पता नहीं इतनी सी बात पर बखेड़ा खड़ा करने की क्या जरूरत है? यदि उ.प्र सरकार ने काँवड़ यात्रा मार्ग पर खाद्य सामग्री विक्रेताओं को अपने प्रतिष्ठान के साइन बोर्ड पर मालिक का नाम अंकित करने का आदेश जारी किया तो इससे धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव किस प्रकार खतरे में आ गए ये बड़ा सवाल है। इसका उद्देश्य महज इतना है कि शिव भक्त काँवड़िये किसी मुस्लिम प्रतिष्ठान से खाने का सामान न खरीद लें और बाद में विवाद हो। उक्त आदेश हाथ ठेला और खोमचे वालों तक पर लागू होगा। ऐसा इसलिए जरूरी समझा गया क्योंकि मुस्लिम समुदाय के अनेक लोगों द्वारा संचालित प्रतिष्ठानों के नाम भ्रामक होने से ये स्पष्ट नहीं हो पाता कि मालिक कौन है ? चूंकि मुसलमान और मांसाहार समानार्थी हैं इसलिए जो लोग पूरी तरह शाकाहारी हैं वे उनमें खाना खाने या खाद्य सामग्री खरीदने से बचते हैं।धार्मिक कर्मकांड में ज्यादा विश्वास करने वाले लोग तो उन हिंदुओं के यहाँ कुछ खाने से भी कतराते हैं जो माँस भक्षी हैं। मुस्लिम समुदाय में गोमाँस खाने का चलन रहा है वह भी बड़ा कारण है। वैसे काफी बड़ी आबादी मांसाहारियों की होने के बावजूद शाकाहार का चलन बढ़ रहा है। जहाँ तक बात योगी सरकार के आदेश की है तो उसकी सोच स्पष्ट है। जो हिन्दू नियमित मांसाहार करते हैं उनमें से भी बहुत से सप्ताह के कुछ दिनों मसलन मंगल और गुरुवार को मांसाहार नहीं करते। यह वर्ग सभी तीज - त्योहारों पर पूरी तरह शाकाहारी या फलाहारी हो जाता है। नवरात्रि और पितृ पक्ष में भी ऐसा देखने में आता है। काँवड़ यात्री भी यात्रा के दौरान शाकाहारी होते हैं अतः उनके अनुष्ठान की पवित्रता बनाये रखने के लिए दुकानदार का नाम प्रदर्शित करने के लिए योगी सरकार ने आदेश जारी किया तो उसे सामान्य तौर पर लेना चाहिए। मुस्लिम खाद्य प्रतिष्ठानों में हलाल का उल्लेख अलग से किये जाने के पीछे भी उस वर्ग के धार्मिक विश्वास की रक्षा करना ही है। अनेक ढाबे वाले अपने नाम के साथ वैष्णव या हिन्दू शब्द जोड़ लेते हैं। आजकल शाकाहारी भोजन को वैश्विक स्तर पर जैन फूड कहा जाने लगा है। इस सबका उद्देश्य शाकाहारी लोगों की आहार सम्बन्धी शुद्धता की रक्षा करना है। जिस तरह मुस्लिम समाज खाद्य संबंधी अपने नियमों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है वैसी ही भावना अन्य धर्मों के साथ भी जुड़ी हुई है। भारत बहुधर्मी देश है जहाँ सभी के अपने आराध्य और पूजा पद्धति अलग - अलग हैं। कुछ धर्मों के भीतर भी अनेक मत हैं। इस्लाम भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके बीच झगड़े भी होते आये हैं। संविधान सबको अपने विश्वास का पालन करने हेतु अवसर भी देता है और संरक्षण भी। मुस्लिम समाज के कतिपय तत्व अपनी पहिचान छिपाकर हिंदुओं में घुल - मिलकर आपत्तिजनक करतूतें करते पकड़े गए इसलिए उ.प्र सरकार को उक्त आदेश जारी करने पड़े। उल्लेखनीय है म.प्र सरकार ने एक वर्ष पहले उज्जैन के लिए ऐसे ही निर्देश जारी किये थे किंतु वहाँ के मुस्लिम समाज या विपक्षी दलों द्वारा उसका विरोध नहीं किया गया। सही बात तो ये है कि उ.प्र विधानसभा की 10 सीटों के लिए जल्द ही उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें से कुछ उसी अंचल में हैं जहाँ काँवड़ यात्रा निकलती है। चूँकि वहाँ मुस्लिम मतदाता भी खासी संख्या में हैं लिहाजा तुष्टीकरण का खेल शुरू हो गया। प्रशासन का काम ऐसे आयोजनों में अशांति को रोकना है। जिन लोगों को ये लगता है कि ऐसा मुस्लिम दुकानदारों का बहिष्कार करने हेतु किया गया। तो ये मुस्लिम समाज के लिए भी विचारणीय है कि ऐसा क्यों हुआ? और ये भी कि जब उसने लोकसभा चुनाव में किसी दल का सामूहिक बहिष्कार वोट जिहाद के नाम पर किया तब उससे किस मुँह से सद्भाव की उम्मीद की जाती है? जैसा बोओगे , वैसा ही काटोगे वाली उक्ति इस मामले में पूरी तरह सटीक बैठती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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