Tuesday, 16 July 2024

मुस्लिम समाज विवाद को बढ़ाने के बजाय विवेक से काम ले


म.प्र के धार जिले में स्थित भोजशाला हिंदुओं का पुजा स्थल है या मस्जिद , इसका फैसला करने के लिए उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को जिम्मा सौंपा था। इस विभाग ने खुदाई करने के बाद अपनी रिपोर्ट न्यायालय के साथ ही पक्षकारों के सुपुर्द कर दी। हालांकि न्यायालय की अनुमति के बिना रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना किया गया है किंतु हिंदू पक्ष की ओर से किये जा रहे दावों के अनुसार खुदाई के दौरान जो वस्तुएँ एवं आकृतियाँ प्राप्त हुई वे सब भोजशाला के हिन्दू धार्मिक स्थल होने का प्रमाण देती हैं। इसे वाराणसी की ज्ञानवापी मस्ज़िद  से जोड़कर देखा जा सकता है जहाँ हुई खुदाई में भी हिन्दू आस्था से जुड़े अनेक प्रमाण मिले हैं जिनके बारे में अंतिम फैसला अदालत को करना है। भोजशाला को लेकर हिन्दू पक्ष जहाँ उत्साह से भरपूर है वहीं मुस्लिम खेमे ने खुदाई में मिले सबूतों पर टिप्पणी करने के बजाय दो टूक कह दिया कि मामले का अंतिम हल तो सर्वोच्च न्यायालय में ही होगा। इससे स्पष्ट है कि वह पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर हिन्दुओं के दावे या उच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार न करते हुए विवाद को सर्वोच्च अदालत में ले जायेगा। इसके पीछे उसका उद्देश्य फैसले को टालते रहना है जबकि बुद्धिमत्ता इसी में होगी कि जो वस्तुएँ और आकृतियाँ भोजशाला में की गई खुदाई में प्राप्त हुईं यदि वे उस स्थान को हिंदुओं की आस्था के केंद्र के तौर पर प्रमाणित करती हैं तो बजाय विवाद को लम्बा खींचने के मिल - बैठकर सुलझा लेना चाहिए।  मुस्लिम समाज के धार्मिक गुरुओं , पर्सनल लॉ बोर्ड के अलावा और जिन सगठनों के नेता हैं उनको राम जन्म भूमि पर दशकों चले विवाद से सबक लेना चाहिए। अयोध्या में जिस स्थान पर राम मन्दिर बना है उस पर भी तो बाबरी ढांचा खड़ा था जिसे मुस्लिम समाज मस्जिद का नाम देता रहा। उस विवाद का समाधान भी पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खुदाई से ही हुआ। जिसमें मिले चीजों से ये स्पष्ट हो गया कि बाबरी ढांचा हिन्दू मन्दिर पर खड़ा किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के 5 सदस्यों की जिस पीठ ने राम मन्दिर के पक्ष में निर्णय सुनाया उसमें एक मुस्लिम न्यायाधीश भी थे। सर्वसम्मत उस फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष के पास कोई और रास्ता बचा ही नहीं था। आज विवादित स्थल पर भव्य राम मन्दिर का निर्माण हो चुका है । ज्ञानवापी के अलावा मथुरा स्थित श्री कृष्ण जन्म भूमि से सटी शाही मस्ज़िद का विवाद भी न्यायालय के पास विचाराधीन है। वहाँ भी खुदाई को रोकने के लिए मुस्लिम पक्ष एड़ी चोटी का जोर लगाए पड़ा है। ये सारे विवाद लंबे समय से दोनों समुदायों के बीच कटुता को बढ़ाने का आधार बने हुए हैं। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में इन्हें लेकर मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण इतना जबरदस्त हुआ कि वाराणसी में अरबों - खरबों का विकास कार्य करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डेढ़ लाख के मामूली अंतर से जीत सके। अधिकतर  मुस्लिम बहुल मतदान केंद्रों पर उन्हें 10 से कम मत मिले। जाहिर है इसके पीछे ज्ञानवापी विवाद में हिंदुओं का पक्ष प्रबल होने की संभावना ही है। पूरे देश में मुस्लिम समुदाय ने भाजपा को हराने वाले प्रत्याशी के पक्ष में थोक मतदान किया। इसे अयोध्या में राम मन्दिर के निर्माण के प्रति नाराजगी के तौर पर देखा गया। लेकिन मुस्लिम समुदाय द्वारा भाजपा को हराने हेतु  रणनीतिक मतदान के बाद भी अंततः श्री मोदी तो तीसरी बार प्रधानमंत्री बन ही गए और भाजपा भी अकेले ही समूचे विपक्ष से अधिक सीटें ले गई। इसके बाद मुस्लिम समाज मोदी  विरोध के फेर में  ऐलानिया  तौर पर मुख्य धारा से पूरी तरह अलग - थलग होकर रह गया। वहीं राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और ममता बैनर्जी खुद को भाजपा से ज्यादा हिन्दू समर्थक साबित करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में अब उसको अपने हितों की रक्षा के लिए बजाय राजनीतिक दलों के बहकावे में आने के बहुसंख्यक समुदाय के साथ सामंजस्य बनाकर चलने की नीति अपनानी चाहिए। ज्ञानवापी और भोजशाला में की गई  खुदाई में मिली वस्तुएँ यदि हिन्दू धार्मिक आस्था को प्रमाणित कर रही हैं तो मुस्लिम समाज को बजाय अड़ंगेबाजी के उसे स्वीकार कर लेना चाहिए । अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ते - लड़ते हार जाने के बाद वे हिन्दुओं की सहानुभूति पूरी तरह खो बैठेंगे।


-रवीन्द्र वाजपेयी

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