म.प्र के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गत दिवस विधानसभा में स्पष्ट किया कि अवैध कालोनियों को वैध नहीं किया जाएगा । उल्टे उनको बसाने वालों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कारवाई की जाएगी। दूसरी तरफ उन्होंने ये घोषणा भी कर दी कि सस्ते प्लाटों के लालच में जिन लोगों ने वहाँ मकान बनवा लिए हैं उनके नक्शे स्वीकृत कर अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रबंध किया जाएगा। भविष्य में अवैध कालोनियों को बनने से रोकने के लिए कड़ा कानून बनाये जाने की बात भी मंत्री जी ने कही। वैसे ये समस्या राष्ट्रव्यापी है। महानगर तक इससे अछूते नहीं रहे। प्रश्न ये है कि अवैध कालोनी बिना स्थानीय निकाय के अमले की जानकारी के कैसे बन सकती है ? एक - दो घरों का निर्माण हो तो उसकी अनदेखी होना भी स्वीकार किया जा सकता है किंतु जहाँ दर्जनों मकानों का निर्माण हो रहा हो और संबंधित सरकारी विभाग को कानों कान खबर न हो इससे बड़ा असत्य कोई हो नहीं सकता। विधानसभा में ये बात भी उठी कि अवैध कालोनी में रहने वाले मतदाता चुनाव प्रचार हेतु आने वाले प्रत्याशियों को घेरकर वहाँ बिजली, पानी और सड़क की मांग करते हैं, लिहाजा उनको वैध घोषित किया जाए। श्री विजयवर्गीय का ये कहना तो उचित है कि अवैध कालोनी को वैध नहीं किया जाएगा किंतु जब उनमें बने मकानों के नक्शे स्वीकृत कर अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाएंगी तब उन्हें वैध स्वरूप अपने आप हासिल हो जाएगा। इस बारे में नया कानून जब बनेगा तब की तब देखी जाएगी किंतु जिन इलाकों में अवैध कालोनियाँ बन चुकी हैं वहाँ स्थानीय निकायों के उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी तो कारवाई होनी चाहिए जिनकी लापरवाही कहें या मिलीभगत से हर शहर और कस्बे में धड़ाधड़ गैर कानूनी कालोनियों बन गईं। ये भी गौरतलब है कि जनप्रतिनिधि मतों के लालच में अवैध कालोनियों में बिजली, सड़क और पानी का इंतजाम करवा देते हैं। यही हाल झुग्गी- झोपड़ियों का है जो कुकुरमुत्तों की तरह सरकारी भूमि पर फैलती जाती हैं किंतु शुरुआत में उन्हें रोकने के बजाय शासकीय अमला और नेता बिरादरी उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। अनेक झुग्गियों को कोई माफिया बसाकर वहाँ रहने वालों से वसूली करता है। जो पार्षद, विधायक और सांसद इन बस्तियों में पक्की सड़कें, बिजली के खम्बे और पेय जल की व्यवस्था करते हैं उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि ये जानते हुए कि संबंधित बस्ती सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर बसाई गई , उन्होंने वहाँ विकास कार्य क्यों करवाए? ये वोट बैंक का ही खेल है कि जब ऐसी बस्ती को अतिक्रमण विरोधी अभियान के अंतर्गत हटाने का प्रयास होता है तब नेताओं की फौज गरीबों की हितैषी बनकर आ जाती है । और जब इन्हें हटाया जाता है तब उसके वॅाशिंदों को गरीबी का हवाला देकर वैकल्पिक स्थान या मकान देने की व्यवस्था की जाती है। यही स्थिति अवैध मानी जाने वाली कालोनियों की है। उनमें बने मकानों का निर्माण बिना नक्शा स्वीकृत करवाए किये जाने के बाद भी मानवीयता के आधार पर तोड़े जाने से परहेज किया जाता है । चूँकि उनके निवासी मतदाता हैं इसलिए उनको सभी सुविधाएं दिलवाना नेताओं के राजनीतिक स्वार्थों से जुड़ा होता है। कुल मिलाकर ये पूरा मामला नौकरशाही और नेताओं के अपवित्र गठजोड़ से जुड़ा हुआ है। श्री विजयवर्गीय पहले भी इस विभाग के मंत्री रह चुके हैं। उसके अलावा इंदौर के महापौर का दायित्व भी वे संभाल चुके हैं। इसलिए उन्हें समस्या का मूल कारण पता होगा। बेहतर हो वे अपने घर अर्थात नगरीय निकायों के उस अमले को कठघरे में खड़ा करते हुए दंडित करें जिसके कार्यक्षेत्र में अवैध कालोनी अथवा अवैध बस्तियाँ बेरोकटोक आबाद होती चली गईं। इसी के साथ ही उन जनप्रतिनिधियों से भी ये पूछताछ की जानी चाहिए कि उन्होंने गैरकानूनी आवासीय क्षेत्र में विकास कार्य क्यों करवाया? मंत्री महोदय यदि कानून बनाने से पहले कारवाई की शुरुआत उन नौकरशाह और नेताओं से करें जो अवैध कालोनियों और झोपड़पट्टी को बसाने के सूत्रधार हैं तो उससे सरकार की ईमानदारी प्रमाणित होने के साथ उस भूमाफिया पर भी शिकंजा कस सकेगा जो अफसरों और राजनेताओं के संरक्षण में बेखौफ अवैध निर्माण करवाता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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