आज एक और रेल दुर्घटना की खबर आ गई। पटरी से उतरी मालगाड़ी के एक डिब्बे से एक यात्री गाड़ी आकर टकरा गई। प्रारंभिक तौर पर दो लोगों के मारे जाने की जानकारी आई है । 120 कि.मी की रफ्तार से आ रहे मुंबई - हावड़ा मेल ( 12810) के भी कई डिब्बे पटरी से उतर गए। राहत और बचाव का काम शुरू हो गया है किंतु जल्दी - जल्दी हो रहे हादसों से रेलवे की छवि खराब हो रही है। रेल मंत्री अश्विन वैष्णव की प्रशासनिक और पेशेवर योग्यता तथा अनुभव पर किसी को संदेह नहीं है। कुछ समय पूर्व उड़ीसा में हुई भीषण रेल दुर्घटना के समय घटनास्थल पर रहकर राहत, बचाव और मरम्मत के कार्य का निर्देशन करने पर उनकी प्रशंसा भी हुई थी किंतु हर दुर्घटना के समय रेल मंत्री के लिए ऐसा करना न तो संभव है और न ही व्यवहारिक। और फिर श्री वैष्णव के पास सूचना प्रसारण तथा इलेक्ट्रानिक एवं सूचना तकनीक जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का भी दायित्व है। संसद का बजट सत्र चलने के कारण विपक्ष का उन पर हमलावर होना भी तय है। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तो इसकी शुरुआत कर भी दी है। संसद में भी रेलमंत्री से इस्तीफा देने की मांग भी की जायेगी और इसके लिए स्व. लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण दिया जायेगा जिन्होंने रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए मंत्रीपद से त्यागपत्र दे दिया था। लेकिन आज और तब में बहुत फर्क है। तब न इतनी गाडियाँ होती थीं और न ही दुर्घटनाएं। लेकिन कुछ साल पहले मोदी सरकार के रेलमंत्री सुरेश प्रभु को लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं के कारण पद से हटना पड़ा था जबकि उनकी गिनती बेहद ईमानदार और कुशल मंत्रियों में की जाती थी। श्री वैष्णव को लेकर प्रधानमंत्री क्या फैसला लेंगे ये तो वही जानें किंतु इसमें दो मत नहीं हो सकते कि भारतीय रेल तमाम विसंगतियों और कमियों के बाद भी करोड़ों देशवासियों की जीवन रेखा है। आम जनता के लिए आज भी आवागमन का यह सबसे सस्ता और सुलभ साधन है। विश्व की सबसे बड़ी रेलवे होने का गौरव इसके साथ जुड़ा हुआ है। इसमें देश के सबसे अच्छे इंजीनियर कार्यरत हैं। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बीते दो दशकों में रेलवे में गुणवत्ता का स्तर उसकी प्रतिष्ठा को देखते हुए गिरा है। यात्री गाड़ियों के विलंब से चलने का न तो समुचित कारण बताया जाता है और न ही जानकारी। इस बारे में इंटरनेट पर जानकारी की व्यवस्था भी बेहद गैर जिम्मेदार है। आरक्षण की व्यवस्था में जरूर सुधार हुआ है तथा कुछ हद तक भ्रष्टाचार में भी कमी आई है। करेंट रिजर्वेशन की सुविधा भी काफी लाभदायक है किंतु तत्काल कोटे की कमाई के फेर में सीटें खाली होने पर भी प्रतीक्षा सूची बताई जाती है। इसी तरह आरक्षित डिब्बों में साफ - सफाई जबसे निजी हाथों में दी गई है तभी से उसकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। यात्री शिकायत करते हैं तो कभी फ़ौरन कारवाई होती है लेकिन अधिकांश मामलों में जवाब भी नहीं मिलता। वातानुकूलित डिब्बों में गंदे चादर मिलना बेहद आम है। सुरक्षा भी भगवान भरोसे है। एक टिकिट चैकर को चार - चार डिब्बों की जिम्मेदारी दिये जाने से भी यात्री परेशान होते हैं। इसका कारण रेलवे में स्टाफ की कमी है। न केवल अधिकारी अपितु तृतीय - चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी भी जरूरत से कम होने के बाद भी उनकी भर्ती क्यों नहीं होती , ये समझ से परे है। जो कर्मचारी हैं भी उनके मन में निजीकरण का भय व्याप्त है। आये दिन ये खबरें उड़ा करती हैं कि जल्द ही निजी क्षेत्र को यात्री गाड़ियां चलाने का काम भी दिया जावेगा। रेलवे उनसे अपनी पटरियों का किराया और स्टेशन पर दी जाने वाली सुविधाओं का शुल्क वसूल करेगा। ऐसा जब होगा तब होगा किंतु लेकिन अभी तक जितना भी कार्य निजी क्षेत्रों में दिया गया उनका अनुभव बेहद खराब है। ये देखते हुए रेलवे को अपने मौजूदा ढांचे में ही सुधार करते हुए सेवाओं को पेशेवर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। आज की स्थिति में उस पर ये आरोप आम है कि वह मुनाफाखोरी में लिप्त है। कोरोना काल में बंद की गई रियायतें दोबारा शुरू नहीं होने से महिलाओं और बुजुर्गों में नाराजगी है। यात्री गाड़ियों में साधारण डिब्बे घटते जा रहे हैं जबकि आरक्षित बोगियों की भरमार है। हमसफर और वंदे भारत जैसी गाडियाँ बढ़ाई जा रही हैं जिनके किराए ज्यादा हैं। कुल मिलाकर देश की जीवन रेखा कही जाने वाली रेलवे में पहले जैसी बात नहीं रही। इसके पहले कि उसकी पूरी व्यवस्था ही पटरी से उतर जाए तत्काल इस तरफ ध्यान दिया जाना जरूरी है। रेल मंत्री कोई भी रहे इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे तो सस्ती, सुविधाजनक और सुरक्षित यात्रा चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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