Saturday, 27 July 2024

नीति आयोग के बहिष्कार का निर्णय विपक्ष के लिए हानिकारक


विपक्ष का काम है सरकार की गलत नीतियों का विरोध करते हुए जनता के हित के लिए आवाज उठाते रहना। भारत में आज़ादी के कई दशक बाद तक संसद से ग्राम पंचायत तक में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। राज्यों में कहीं - कहीं गैर कांग्रेसी सरकार बनीं भी तो चल नहीं सकीं। लेकिन 1977 के बाद से स्थितियाँ बदलने लगीं। केंद्र के साथ ही विभिन्न राज्यों में विभिन्न दलों या गठबंधन की सरकारें सत्ता में आईं। आश्चर्य की बात ये है कि जो कांग्रेस कभी अन्य दलों का ये  कहते हुए मज़ाक उड़ाया करती थी कि उनको सरकार चलाना नहीं आता वही उनमें से अनेक के साथ गठबंधन सरकार में शामिल हुई या उसे बाहर से समर्थन दिया। हालांकि इसका कारण भाजपा का तेजी से बढ़ता ग्राफ था जिसके कारण कांग्रेस को अपना दबदबा कम होने का भय सताने लगा। इस प्रकार  गैर कांग्रेसवाद की सियासत, गैर भाजपावाद में बदल गई। 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले बनाया गया इंडिया नामक गठबंधन इसी कारण से अस्तित्व में आया जिसमें कांग्रेस के अलावा तृणमूल, जनता दल (यू ), राजद, सपा, द्रमुक, आम आदमी पार्टी,  एनसीपी, शिवसेना (उद्धव गुट) , झामुमो, वामपंथी दल आदि शामिल थे। यद्यपि प. बंगाल में तृणमूल ने अकेले लड़ने का फैसला किया वहीं  केरल में कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतरे। गठबंधन को आकार देने  वाले नीतीश कुमार ने तो चुनाव के पहले ही भाजपा से गठजोड़ कर लिया था। वहीं चुनाव बाद आम आदमी पार्टी ने भी उससे किनारा कर लिया। हाल ही में  विभिन्न राज्यों की 10 विधानसभा सीटों के जो उपचुनाव हुए उनमें भी प. बंगाल और पंजाब में गठबंधन के सदस्य एक - दूसरे के विरुध्द लड़े। आम आदमी पार्टी ने तो हरियाणा की सभी विधानसभा सीटों पर अकेले लड़ने का ऐलान करते हुए दिल्ली में भी कांग्रेस के  साथ रहने से इंकार कर दिया। इससे विपक्ष में दिशाहीनता या एकरूपता का अभाव प्रमाणित हो रहा है। इसका ताजा उदाहरण तब मिला जब आज प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की बैठक का इंडिया गठबंधन से जुड़े  राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक , तेलंगाना, झारखंड, हिमाचल आदि ने बहिष्कार कर दिया किंतु ममता बैनर्जी ने उसमें  शिरकत कर सबको चौंका दिया। यद्यपि ममता  नहीं बोलने देने का आरोप लगाते हुए बाहर आ गईं। लेकिन उन्होंने गठबंधन के निर्णय के विरुद्ध बैठक आकर उन्होंने एकला चलो की नीति का प्रदर्शन कर दिया। इंडिया गठबंधन  ने नीति आयोग की महत्वपूर्ण बैठक में अपने मुख्यमंत्रियों को न भेजकर क्या संदेश देना चाहा , यह स्पष्ट नहीं है। ममता ने उसमें  हिस्सा लेकर अपनी बात रखी और  समुचित समय न दिये जाने का बहाना बनाकर बाहर आ गईं। यही काम इंडिया गठबंधन के शेष मुख्यमंत्री भी करते तो सत्ता पक्ष पर कुछ दबाव तो बनता किंतु ऐसा लगता है विपक्ष में दूरंदेशी का अभाव है। नीति आयोग एक महत्वपूर्ण संस्था है। विपक्ष के मुख्यमंत्रियों  को चाहिए इसकी बैठकों एवं अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेकर अपने सुझाव रखें और उनका प्रचार करें। आज की बैठक 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने पर केंद्रित थी। ऐसे में विपक्ष ने इसका बहिष्कार कर अपना ही नुकसान किया। संसद में भी उसका आचरण बेहद गैर जिम्मेदाराना है। उसे ये गुमान हो चला है कि लोकसभा चुनाव में संख्या बल बढ़ जाने का मतलब सदन में हल्ला मचाना मात्र है। जबकि होना तो ये  चाहिए कि विपक्ष के ज्यादा से ज्यादा सदस्य बहस में हिस्सा लें जिससे उनका भी अभिमत देश के समक्ष प्रस्तुत हो सके। गत दिवस राज्यसभा में कृषि मंत्री शिवराज सिंह जब एम.एस.पी पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को  मनमोहन सरकार द्वारा नामंजूर किये जाने के दस्तावेजी प्रमाण पेश कर रहे थे तब विपक्षी खेमा शोर - शराबे में लगा रहा। उस वजह से आज समाचार पत्रों में मंत्री जी की बात ही प्रकाशित हुई। श्री चौहान सदन में गलत तथ्य रख रहे थे तब विपक्ष के वरिष्ट सदस्यों को प्रतिवाद करना था। विपक्ष यदि वाकई सरकार को घेरना चाहता है तो उसे होहल्ले और बहिर्गमन जैसे कदमों से बचना होगा। वरना वह निर्णय प्रक्रिया से बाहर हो जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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