उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल केदारनाथ के पास विगत दिवस जोरदार हिम स्खलन हुआ। यद्यपि 2013 में आये जल प्रलय जैसी जनहानि तो नहीं हुई किंतु प्रकृति ने एक बार फिर चेतावनी दी है। संयोगवश इसी समय हरिद्वार में एक सूखी पड़ी नदी में अचानक जल सैलाब आया। वहाँ आने वाले पर्यटक उस सूखी पड़ी नदी का उपयोग पार्किंग के लिए करते हैं। इसलिए जब पहाड़ों से अचानक जलधारा उतरी तब वहाँ खड़ी कारें और बसें पास ही बहने वाली गंगा नदी में उतराने लगीं। इसके दृश्य दिल दहला देने वाले थे। उत्तराखण्ड के समूचे पर्वतीय क्षेत्र में हिमस्खलन और भूस्खलन आम बात हो चली है। गर्मियों की शुरुआत होते ही चार धाम की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। इनमें शामिल होने वाले तीर्थयात्री साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। बढ़िया सड़कें और ठहरने की बेहतर व्यवस्थाओं ने तीर्थ यात्रा को धार्मिक पर्यटन में तब्दील कर दिया है। प्रतिदिन हजारों धुंआ छोड़ते वाहनों की वजह से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ने लगा है। इस सबके कारण ऊंचाई वाली जगहों का तापमान भी बढ़ने लगा है। हिमस्खलन का मुख्य कारण तापमान में वृद्धि को ही माना जाता है। हिमालय पर्वत माला की भूसंरचना जिस प्रकार की है उसमें बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने की सीमित क्षमता है। गढ़वाल के इलाके को देव भूमि कहने के पीछे उद्देश्य यही था कि इस क्षेत्र की पवित्रता और शांति को सुरक्षित रखा जावे । जब चार धाम की यात्रा पैदल हुआ करती थी तब पर्यावरण के लिए इतना खतरा नहीं था। तीर्थ यात्रियों की संख्या भी कम थी। वाहनों के शोर और धुएं के अलावा हेलीकाप्टर की गड़गड़ाहट से भी वातावरण मुक्त था। होटल और गेस्ट हाउस रूपी कांक्रीट के ढांचे भी नहीं थे। सच कहें तो बहुत कुछ वैसा था जैसा ईश्वर ने हमें दिया किंतु बीते कुछ दशकों में समूचे पर्वतीय क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ीं और पर्यटन ने उद्योग की शक्ल अख्तियार की उसका दुष्परिणाम रुक -रुककर देखने मिलता रहता है। इस साल चार धाम की यात्रा शुरू होते ही केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री के रास्ते पर वाहनों की लंबी - लंबी कतारें लगने से जाम की स्थिति उत्पन्न हो गई। 30 - 40 कि.मी तक सड़क पर चलने की जगह नहीं थी। कुछ दिनों तक प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह अस्त व्यस्त होकर रह गई। ऐसे ही दृश्य शिमला और मनाली में देखने मिले। ऐसे में यदि पहाड़ अपना धैर्य खो रहे हैं तो दोष उनका नहीं हमारा है जो अपने शौक और श्रद्धा के लिए उनकी छाती रौंदते हैं। तीर्थ यात्रा के पैकेज वाले विज्ञापन अखबारों में छाए रहते हैं। कश्मीर घाटी में स्थित अमरनाथ गुफा के दर्शन भी प्रारंभ हो चुके हैं। उस स्थान की यात्रा करने वाले भी लाखों की संख्या में होते हैं। परिणाम स्वरूप यात्रा शुरू होने के कुछ दिन बाद ही बर्फ से बनने वाला प्राकृतिक शिव लिंग पिघल जाता है जिसकी वजह मानवीय उपस्थिति से बढ़ने वाला तापमान ही होता है। अमरनाथ हेतु भी हेलीकाप्टर सेवा भी उपलब्ध है जिसे उस स्थान की शांति नष्ट करने के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। कुल मिलाकर पर्वतीय क्षेत्र के तीर्थ स्थल हों या हिल स्टेशन, सभी में मानवीय आवाजाही बढ़ने से स्थितियाँ बद से बदतर होती जा रही हैं किंतु न समाज चेत रहा है और न ही सरकार। बाजारवादी व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव ने तीर्थ यात्रा और आमोद - प्रमोद हेतु किये जाने पर्यटन में अंतर खत्म कर दिया है। समय आ गया है जब इस दिशा में गंभीरता से विचार करते हुए सार्थक कदम उठाये जाएं। अन्यथा केदारनाथ जैसे हादसे जल्दी - जल्दी होने लगेंगे और पहाड़ों से आने वाले जल सैलाब प्रलय का पूर्वाभास करवाते रहेंगे। भारत में प्रकृति संरक्षण के संस्कार बाल्य काल से ही दे दिये जाते हैं। दूब से लेकर वट वृक्ष और कंकड़ से लेकर पर्वत तक सब पूज्य हैं। हर नदी, तालाब और कुए को गंगा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन आस्था के अतिरेक में भारतीय संस्कृति के मौलिक सिद्धांतों और जीवन शैली को उपेक्षित किये जाने से ही पर्यावरण का संकट उत्पन्न होने लगा है। तमाम नदियाँ सूखने के कगार पर हैं या उनमें गंदगी का अंबार है। पहाड़ों का प्राकृतिक सौंदर्य दिन ब दिन घट रहा है। इस स्थिति को बदलने के लिए समन्वित प्रयास जरूरी हैं। कोरोना काल में लगाए गए लाॅक डाउन के दौरान नदियाँ, जंगल और पहाड़ सभी ने राहत की सांस ली थी किंतु जैसे ही हालात सामान्य हुए सब कुछ पहले जैसा हो गया। इससे साबित हो गया कि प्रकृति प्रदत्त सभी धरोहरों के स्वरूप को विकृत करने के दोषी हम ही हैं । जिस प्रकृति की गोद में जाकर हम सुख - शांति का अनुभव करते हैं उसे दुख देने से बड़ा पाप और क्या होगा?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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