Saturday, 29 June 2024

संसद के न चलने से विपक्ष का ज्यादा नुकसान होता है

18 वीं लोकसभा का पहला सत्र पूत के पाँव पालने में वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है। प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति से शुरू विवाद अध्यक्ष के चुनाव तक जारी रहा। सदस्यों के शपथ ग्रहण में भी अनावश्यक नारेबाजी और टोकाटाकी चलती रही। स्पीकर चुने जाने पर ओम बिरला को बधाई देते समय भी विपक्षी सदस्यों ने कटाक्ष करने में तनिक भी कंजूसी नहीं की। उसके बाद श्री बिरला के भाषण में आपात्काल के उल्लेख के साथ उस दौरान मारे गए लोगों की स्मृति में मौन रखे जाने पर विवाद की स्थिति बनी। राहुल गाँधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं का जत्था विरोध जताने स्पीकर के कक्ष तक  जा पहुंचा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी आपत्काल का जिक्र आग में घी का काम कर गया। शपथ लेते समय असदुद्दीन ओवैसी द्वारा जय फिलीस्तीन कहे जाने के विरुद्ध मामला पुलिस तक जा पहुंचा। यद्यपि स्पीकर के चुनाव में ममता बैनर्जी की नाराजगी की खबर से इंडिया गठबंधन में दरार की आशंका उत्पन्न हो गई थी किंतु वह खत्म कर दी गई। इसका प्रमाण राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के पहले विपक्ष द्वारा नीट परीक्षा घोटाले पर बहस के लिए स्थगन प्रस्ताव पेश करने से मिला। जिसके लिए न सत्ता पक्ष तैयार हुआ और न ही श्री बिरला। उनका कहना है कि अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव से पूर्व अन्य किसी विषय पर चर्चा नियम और परंपरा दोनों के विरुद्ध है। स्पीकर ने विपक्ष को समझाइश देते हुए कहा कि वे अभिभाषण पर बोलते हुए नीट घोटाले सहित सभी विषयों पर बोल सकते हैं किंतु धन्यवाद प्रस्ताव को रोककर स्थगन प्रस्ताव स्वीकार करना संभव नहीं होगा। विपक्ष ने इस पर नारेबाजी की। उस दौरान  राहुल का माइक बंद किये जाने की शिकायत भी हुई और विपक्षी सदस्य गर्भगृह तक आ पहुंचे। संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष को आश्वस्त करते रहे कि अभिभाषण के बाद उन्हें नीट घोटाले पर बोलने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा लेकिन गतिरोध बने रहने से अंततः स्पीकर ने सोमवार तक सदन स्थगित कर दिया। विपक्षी खेमे से जो संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक अगले हफ्ते भी वह ऐसा ही करेगा। उसकी रणनीति यह है कि नीट घोटाले पर सरकार को रक्षात्मक होने बाध्य किया जावे। दरअसल श्री गाँधी सहित विपक्ष के अन्य दल भी जानते हैं कि अभिभाषण की आलोचना का कोई महत्व नहीं होता क्योंकि बहस के अंत में प्रधानमंत्री  जोरदार भाषण देकर विपक्ष की हालत खराब कर देते हैं। यह सत्र 3 जुलाई तक है विपक्ष  का संख्या बल 10 सालों में सबसे अधिक होने से उसका मनोबल ऊंचा है। इसीलिए वह पहले सत्र से ही सरकार पर हावी होने की रणनीति पर चल रहा है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का सोचना है कि शुरुआत में ही विपक्ष  के सामने झुकने से उसका हौसला और बुलंद हो जाएगा जो भविष्य में परेशानी का कारण बने बिना नहीं रहेगा। पिछले 10 सालों में संसद के दोनों सदनों में इस तरह के हंगामे रोजमर्रे की बात थे। लेकिन विपक्ष की ताकत कम होने से सरकार आसानी से अपना काम निकाल लेती थी। लेकिन इस बार लोकसभा में स्थिति भिन्न है। हालांकि सरकार के पास स्पष्ट बहुमत होने से वह आत्मविश्वास से भरी हुई है। इसका परिचय अध्यक्ष के चुनाव से मिल गया। विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव को मंजूर न करने की नीति भी उसी का प्रमाण है। स्पीकर और राष्ट्रपति दोनों के भाषण में आपात्काल का उल्लेख ये दर्शाता है कि प्रधानमंत्री विपक्ष पर हमला करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे। जहाँ तक बात विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव की है तो वह पुरानी गलती दोहरा रहा है। उसे चाहिए था राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने देता। इस दौरान भी राहुल सहित अन्य विपक्षी नेताओं को सरकार पर हमले करने का पर्याप्त मौका मिलता।यदि सत्र के शेष दिनों में भी ऐसा ही गतिरोध बना रहा तब सत्ता पक्ष तो जैसे - तैसे धन्यवाद प्रस्ताव मंजूर करवा ही लेगा किंतु विपक्ष हवा में ही तलवार घुमाते रह जाएगा। काँग्रेस की 99 सीटें होने से राहुल को नेता प्रतिपक्ष का पद मिला है। उस नाते उन्हें हर विषय पर  बोलने का अवसर उपलब्ध रहेगा। धन्यवाद प्रस्ताव पर भी वे सरकार पर चौतरफा आक्रमण कर सकते थे। परंतु विपक्ष ने वह अवसर गँवा दिया। उसे याद रखना चाहिए कि सरकार के पास अपना पक्ष रखने के अनेक साधन होते हैं किंतु विपक्ष के पास संसद सबसे प्रभावशाली और प्रामाणिक माध्यम है। होहल्ला कर सदन स्थगित होने से विपक्ष उसे मिलने वाले समय से भी वंचित हो जाता है। बीते 10 सालों में इस वजह से उसकी छवि को काफी क्षति पहुँची है। यदि इस बार भी वह  सदन को बाधित करने की नीति पर चलता रहा तो उसका बढ़ा हुआ संख्याबल  भी किसी काम का नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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