मौजूदा वित्तीय वर्ष का एक तिहाई समय बीत जाने के बाद आखिरकार केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गत दिवस 2024 - 25 के लिए अपना बजट प्रस्तुत कर दिया। प्रधानमंत्री ने जहाँ बजट को गांवों, गरीबों और किसानों को समृद्धि के रास्ते पर ले जाने वाला बताया वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के अनुसार यह सहयोगियों को खुश करने वाला कुर्सी बचाओ बजट है । लेकिन इसी के साथ वे यह भी बोल गए कि बजट काँग्रेस घोषणापत्र की नकल है। उनका आशय वित्त मंत्री द्वारा बेरोजगारों के लिए इंटर्नशिप शुरू किये जाने से है जिससे मिलता जुलता वायदा काँग्रेस के घोषणापत्र में किया गया था। उनकी बात सही भी है क्योंकि लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद सरकार द्वारा बेरोजगारों के लिए तत्काल कुछ करना आवश्यक हो गया था। आगामी कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र , जम्मू कश्मीर तथा अगले साल दिल्ली और बिहार में चुनाव होने हैं। उसके बाद 2026 में प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल में रणभूमि सजेगी। इसीलिए वित्त मंत्री ने बजट को इतना संतुलित बनाया जिससे लोग खुश भले कम हों किंतु उनको नाराज होने का भी अवसर ज्यादा नहीं मिलेगा। युवाओं और गाँवों पर केंद्रित होने से बजट बेरोजारों और किसानों को राहत देने वाला होने की उम्मीद सत्ता पक्ष के साथ ही आर्थिक विशेषज्ञ भी जता रहे हैं। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि श्रीमती सीतारमण ने नौकरपेशा मध्यमवर्ग की अपेक्षाओं पर आधी - अधूरी नजर ही डाली । मोबाइल फोन सस्ता करने के बजाय वित्त मंत्री आयकर छूट की सीमा में समय की मांग के मुताबिक वृद्धि करतीं तब उससे होने वाली बचत अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा मददगार हो सकती थी। इसी तरह 70 वर्ष से अधिक आयु के उन बुजुर्गों को भी बजट ने निराश किया जिन्हें आयुष्मान योजना के अंतर्गत सालाना 5 लाख के निःशुल्क इलाज की सुविधा मिलने का सपना काफी दिनों से दिखाया जा रहा था। रेल यात्रा में रियायत की उम्मीद भी धरी की धरी रह गई। बहरहाल एक बात के लिए केंद्र सरकार की प्रशंसा करनी होगी कि उसने बिहार और आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को नामंजूर करने का साहस दिखाया। यद्यपि वित्त मंत्री ने उनको अधो संरचना के कार्यों हेतु भरपूर राशि प्रदान दिये जाने का प्रावधान करते हुए जनता दल ( यू) और तेलुगू देशम पार्टी द्वारा केंद्र सरकार को दिये समर्थन के प्रति आभार व्यक्त कर दिया। राहुल ने इसी पर इसे कुर्सी बचाओ बजट कहकर उसका मजाक उड़ाया। लेकिन नेता प्रतिपक्ष का न्यौता स्वीकार करते हुए यदि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू इंडिया गठबंधन के साथ गठजोड़ करते हुए श्री गाँधी को प्रधानमंत्री बनवा देते तब उन्हें बिहार और आंध्र प्रदेश को कहीं ज्यादा पैसा देना पड़ता क्योंकि काँग्रेस केवल 99 सांसदों के बल पर नीतीश और नायडू जैसे घाघ नेताओं की बात टालती तो वे सरकार गिराने पर आमादा हो जाते। भाजपा उस मामले में ज्यादा मजबूत है जिसके पास 240 लोकसभा सदस्य होने से प्रधानमंत्री की वजनदारी ज्यादा है और ये भी कि वे दोनों अचानक समर्थन वापस ले लें तो भी सरकार को तुरंत खतरा नहीं होगा क्योंकि सत्ता सुख की चाहत रखने वाले एक - दो सांसद वाले कुछ दलों और निर्दलीय साथ देने सामने आ जायेंगे। उस दृष्टि से देखें तो बजट लोकसभा चुनाव के परिणाम से उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया गया है। जहाँ तक बात विपक्ष द्वारा की जा रही आलोचनात्मक टिप्पणियों की है तो इस बारे में भी यही कहा जा सकता है कि ये बजट इंडिया गठबंधन की सरकार का होता तब जो सत्ता में बैठे हैं वे भी इन्हीं शब्दों में आलोचना कर रहे होते । और जब श्री गाँधी ने उसे काँग्रेस के घोषणापत्र की नकल कह दिया तब वे उसकी आलोचना कैसे करेंगे ये बड़ा सवाल है। लेकिन राजनीति से अलग हटकर देखें तो केंद्र सरकार के सामने परेशानी ये आयेगी कि वह बजट के प्रावधानों को इतनी जल्दी जमीन पर कैसे उतारेगी , क्योंकि बजट राशि का विभिन्न मंत्रालयों और राज्यों को आवंटन किये जाने में अगस्त का महीना बीत जायेगा। ऐसे में इस कारोबारी वर्ष के महज सात महीने शेष रहेंगे। और फिर नितिन गडकरी जैसे मंत्री के विभाग को छोड़कर केंद्र और राज्य दोनों जगह सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन इतना सुस्त होता है कि उनसे जो प्रशंसा सरकार के हिस्से में आनी चाहिए वह लोगों की नाराजगी में बदल जाती है। युवाओं के लिए बजट में किये गये इंटर्नशिप के प्रावधान के साथ भी यही खतरा है। ये देखते हुए प्रधानमंत्री को यह सतर्कता बरतनी होगी कि बजट में जो कहा गया है उस पर जल्द अमल हो जिससे उसके साथ जुड़े फायदे जनता को महसूस हो सकें।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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