Wednesday, 17 July 2024

म.प्र में कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है



म.प्र देश के उन राज्यों में है जहाँ कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर  है।  1977   तक समाजवादी और वामपंथी कुछ सीटों पर काबिज रहते थे किंतु जनता पार्टी बिखरने के बाद जनसंघ जब भाजपा के रूप में पुनर्जीवित हुआ तबसे प्रदेश की राजनीति दो ध्रुवों में सीमित होती गई।  बीच - बीच में सपा, बसपा और गोंगपा जैसी पार्टियों ने  अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई किंतु वह ज्यादा समय नहीं चल सकी। परिणामस्वरूप कांग्रेस और भाजपा ही मुख्य खिलाड़ी बच रहे। बाकी की पार्टियां इक्का दुक्का सीटों पर भले ही सफल हो जाएं लेकिन शेष में  यदि वे लड़ती भी हैं तो वोट कटवा की भूमिका में सिमट जाती हैं। बसपा और गोंगपा का नाम इस बारे में प्रमुखता से लिया जा सकता है। वैसे कुछ निर्दलीय भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं। पूरे देश की तरह म.प्र में भी कांग्रेस ने 1967 तक निर्बाध सत्ता चलाई। 1968 में संविद सरकार बनी जो अल्पजीवी रही। उसके बाद 1977 में जनता पार्टी का शासन आया किंतु ढाई साल भी नहीं चला। अगला सत्ता परिवर्तन 1990 में हुआ किंतु 1992 में बाबरी ढांचे के धराशायी होने के बाद कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी और 10 वर्ष काबिज रही। लेकिन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कुशासन की वजह से  2003 के चुनाव में हत्थे से उखड़ गई और तबसे यह प्रदेश भाजपा का स्थायी गढ़ बन गया। शुरू में तेजी से मुख्यमंत्री बदलने से उसकी क्षमता पर संदेह किया गया किंतु शिवराज सिंह चौहान के आने के बाद कांग्रेस की स्थिति बिगड़ती चली गई। यद्यपि 2018 में  भाजपा कुछ सीटों से बहुमत हासिल करने से चूक गई लेकिन कांग्रेस को भी सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों की बैसाखी थामनी पड़ी। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने की हसरत तो पूरी कर ली किंतु उनकी और दिग्विजय सिंह की जुगलबन्दी से मात खाए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 15 महीने बाद ही सत्ता पलट करवा दिया। शिवराज फिर आ गए। उनको लेकर तमाम खबरें उड़ती रहीं लेकिन 2023 का चुनाव उनके नेतृत्व में हुआ जिसमें भाजपा ने समस्त अनुमानों को ध्वस्त करते हुए कांग्रेस को पूरी तरह चित्त कर दिया। लेकिन पार्टी आलाकमान ने उनकी जगह मोहन यादव को कमान सौंपी तो उस निर्णय पर सवाल उठे क्योंकि लोकसभा चुनाव सामने था। हालांकि श्री यादव को बतौर मंत्री अनुभव था जबकि चुनाव लड़वाने में श्री चौहान को  महारत है। लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा ने वो करिश्मा कर दिखाया जो 1977 में भी नहीं हो सका। उसने इस बार छिंदवाड़ा सहित सभी सीटें जीतकर मुख्यमंत्री के चयन को सही साबित कर दिया। श्री सिंधिया और श्री चौहान के केंद्र में मंत्री बन जाने से श्री यादव के सामने खुला मैदान है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अ.भा. विद्यार्थी परिषद से आये विष्णुदत्त शर्मा ने भी संगठन का दायित्व कुशलता पूर्वक संभाल रखा है।सत्ता और संगठन में तालमेल भी बेहतर है। लेकिन दूसरे ध्रुव पर खड़ी कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। लगातार दो  चुनावों में  उसका प्रदर्शन शर्मनाक रहा। हालांकि विधानसभा की करारी पराजय के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष  पद से कमलनाथ को हटाकर अपेक्षाकृत युवा जीतू पटवारी को कमान सौंप दी।  नेता प्रतिपक्ष पद पर भी उमंग सिंगार के रूप में नये खून को अवसर दे दिया। बावजूद इसके लोकसभा चुनाव के नतीजों ने  साबित कर दिया कि म.प्र में मोदी मैजिक कायम है। कमलनाथ के बेटे 2023 में मामूली अंतर से जीते थे किंतु इस बार डेढ़ लाख से हार गए। दूसरी बड़ी हार हुई दिग्विजय सिंह की जो राजगढ़ की अपनी घरेलू सीट पर बुरी तरह हारे। हाल ही में छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा की जीत से स्पष्ट हो गया कि श्री नाथ अब अपना किले की रक्षा करने में भी असमर्थ हैं। उक्त उपचुनाव कांग्रेस विधायक के भाजपा में आने के कारण हुआ। यही हाल दिग्विजय सिंह का है। 1985 में अर्जुन सिंह के केंद्रीय राजनीति में जाने के बाद म.प्र में कमलनाथ और दिग्विजय के हाथ में सत्ता और संगठन की कमान आती गई जो , अब जाकर छूटी है। लेकिन जिन लोगों को पार्टी हाईकमान ने प्रदेश में  कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने का दायित्व सौंपा है वे भी उतने सक्षम नहीं दिखते । ऐसे में निकट भविष्य में पार्टी तब तक कोई उम्मीद नहीं कर सकती जब तक कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के समर्थकों से मुक्त नहीं हो जाती। हो सकता है कमलनाथ प्रदेश में अपनी रुचि कम करते हुए अपने व्यवसाय पर ज्यादा ध्यान दें । उनके पुत्र तो वैसे भी जमने के पहले ही उखड़ गए परंतु दिग्विजय और उनके पुत्र प्रदेश की सियासत में दखल देने से बाज नहीं आयेंगे और यही पार्टी में अंतर्कलह का कारण बनेगा। पार्टी हाईकमान के साथ दिक्कत ये है कि राष्ट्रीय राजनीति में उलझे रहने के कारण उसे प्रदेशों की ज्यादा चिंता नहीं रहती। यही वजह है कि इतना बड़ा गठबंधन बनाने के बाद भी लोकसभा में वह 100 का आंकड़ा नहीं छू सकी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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