18 वीं लोकसभा के दूसरे सत्र में 23 जुलाई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण मौजूदा वित्तीय वर्ष का बजट लोकसभा में प्रस्तुत करेंगी। लोकसभा चुनाव के कारण फरवरी में अंतरिम बजट पेश किया गया था।यद्यपि भाजपा इस बार बहुमत से पीछे रह गई किंतु उसने सहयोगी दलों के साथ जिस आसानी से सरकार बनाई उससे लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी पूरे 5 साल सत्ता में रहेंगे। सबसे बड़ा संकेत मिला शेयर बाजार में उछाल से जिसका सूचकांक 4 जून को आये चुनाव परिणामों के बाद से तकरीबन 10 फीसदी बढ़ चुका है। एग्जिट पोल के बाद चढ़े शेयर बाजार ने नतीजों में भाजपा का बहुमत न आते देख जबरदस्त गोता लगाया। इस पर एग्जिट पोल करने वालों पर आरोप लगा कि उन्होंने कुछ लोगों के इशारे पर गलत आकलन पेश किया जिससे आम निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। राहुल गाँधी ने तो इसकी जाँच हेतु संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग तक कर डाली। लेकिन जैसे ही सरकार अस्तित्व में आई शेयर बाजार ने तेजी पकड़ी और वह 80 हजार के इर्द- गिर्द बना हुआ है। आगे उसमें वृद्धि होगी या भाव गिरेंगे ये बजट पर निर्भर करेगा। मोदी सरकार के पिछले सभी बजट हालांकि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायक साबित हुए किंतु छोटा और मध्यम व्यापारी तथा कम आय वाले नौकरपेशा को ये महसूस होता रहा कि सरकार या तो बड़े उद्योगपतियों की हितचिंतक है या फिर उन लाभार्थियों की जिनका वोट उसे सत्ता तक पहुंचाता है। यदि इस बार भाजपा को बहुमत मिला होता तब उम्मीद की जा सकती थी आगामी बजट भी पिछले बजटों जैसा होगा। लेकिन चुनाव परिणामों ने प्रधानमंत्री को दबाव में तो ला ही दिया। मध्यमवर्गीय मतदाताओं द्वारा कम मतदान और गरीब तबके में आरक्षण हटने के भय के साथ ही जाति की तरफ झुकने से भाजपा को कम से कम 75 सीटों का नुकसान हुआ। वैसे तो हर सरकार इंफ्रा स्ट्रकचर, विकास दर और आर्थिक सुधारों की बात करती है। लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए उसे उस जनता को भी खुश करना होता है जो उसकी ताजपोशी करवाती है। बीते दस सालों में नरेंद्र मोदी ने बड़े - बड़े काम किये। पर्याप्त बहुमत और अपार लोकप्रियता से उत्पन्न आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने जोखिम भी उठाये। चूंकि नीयत साफ थी इसलिए जनता ने उन्हें सिर - आँखों पर बिठाया। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों के कारण उनका नाम जीत की गारंटी माना जाने लगा किंतु इस लोकसभा चुनाव ने कई सबक दे डाले। ऐसे में उनकी सरकार के आगामी बजट में वह सब होना संभावित है जो चुनावी राजनीति को सीधे प्रभावित करे। अगले कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखण्ड और संभवतः जम्मू और कश्मीर तथा अगले साल दिल्ली और बिहार में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में श्री मोदी के सामने दूध से जला छाछ भी फूंक - फूंककर पीने वाली स्थिति है। जिन राज्यों में इसी साल चुनाव होने वाले हैं उन सभी में लोकसभा चुनाव में भाजपा को कहीं कम तो कहीं ज्यादा नुकसान हुआ है। वह भी तब जब अधिकांश अनुमान भाजपा को कम से कम 300 और एनडीए को 350 सीटें दे रहे थे । लेकिन अब विपक्ष का हौसला सातवें आसमान पर है। उसको एकता की ताकत समझ में आ गई है। जिन राज्यों में भाजपा की काँग्रेस से सीधी लड़ाई है वहाँ वह भारी पड़ जाती है किंतु जहाँ अनेक दल मैदान में हैं वहाँ उनके एकजुट हो जाने पर उसको नुकसान हो जाता है। ये देखते हुए आगामी बजट में केंद्र सरकार को आर्थिक तुष्टीकरण करना पड़ेगा। अर्थात आम जनता को तत्काल लाभ पहुंचाने वाले ऐसे प्रावधान करना होंगे जो आसानी से समझ में आ सकें। पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने के अलावा आयकर छूट की सीमा में अच्छी खासी वृद्धि , चिकित्सा बीमा की प्रीमियम में कमी जैसे कुछ ऐसी बातें बजट में होना समय की मांग है। किसानों को साल में मिलने वाली 6 हजार की राशि दोगुनी करना भी जरूरी है। बुजुर्गों को रेल टिकिट में रियायत फिर शुरू होनी चाहिए। 2024 के लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। पार्टी इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। वह गलती इस बजट में सुधारी जा सकती है। इसलिये बेहतर हो प्रधानमंत्री कुछ आर्थिक विशेषज्ञों के साथ ही चुनावी राजनीति में माहिर लोगों से सुझाव लेकर ऐसा बजट बनवाएं जिसे देखकर आम आदमी महसूस कर सके कि ये उसके लिए बना है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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