Tuesday, 9 July 2024

घाटी के बाद जम्मू को निशाना बना रहे आतंकवादी


जम्मू के कठुआ इलाके में सेना के वाहन पर आतंकवादी हमले में 5 फौजी शहीद हो गए। हाल ही में ऐसी ही एक और वारदात में 2 जवान जान से हाथ धो बैठे। सैन्य वाहन पर हमले की घटना बीते मई माह में भी हुई थी। लेकिन हालिया हमलों से ये बात निकलकर आ रही है कि आतंकवादी कश्मीर घाटी के साथ - साथ जम्मू अंचल को भी अपना कार्यक्षेत्र बना रहे हैं। हालांकि हिन्दू बहुल जम्मू क्षेत्र में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने पहले भी हमले किये किंतु राज्य विधानसभा चुनाव के पहले इस तरह की घटनाएं लगातार होना किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा प्रतीत होती है। उल्लेखनीय है लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे राज्य में दशकों बाद रिकार्ड तोड़ मतदान हुआ। लेकिन उससे बड़ी बात ये रही कि राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला क्रमशः अनंतनाग और बारामूला की अपनी परंपरागत सीट पर बुरी तरह से हार गए। मेहबूबा को नेशनल  काँफ्रेंस के प्रत्याशी ने  शिकस्त दी वहीं उमर को जेल में बंद एक आतंकवादी ने चित्त कर दिया। अलगाववाद से जूझते आ रहे इस राज्य में ये बहुत बड़ा बदलाव कहा जा सकता है। निकट भविष्य में जम्मू कश्मीर राज्य में विधानसभा चुनाव करवाने की तैयारियां चल रही हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू क्षेत्र की दोनों सीटें जम्मू और ऊधमपुर बरकरार रखीं वहीं नेशनल काँफ्रेंस श्रीनगर और अनंतनाग पर काबिज हुई । बारामूला से जीते निर्दलीय राशिद ने जेल से आकर लोकसभा की शपथ तो ले ली किंतु उनकी रिहाई आसान नहीं है। इस प्रकार सदन में नेशनल काँफ्रेंस और भाजपा के दो - दो सदस्य ही मौजूद रहेंगे। लेकिन अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार संभवतः पहली मर्तबा लोकसभा में नजर नहीं आयेगा। इससे आगामी विधानसभा चुनाव के समीकरणों का पूर्वाभास होता है क्योंकि अब तक ये माना जाता था उक्त दोनों खानदानों के बिना कश्मीर घाटी की राजनीति की कल्पना तक नहीं की जा सकती। लेकिन राशिद नामक आतंकवादी द्वारा उमर अब्दुल्ला को हरा देने से ये संकेत मिला है कि घाटी के युवा परिवार की सियासत से ऊबकर  अपने नये नायक तलाश रहे हैं। पंजाब से भी ऐसा ही परिणाम देखने मिला जहाँ जेल में बन्द अमृतपाल सिंह लोकसभा चुनाव जीत गया। ये एक खतरनाक संकेत है। मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटों का परिसीमन इस प्रकार करवाया  जिससे क्षेत्रीय असंतुलन दूर हुआ। अभी तक घाटी पूरी तरह हावी रहा करती थी। लेकिन अब जम्मू अंचल में भी सीटें बढ़ गई हैं। इससे अलगाववादी चिंतित हैं। इसलिए आतंकवादी घटनाओं का केंद्र जम्मू के सीमावर्ती इलाकों को बनाया जा रहा है। कांग्रेस घाटी में नेशनल काँफ्रेंस के साथ गठबंधन करने के कारण चुनाव जीता करती थी। अब चूंकि अब्दुल्ला परिवार का प्रभाव सिमट रहा है तब घाटी में उसके लिए कोई गुंजाइश नहीं बची। यही स्थिति भाजपा की है जो जम्मू में तो बेहद ताकतवर है किंतु घाटी में तमाम दावों के बाद भी घुटनों के बल चलने की स्थिति में है। ये देखते हुए विधानसभा की असली लड़ाई जम्मू की सीटों पर देखने मिलेगी जिनके सहारे भाजपा श्रीनगर की गद्दी हासिल करना चाह रही है। रही बात घाटी की तो वहाँ की राजनीति भटकाव की शिकार होकर रह गई है। ऐसे में राशिद जैसे कुछ प्रयोग और भी होने की आशंका है । जम्मू क्षेत्र में अचानक सेना की टुकड़ियों पर हमले बढ़ने से लग रहा है अलगाववादी ताकतें अब हिंदू बहुल इलाकों को निशाना बनाकर मतदान का प्रतिशत घटाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार को इस बारे में सतर्क हो जाना चाहिए। जम्मू के कुछ सीमावर्ती इलाकों में रोहिंग्या घुसपैठियों को फारुख सरकार ने बसा दिया था जो आतंकवादियों के सहायक की भूमिका निभा सकते हैं । धारा 370 हटने के बाद घाटी में शांति का अनुभव होने लगा है। ऐसे में आतंकवादी अब जम्मू में नया ठिकाना बनाने में जुटे हैं। उनकी जड़ें जमने से पहले ही उनमें मठा डालना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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