Tuesday, 23 July 2024

नाम छिपाना या गलत बताना तो पहले से ही अपराध है

सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी तो कुछ कहने को रह ही नहीं जाता किंतु मुद्दा केवल नाम उजागर करने का नहीं अपितु ये है कि आजादी के बाद भी मुस्लिम समुदाय देश के बहुसंख्यक हिंदुओं का विश्वास अर्जित क्यों नहीं कर सका ? हालाँकि दोनों के बीच खाई तो अंग्रेज यहाँ से जाते समय ही पैदा कर गए थे जिसका दुष्परिणाम विभाजन के तौर पर देखने मिला और मुसलमानों ने पाकिस्तान के रूप में अपना अलग देश हासिल कर लिया। बंटवारे के उस दर्दनाक  दौर में लाखों लोगों की नृशंस हत्या की गई। संपत्ति की लूटपाट और महिलाओं की अस्मत लूटे जाने जैसी अनगिनत घटनाओं के कारण समूचा वातावरण इस तरह का बन गया  जिसके कारण दोनों कौमों के बीच नफरत और अलगाव की भावना  गहराई तक बैठ गई। बावजूद इसके लाखों मुसलमान भारत में रह गए वहीं पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में हिंदुओं ने रहने का निर्णय किया।इसके पीछे सोच ये रही कि देर सवेर हालात सामान्य हो जाएंगे।  लेकिन वोटों के सौदागरों ने बजाय सौहार्द्र कायम करने के खाई और चौड़ी कर दी।  भारत में तो मुसलमान राजनीतिक संरक्षण मिलने से फलते - फूलते गए किंतु पाकिस्तान से जो खबरें आती रहीं उनके अनुसार वहाँ के हिंदुओं को मुस्लिम कट्टरता का शिकार होना पड़ा। उन पर धर्म परिवर्तन का दबाव आज तक बनाया जाता है। उनकी लड़कियाँ जबरन उठाकर उनकी शादी मुस्लिम लड़कों से करवाने की शिकायतें आम हैं। भारत में मुस्लिम समुदाय के हितों पर आँच आने पर  सड़क से संसद तक में चर्चा होने लगती है। इसके उलट पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार के विरुद्ध पत्ता भी नहीं खड़कता । उल्लेखनीय है धर्म निरपेक्षता को भारत के साथ - साथ मो. अली जिन्ना ने भी स्वीकार किया था किंतु आजादी के 77 साल बाद आज दोनों मुल्कों में उसकी क्या स्थिति है ये दुनिया जानती है। ये सच्चाई है कि भारत का मुस्लिम समुदाय आज तक मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सका। महानगरों से लेकर छोटे - छोटे कस्बों तक में हिन्दू - मुस्लिम रिहायशी इलाके एक दूसरे से अलग होते हैं। दोनों समुदायों के बीच चंद अपवाद छोड़कर पारिवारिक तो छोड़िये सामाजिक संबंध भी दिखावे के ज्यादा होते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुस्लिम समुदाय में सहिष्णुता का अभाव  है। देश आजाद होने के बाद पंडित नेहरू की सरकार द्वारा हिंदुओं के विवाह और उत्तराधिकार प्रावधानों में तो परिवर्तन कर दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को हाथ लगाने की हिम्मत उनकी नहीं पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय तक समान नागरिक संहिता की जरूरत पर बल दे चुका है किंतु मुस्लिम समुदाय के वोट बैंक की ताकत के सामने किसी राजनीतिक दल में इतना साहस नहीं होता कि वह उसके पर्सनल लॉ को बदलने की बात तक करे। मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में इस दिशा में आगे बढ़ना चाहती थी किंतु लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने पूरी योजना बनाकर भाजपा को बहुमत से वंचित कर दिया जिसके कारण प्रधानमंत्री जिन कड़े और बड़े निर्णयों की बात करते थे वे अधर में लटक गए। भले ही राहुल गाँधी और अखिलेश यादव इसका श्रेय लूटना चाहें किंतु उ.प्र में मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा के विरोध में ध्रुवीकरण ही भाजपा को 240 पर रोकने का कारण बना। जबकि पाकिस्तान में ऐसा नामुमकिन है। हाल ही के कुछ वर्षों में देश के कुछ हिस्सों में जिस तरह की घटनाएं हुईं उनकी वजह से मुस्लिम समुदाय के प्रति हिंदुओं में अविश्वास और बढ़ा है। धोख़ा देकर हिन्दू लड़कियों के साथ विवाह करना और फिर उन पर धर्म बदलने के दबाव के अनेकानेक प्रकरण चर्चा में आये। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम समाज के धर्मगुरु यहाँ तक कि बुद्धिजीवी तक इन घटनाओं के विरोध में मुँह नहीं खोलते। इसके ठीक उलट हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति सहानुभूति रखने वालों की कमी नहीं है। उ.प्र के मुज़फ़्फ़रनगर में काँवड़ यात्रा के मार्ग पर खाद्य सामग्री बेचने वालों को अपना नाम साइन बोर्ड पर लिखने के निर्देश का मुसलमानों से ज्यादा विरोध हिंदुओं ने कर डाला। लेकिन किसी ने उन वजहों को जानने का प्रयास नहीं किया जो उ.प्र सरकार के उक्त निर्णय के पीछे थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगाकर भाजपा विरोधी ताकतों को खुश होने का अवसर दे दिया किंतु जब कानून की नजर में अपना नाम छिपाना या गलत नाम बताना अपराध है तब किसी दुकानदार को उसका नाम उजागर न करने की छूट का मकसद समझ से परे है। कोई न माने या न माने किंतु ज्यादातर हिंदुओं के मन में मुस्लिम समुदाय के प्रति अविश्वास के लिए वह समुदाय ही दोषी है जो इसे कम करने की बजाय इसे बढ़ाने की हिमाकत करता रहता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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