Monday, 29 July 2024

दिल्ली में 3 मौतें : व्यवस्था या तो लापरवाह है या भ्रष्ट


140 करोड़ के देश में दो - चार तो क्या सौ - दो सौ लोग भी मर जाएं तो  फर्क नहीं पड़ता। बीमारी, दुर्घटना , तनाव जैसे कारणों से प्रतिदिन न जाने कितने भारतीय जान से हाथ धो बैठते हैं। इन दिनों सर्वत्र बाढ़ का प्रकोप  होने से अनेक लोग डूबकर मौत के मुँह में चले गए। दूषित जल के कारण संक्रामक रोगों से होने वाली मौतें भी खबरों का हिस्सा बनती हैं। देश के सुदूर गाँवों  और कस्बों में होने वाली मौतें तो चर्चाओं में आती ही नहीं हैं। वहाँ रहने वाले लोग यदि मतदाता न हों तब शायद उनके हालचाल पूछने वाला भी कोई नहीं होगा। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि हमारे देश में विकास की शुरुआत अति पिछड़े इलाकों की बजाय राजधानियों या अन्य बड़े शहरों से होती है। लेकिन वह भी महज दिखावे तक सीमित रह गया है। जिन क्षेत्रों में सत्ता प्रतिष्ठान का ठिकाना होता है वहाँ तो सब चाक चौबन्द नजर आता है लेकिन उसी राजधानी में कुछ दूर जहाँ आम लोग रहते हैं वहाँ  व्यवस्था की हालत बद से बदतर दिखाई देती है। इसका सबसे ताजा उदाहरण है देश की राजधानी दिल्ली जहाँ  तलघर (बेसमेंट) में चल रहे एक आईएएस कोचिंग सेंटर में अचानक पानी भर जाने से तीन छात्र जान से हाथ धो बैठे। पानी इतनी तेजी से भरा कि उन छात्रों को बाहर निकलने का अवसर नहीं मिला। बचाव टीमों को उनके शव निकालने तक के लिए मशक्कत करनी पड़ी। उक्त घटना से छात्र आक्रोशित हैं। भाजपा  दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को इस हादसे के लिए जिम्मेदार मान रही है। प्रशासन हरकत में आ गया है। ज्यादा दूर न होने से सर्वोच्च न्यायालय भी अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकेगा। कोचिंग चलाने वाले गिरफ्तार हो चुके हैं। सरकारी अमले का कर्तव्यबोध अचानक जागृत हो उठा है। अवैध रूप से संचालित दर्जन भर कोचिंग संस्थान बंद करवा दिये गए। जिस कोचिंग सेंटर में उक्त हादसा हुआ उसके बेसमेंट को भंडारण हेतु उपयोग किये जाने की अनुमति थी किंतु उसमें शायद पुस्तकालय बनाकर  रखा गया था। जहाँ तक प्रश्न उस उस क्षेत्र में जल भराव का है तो दिल्ली क्या समूचे देश में यही आलम है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की हालत तो और भी खराब है। कुछ वर्ष पूर्व एक प्रसिद्ध चिकित्सक  ऐसी ही परिस्थितियों में मैन होल में गिरकर मौत के शिकार हो गए। उसके बाद भी किसी के कान में जूं रेंगी हो ये एहसास नहीं हुआ। दिल्ली में कई दशक पहले उपहार सिनेमा अग्निकांड हुआ था। उसके बाद भी जन सुरक्षा के प्रति प्रशासन की जवाबदेही का खूब हल्ला मचा । सिनेमा, अस्पताल , स्कूल - कालेज आदि में अग्नि शमन के पुख्ता प्रबंध रखे जाने की सख्त हिदायतें दी गईं। लेकिन ये देखने में आया है कि किसी जानलेवा दुर्घटना के बाद कुछ दिन तक तो सरकारी अमला अभूतपूर्व मुस्तैदी दिखाता है लेकिन जैसे ही जनता का गुस्सा ठंडा होता है पूरी व्यवस्था ढर्रे पर लौट आती है। दिल्ली प्रशासन ने संदर्भित हादसे के फ़ौरन बाद दर्जन भर जिन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दिया यदि वे अवैध थे तो  अभी तक चलते कैसे रहे? उनके विरुद्ध अचानक प्रशासनिक कारवाई होने से ये स्पष्ट हो गया कि जिम्मेदार अधिकारी उनके नियम विरुद्ध संचालन से अवगत थे और उनकी अनदेखी करने के लिए सौजन्य राशि ली जाती रही होगी। हालांकि हमारे देश में ऐसा होना  अत्यंत स्वाभाविक है किंतु राष्ट्रीय राजधानी में इस तरह की दुर्घटना राष्ट्रीय शर्म का विषय है। जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार किसी वाहन की  टक्कर से कोचिंग सेंटर का फाटक टूटने से तलघर में पानी भरने की घटना हुई। सीसी कैमरे के सहारे उस वाहन की तलाश की जा रही है किंतु बेसेमेंट में कोचिंग क्लास या पुस्तकालय नियम विरुद्ध था तब संचालक आपराधिक उदासीनता के लिए तो दोषी है ही। इस हादसे के बाद यदि दिल्ली के अनेक कोचिंग संस्थान प्रशासनिक सख्ती के चलते बंद कर दिये जाते हैं तब उनमें पढ़ रहे हजारों छात्रों का क्या होगा जिनका भविष्य और उनके अभिभावकों का लाखों रुपया खतरे में पड़ गया। ऐसे हादसे रोकने के प्रति चूंकि शासन, प्रशासन और जनता तीनों उदासीन हैं इसलिए इनकी पुनरावृत्ति रोकना असंभव है। म.प्र. के जबलपुर नगर में कुछ साल पहले एक निजी अस्पताल में आग लगने से अनेक लोगों की मौत हो गई। अस्पताल में एक ही निकासी द्वार था और अग्निशमन की व्यवस्था भी अपर्याप्त थी। उसके बाद सभी निजी अस्पतालों की जांच हुई। निश्चित समय सीमा में सभी को अग्निशमन सम्बन्धी व्यवस्थाएं दुरस्त करते हुए नगर निगम फायर ब्रिगेड से अनापत्ति प्राप्त करने कहा गया किंतु अभी तक अनेक अस्पतालों ने उक्त औपचारिकता पूरी नहीं की। जनप्रतिनिधि भी चूंकि निजी अस्पताल वालों से उपकृत होते हैं इसलिए उनके मुँह भी बंद हैं। कुल मिलाकर समूची व्यवस्था या तो लापरवाह है या भ्रष्ट। ऐसे में इस तरह के हादसों को रोक पाना कैसे संभव होगा ये बड़ा सवाल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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