बीते शनिवार विभिन्न राज्यों में विधानसभा के 13 उपचुनावों के परिणाम घोषित हुए। इनमें तृणमूल और कांग्रेस को चार - चार, भाजपा को दो, द्रमुक और आम आदमी पार्टी को एक - एक तथा एक सीट निर्दलीय को मिली। ये परिणाम इसलिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव संपन्न हुए सवा महीना ही बीता। हालांकि उपचुनाव स्थानीय मुद्दों और प्रत्याशी की छवि पर केन्द्रित होते हैं। इसीलिए उनका राष्ट्रीय राजनीति पर बहुत असर नहीं होता। राष्ट्रीय नेता भी आम तौर पर इनमें प्रचार करने नहीं जाते। लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मुख्यमंत्री पर पार्टी प्रत्याशी को जिताने की जिम्मेदारी होती है। उस लिहाज से देखें तो ममता बैनर्जी सबसे सफल रहीं जिन्होंने चारों उपचुनाव भारी बहुमत से जितवा दिये। उनमें से तीन सीटों पर 2021 में भाजपा जीती थी। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने तीन में से दो उपचुनाव जीतकर लोकसभा चुनाव में हुए सफाये से उबरने में कामयाबी हासिल की जबकि एक सीट भाजपा ने जीती। इससे ये साफ हो गया कि यहाँ की जनता केंद्र में भाजपा को जी खोलकर समर्थन देती है किंतु राज्य स्तर पर वह उससे खुश नहीं है। पड़ोसी राज्य पंजाब में आम आदमी पार्टी ने जालंधर वेस्ट सीट धमाकेदार अंदाज में जीत ली। इसमें भाजपा दूसरे स्थान पर रही जो उसके भविष्य के लिए शुभ संकेत कहा जा सकता है। इस उपचुनाव ने राज्य के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की पकड़ साबित कर दी। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अलग - अलग लड़े थे । इसका लाभ कांग्रेस को मिला जो 11 में से 7 सीटें जीत गई जबकि आम आदमी पार्टी को महज 3 मिल सकीं । लोकसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन से किनारा कर लिया। जालंधर में भी कांग्रेस मैदान में थी। मुख्यमंत्री श्री मान ने अरविंद केजरीवाल के जेल में रहते ये उपचुनाव जीतकर अपनी वजनदारी दिखा दी। बिहार में हुए अकेले उपचुनाव में बाजी निर्दलीय ने मारी। इससे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को धक्का लगा। हालांकि तेजस्वी की पार्टी राजद के हाथ भी निराशा लगी। भाजपा को म.प्र के एक उपचुनाव में जबरदस्त सफलता मिली। छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा सीट के कांग्रेस विधायक इस्तीफा देकर भाजपाई बन गए थे। 2023 में कांग्रेस ने कमलनाथ के इस गढ़ की सभी 8 विधानसभा सीटें जीत लीं थीं। लोकसभा में अपने बेटे की बड़ी हार के बाद इस सीट पर कांग्रेस की शिकस्त से श्री नाथ की राजनीति के अंत की शुरुआत हो चुकी है। वहीं मुख्यमंत्री मोहन यादव काफी मजबूत हुए जिनके राज में भाजपा को सभी 29 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस तरह भाजपा का यह किला अभेद्य बना रहा किंतु उत्तराखंड में उसे शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा जहाँ की दोनों सीटें उसके हाथ से निकल गई। हालांकि 2021 में भी वे उसको नहीं मिलीं थीं । बद्रीनाथ में जीते कांग्रेस विधायक को उसने तोड़ा किंतु उसे उपचुनाव नहीं जिता सकी वहीं मंगलौर की सीट बसपा विधायक के निधन से रिक्त हुई जिसे कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार ने मामूली अंतर से जीतकर भाजपा को निराश किया। इस बार बसपा यहाँ तीसरे स्थान पर रही। जहाँ तक बात तमिलनाडु के एक उपचुनाव की है तो वहाँ सत्तारूढ़ द्रमुक की जीत पर किसी को हैरानी नहीं हुई। इन परिणामों को इंडिया गठबंधन की जीत के तौर पर प्रचारित किया गया। लेकिन ये उपचुनाव पूरी तरह स्थानीय स्तर पर लड़े गए । प. बंगाल की रायगंज और बागदा में कांग्रेस तथा राणाघाट दक्षिण और मानिकतला में सीपीएम मैदान में थी। ये दोनों विपक्षी गठबंधन में होने के बावजूद तृणमूल के विरुद्ध लोकसभा चुनाव भी लड़ी थीं। सही मायनों में इन उपचुनावों ने मुख्यमंत्रियों की ताकत स्पष्ट साबित की। भाजपा के लिए चिंता का विषय एक तो उत्तराखण्ड की दोनों सीटों पर मिली हार है वहीं बिहार में जनता दल (यू) प्रत्याशी का हारना एनडीए के लिए धक्का है। दूसरी बात ये कि जनता ने दलबदलुओं को हराकर राजनीतिक दलों को संकेत दे दिया है। विशेष रूप से भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी होगी वरना उसकी असफलताओं का सिलसिला यूँ ही जारी रह सकता है। उसके लिए प. बंगाल बड़ी चुनौती बनता जा रहा है । वहाँ तृणमूल में घुस आये असमाजिक तत्व सत्ता के संरक्षण सरकार विरोधी मतदाताओं को आतंकित करने में जुटे हुए हैं। हिंसा की राजनीति में तृणमूल ने वामपंथी सरकार को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा चुनाव के बाद अपने समर्थकों की हिफाजत नहीं कर पाती तो उसकी स्थिति राज्य में एक कदम आगे दो कदम पीछे की होकर रह जायेगी। वैसे राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से असली मुकाबला उ.प्र में होने वाले 10 विधानसभा उपचुनावों में होगा जहाँ मजबूत मुख्यमंत्री होने के बाद भी भाजपा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस - सपा गठबंधन के आगे कमजोर पड़ गई थी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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