लोकसभा चुनाव में यूँ तो सभी दलों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह - तरह के वायदे किये किंतु काँग्रेस द्वारा गरीब परिवारों की महिलाओं के खाते में हर महीने 8 हजार ( सालाना 1 लाख) जमा करवाने का जो वायदा किया गया उसकी काफी चर्चा हुई। ऐसा ही आश्वासन बेरोजगार नौजवानों को भी दिया गया था। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि इन वायदों का काँग्रेस को काफी लाभ मिला। हालांकि उसकी सरकार तो नहीं बनी लेकिन लखनऊ में मुस्लिम महिलाओं का एक समूह काँग्रेस दफ्तर के सामने जमा हो गया। उनके हाथों में चुनाव प्रचार के दौरान काँग्रेस द्वारा बाँटा गया वह पर्चा था जिसमें उक्त वायदों को गारंटी का नाम दिया गया था। कुछ महिलाओं द्वारा पर्चे पर अपना नाम - पता लिखकर दफ्तर में मौजूद व्यक्ति को दे भी दिया लेकिन उसके बाद दरवाजा बंद हो गया। और बाहर खड़ी अनेक महिलाएं शिकायत करती रहीं कि उनका विवरण नहीं लिया जा रहा। बात छोटी सी थी किंतु एक टीवी चैनल के पत्रकार ने पूरे घटनाक्रम को कैमरे में उतारकर प्रसारित कर दिया। उसके बाद पूरे देश में उसका संज्ञान लिया गया। आश्चर्य इस बात का है कि जरा - जरा सी बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले काँग्रेस प्रवक्ता लखनऊ के उस समाचार पर पूरी तरह मौन साधे रहे। हालांकि देखने में वह छोटा सा वाकया लगता है लेकिन भविष्य की दृष्टि से इसका सांकेतिक महत्व बहुत बड़ा है। इसे इस तरह से भी देखना चाहिए कि मतदाता अब नेताओं के भाषणों और घोषणापत्र में किये गये उन वायदों को गंभीरता से लेने लगे हैं जिनसे उनको तात्कालिक लाभ होता है। गत वर्ष म.प्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा की हार संभावित थी किंतु छह महीने पहले लाड़ली बहना योजना लाकर शिवराज सिंह चौहान ने बाजी अपने पक्ष में कर ली। चुनाव के समय किये जाने वाले वायदे कोई नई बात नहीं है लेकिन पहले मतदाता उन पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। 1971 में स्व. इंदिरा गाँधी द्वारा गरीबी हटाओ का नारा उछालकर भारी बहुमत हासिल कर लिया किंतु किसी ने भी उसके बाद उनसे सवाल नहीं किया कि गरीबी क्यों नहीं हटी? रोजगार देने की बात भी हर पार्टी कहती है किंतु सत्ता में आने के बाद आर्थिक संकट का रोना लेकर बैठ जाती है। लेकिन अब मतदाता चुनावी वायदों के पूरा नहीं होने पर सरकार को उलाहना देना नहीं भूलते। 2014 में 2 करोड़ रोजगार और 15 लाख हर खाते में जमा करने जैसे वायदे आज भी भाजपा और नरेंद्र मोदी के गले की फांस बने हुए हैं। ये इस बात को प्रमाणित करता है कि जाति - धर्म में बँटे मतदाता अपने फायदे की बात को न सिर्फ सुनते और समझते अपितु उसके लिए दबाव भी बनाने लगे हैं। लखनऊ में जो हुआ वह बदलते दौर की शुरुआत कही जा सकती है। ये भी कहा जा सकता है कि चुनाव के समय दिये गए प्रलोभन को हासिल करने के लिए जनता अब इंतजार करने के बजाय पार्टी दफ्तर और नेताओं के घर जा धमकेगी। ये समूचे राजनीतिक तंत्र को सतर्क करने वाली बात है। म.प्र में लाड़ली बहना योजना 1 हजार से शुरू हुई थी। विधानसभा चुनाव से पहले उसे 1250 रु. प्रति माह किया गया। धीरे - धीरे इसे 3 हजार तक बढ़ाया जाना है। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में मतदान का प्रतिशत घटने का एक कारण इस योजना की राशि में वृद्धि नहीं होना भी रहा । हिमाचल प्रदेश में पाँच गारंटियों के बल पर काँग्रेस ने प्रदेश में सरकार तो बना ली किन्तु उन पर अमल न हो पाने के कारण लोकसभा चुनाव में जनता ने उसे सभी सीटें हरवा दीं। पंजाब में आम आदमी पार्टी के प्रति भी इस चुनाव में जनता का मोहभंग हो गया क्योंकि विधानसभा चुनाव में उसके द्वारा किये गए बड़े - बड़े वायदे हवा में लटक गए। चुनाव को बाजार और मतदाता को उपभोक्ता समझने की जो संस्कृति भारतीय राजनीति में स्थापित हो चुकी है उसके प्रति बढ़ती नाराजगी एक शुभ संकेत कहा जा सकता है। फर्ज कीजिये काँग्रेस शासित राज्यों के मतदाता यदि राहुल गाँधी द्वारा महिलाओं और बेरोजगारों को 1 लाख देने वाले वायदे पर दबाव बनाने लगें तो पार्टी को मुँह छिपाना कठिन हो जायेगा। नीतिगत वायदों के पूरे न होने पर तो बहानेबाजी चल जाती है किंतु जहाँ आर्थिक लाभ की बात होती है , मतदाताओं का धैर्य जवाब देने लगता है। ये एक शुभ लक्षण है क्योंकि चुनाव जीतने के लिए मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से समाज में विद्वेष बढ़ रहा है। सूचना क्रांति के दौर में अब झूठे वायदों की कलई खुलते देर नहीं लगती। लखनऊ की मुस्लिम महिलाओं ने पूरे देश को रास्ता दिखा दिया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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