैसले ने उनके बेटे राहुल और कांग्रेस दोनों  को अजीबोगरीब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। क्योंकि जिस मुस्लिम पर्सनल लॉ को सुरक्षित रखने का आश्वासन देकर उन्होंने इस समुदाय का थोक समर्थन हासिल किया उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने सेंध लगा दी। संविधान की किताब लेकर घूमने वाले श्री गाँधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की आलोचना करने से भी बचेंगे। अन्य विपक्षी दलों की स्थिति भी सांप छछूंदर जैसी होकर रह गई जो इस फैसले का स्वागत करेंगे तो मुसलमान नाराज हो जायेंगे और विरोध करेंगे तो हिंदुओं में उसकी विपरीत प्रतिक्रिया होगी। रही बात संसद के जरिये इस कानून को उलटने की तो समान नागरिक संहिता की पैरोकार भाजपा के रहते ये नामुमकिन है। ऐसे में कुछ राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों में ये फैसला विपक्षी दलों के लिए मुसीबत बने बिना नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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