पश्चिमी उ.प्र के हाथरस जिले के एक गाँव में किसी बाबा के सत्संग में हजारों लोग जमा थे । कार्यक्रम के बाद जब बाबा जाने लगे तब उनके चरण छूने श्रद्धालुओं में होड़ मची। बाबा के निजी सेवादारों ने श्रद्धालुओं को रोकने धक्का - मुक्की शुरू कर दी। बाबा तो किसी तरह वहाँ से निकल लिए किंतु 122 लोग कुचलकर मारे गए। बड़ी संख्या घायलों की भी है। घटनास्थल से आये चित्र दिल दहला देने वाले हैं। इतने बड़े आयोजन हेतु पुलिस की जो अनुमति ली गई उसमें लोगों के आने की अनुमानित संख्या वाला स्थान रिक्त छोड़ दिया गया। बताया जाता है हजारों की भीड़ के लिए मात्र 50 पुलिस वाले तैनात किये गए थे। सत्संग में आने वालों की अनुमानित संख्या आयोजकों द्वारा छिपाई गई या उन्हें खुद अंदाज नहीं था , ये जाँच का विषय है। पुलिस ने गैर इरादतन ह्त्या का प्रकरण दर्ज कर लिया जो स्वाभाविक है। इस हादसे में गलती किसकी थी ये फ़िलहाल कहना मुश्किल है। बाबा जी तो ये कहकर बच जायेंगे कि सत्संग तो शांति पूर्वक संपन्न हो गया था जो कुछ घटा वह उनके वहाँ से जाते समय हुआ। लेकिन 100 से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौत जिन हालातों में हुई वह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि धार्मिक आयोजनों या किसी देवस्थान के दर्शनों हेतु उमड़ने वाली भीड़ के कारण इस तरह की जानलेवा घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। उनकी जाँच करने के बाद भविष्य में ऐसा न हो इसकी कार्य योजना भी बनी किंतु सभी जगह एक जैसा इंतजाम संभव नहीं है। ऐसे में ये स्थानीय प्रशासन का दायित्व है कि कार्यक्रम की अनुमति देने के पहले सभी सावधानियां बरते। इस हादसे के बारे में जो जानकारी आई उससे स्पष्ट है कि पुलिस का प्रबंध भीड़ को देखते हुए बहुत कम था। खुफिया विभाग भी अपनी जिम्मेदारी से चूक गया। लेकिन असली दोषी तो इस तरह का आयोजन में आने वाले बाबा हैं जो श्रद्धा का व्यवसायीकरण करते हैं। देश में अनेक प्रवचन करने वाले महानुभाव हैं जो फिल्मी सितारों जैसे नखरे दिखाते हैं। उनका रहन - सहन रईसी होता है। महँगी गाड़ियों में चलना उनका शौक है। राजनेता इनके आयोजनों में हाजिरी देकर इनका भाव बढ़ा देते हैं। इस वजह से इन पर भी नेतागिरी का भूत सवार हो जाता है। विवादास्पद बयान देकर सुर्खियां बटोरने का शौक भी ये पाल लेते हैं जिसके कारण फजीहत भी झेलनी पड़ जाती है। ताजा उदाहरण म.प्र के एक नामी कथा वाचक का है जिन्हें हाल ही में नाक रगड़कर माफी मांगनी पड़ी। हालांकि सारे बाबा या कथावाचक एक जैसे हैं ये कहना तो अन्याय होगा किंतु जिस तरह अर्थशास्त्र में कहावत है कि खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है , वैसे ही कुकुरमुत्तों जैसे बढ़ते जा रहे कतिपय बाबाओं ने आध्यात्मिक जगत में प्रदूषण फैला दिया है। हालांकि जनता भी कम कसूरवार नहीं है जो इनकी अंधभक्त हो जाती है। हाथरस की घटना भी इसी का नतीजा है। बाबा की चरण रज प्राप्त करने के लिए हुई धक्का - मुक्की में 122 लोग अपने प्राण गँवा बैठे। पुलिस द्वारा दर्ज प्रकरण में बाबा का नाम नहीं है लेकिन घटना के बाद उनका गायब हो जाना संवेदनहीनता नहीं तो और क्या है? आस्था के अतिरेक और पेशेवर बाबाओं की बढ़ती जमात के चलते इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकना कठिन होता जा रहा है। धार्मिक आयोजनों की भव्यता के कारण इनका आकर्षण बढ़ता जा रहा है। राजनेता भी बाबाओं का उपयोग अपना जनाधार बढ़ाने में करने लगे हैं । इसके चलते चुनाव के मौसम में प्रवचनों के बड़े - बड़े आयोजन होते हैं। राजनेताओं से निकटता की वजह से अनेक बाबाओं को प्रशासन और पुलिस विशेष महत्व देती है। इस तरह के बाबा ट्रांसफर और पोस्टिंग जैसे कार्य नेताओं से करवाने के कारण काफी प्रभावशाली हो जाते हैं। यही वजह है कि इन पर कोई रोक - टोक नहीं रहती। लेकिन हाथरस हादसा बहुत बड़ी त्रासदी है। कुम्भ जैसे विराट आयोजन तक में इतनी बड़ी दुर्घटना हाल के वर्षों में सुनने नहीं मिली। इसके पीछे किसकी गलती थी ये पता लगाने के लिए ईमानदारी से जाँच करवाई जाना जरूरी है ताकि इसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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