Saturday, 13 July 2024

गुजारा भत्ते पर विपक्ष की ठंडी प्रतिक्रिया से मुस्लिम समाज में हैरानी


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तलाकशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के प्रावधान में मुस्लिम महिलाओं को शामिल किये जाने सम्बन्धी फैसले के बाद मुस्लिम संगठनों में हलचल तेज हो गई है। उच्चस्तरीय बैठकों में इस बात पर ऐतराज जताया गया कि शाहबानो प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये फैसले को 1986 में संसद द्वारा रद्द कर दिये जाने के बाद तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं  को गुजारा भत्ता दिये जाने का मसला हमेशा के लिए समाप्त हो गया था। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के  ताजे फैसले में गुजारा भत्ते की  प्रचलित व्यवस्था को तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होने की जो बात कही गई है उसकी वजह से 1986 में संसद द्वारा जिस कानून पर मोहर लगाई थी वह  बेअसर हो जाता है। इसीलिए मुस्लिम उलेमाओं सहित पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों ने ताजा फैसले को चुनौती देने पर विचार किया। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस फैसले पर नाराजगी दिखाई। लेकिन इस मामले में जैसी  राजनीतिक प्रतिक्रियाएं मुस्लिम समुदाय द्वारा अपेक्षित थीं वैसी नहीं आने से उसमें चिंता है। जनता दल (यू) महासचिव के. सी. त्यागी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में बताकर कट्टरपंथियों को बड़ा झटका दे दिया। चूंकि सीआरपीसी की धारा 125 इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट है और उसमें धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं है , लिहाजा सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताजा फैसले में साफ कहा कि तलाक़शुदा महिला को चाहे किसी धर्म की हो उसे अपने पूर्व पति से भरण पोषण के लिए राशि मांगने का कानूनी अधिकार है। यहाँ तक तो ठीक था किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव  में मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन हासिल करने वाले विपक्षी दलों विशेष रूप से कांग्रेस ने इस फैसले पर टिप्पणी करने से जिस प्रकार अपने को दूर रखा वह चौंकाने वाला है। लोकसभा चुनाव में मुसलमानों के पर्सनल लॉ को सुरक्षित रखने का आश्वासन देने वाले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की खामोशी तो चौंकाने वाली है। अखिलेश यादव ,लालू प्रसाद और ममता बैनर्जी की चुप्पी से भी मुस्लिम समाज स्तब्ध है। उसे डर है कि मोदी सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नजीर बनाकर  पर्सनल लॉ के कुछ अन्य प्रावधानों में भी प्रचलित कानूनों के मुताबिक दखलंदाजी कर सकती है। सही बात तो ये है कि लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस अब मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप से मुक्त होना चाहती है। उसके साथ इंडिया गठबंधन के अन्य दलों ने भी इस मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के समर्थन से  जिस तरह हाथ खींचे उससे वह हतप्रभ है। राजनीतिक गलियारों में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार श्री गाँधी की रणनीति हिंदुओं पर भाजपा की पकड़ को कम करना है। उनका ध्यान मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, म.प्र , हिमाचल , उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों पर है जहाँ उनकी भाजपा से सीधी टक्कर है। लोकसभा चुनाव में भाजपा उक्त राज्यों के बल पर ही सबसे बड़ी पार्टी बन सकी। इन राज्यों की कुछ सीटों को छोड़कर मुस्लिम मतदाता उतने निर्णायक नहीं हैं। राहुल ये समझ चुके हैं कि उ.प्र और बिहार में वे कितने भी हाथ पाँव मारें किंतु जो सफलता मिलेगी वह अखिलेश और तेजस्वी के खाते में जायेगी। उनको ये भी लगने लगा है कि मुसलमान किसी भी स्थिति में भाजपा की तरफ नहीं झुकेंगे। इसलिए अब वे नर्म हिंदुत्व की नीति अपना रहे हैं। इसमें उन्हें कितनी सफलता मिलेगी ये आगामी कुछ महीनों में होने वाले कुछ विधानसभा चुनावों में स्पष्ट हो जायेगा। गुजारा भत्ते संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर इंडिया गठबंधन के घटक दलों की खामोशी को लेकर ओवैसी मुस्लिम संगठनों के नेताओं को ये उलाहना दे रहे हैं कि उन्होंने मुस्लिम समाज का अपना नेतृत्व विकसित करने का अवसर गँवा दिया। उल्लेखनीय है ओवैसी ने उत्तर भारत में कुछ छोटे दलों से गठजोड़ करते हुए उम्मीदवार खड़े किये किंतु उनके ऊपर भाजपा की बी टीम होने का आरोप चस्पा हो जाने से उनकी मुहिम फुस्स हो गई। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से मुस्लिम पर्सनल लॉ का जिन्न फिर बोतल से बाहर आ गया है। जनता दल (यू) द्वारा न्यायालय के फैसले का समर्थन किये जाने से भाजपा का हौसला बुलंद हुआ है। संसद के आगामी सत्र में ओवैसी यदि इस मुद्दे को उठाते हैं तब भाजपा विरोधी अन्य दलों की  प्रतिक्रिया देखने लायक होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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