Monday, 17 June 2024

असम के मुख्यमंत्री द्वारा उठाया कदम स्वागत योग्य



असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा  विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं। अपने राज्य में उनकी लोकप्रियता भी स्वयं सिद्ध है। गत दिवस उन्होंने एक कार्यक्रम में घोषणा की कि 1 जुलाई से मुख्यमंत्री, मंत्री और सरकारी अधिकारियों को अपने आवास का बिजली बिल खुद भरना होगा। राज्य में बिजली की दरें बढ़ाकर जनता पर बोझ डालने की बजाय ऐसे कदम उठाये जाने की वकालत करते हुए श्री सरमा ने वीआईपी संस्कृति खत्म करने पर भी जोर दिया। 2026 में राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और एक कुशल राजनेता के तौर पर मुख्यमंत्री ने जनता को खुश करने के लिए उक्त कदम उठाया जिसकी विपक्ष भी आलोचना नहीं करेंगे। लेकिन उनका यह फैसला देश में एक नई बहस को जन्म दे सकता है । आम जनमानस में ये बात तेजी से समा चुकी है कि वीआईपी वर्ग को मिलने वाली विशेष सुविधाओं का आर्थिक बोझ अंततः उसी के कंधों पर तो आता है। हमारे देश में सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और अफसरों  को नाम मात्र के किराये पर बड़े बड़े बंगले तथा रेल और हवाई यात्रा मुफ्त मिलती है। टोल टैक्स भी नहीं देना पड़ता। आयकर छूट के अलावा बिजली और फोन सुविधा भी सरकारी खर्च पर उपलब्ध है । और तो और सांसद - विधायक न रहने पर भी पेंशन के अलावा निःशुल्क चिकित्सा और रेल यात्रा की सुविधा है। विभिन्न आयोगों, मंडलों और निगम के पदाधिकारी बनाये गए नेताओं को भी सरकारी खजाने से राजसी सुविधाएं दी जाती हैं। सरकारी अधिकारी भी अनेक सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। हालांकि वीआईपी संस्कृति को रोकने की बातें भी खूब होती हैं। नरेन्द्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने संसद भवन की कैंटीन में भोजन की दरें बढ़वाकर प्रशंसा बटोरी। पूर्व सांसदों और पूर्व मंत्रियों द्वारा दिल्ली मेें बड़े - बड़े बंगले घेरे रहने पर भी रोक लगी। उनके कार्यकाल में सांसदों का वेतन भी बहुत अधिक नहीं बढ़ा। लेकिन वे भी इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सके। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि सांसदों की पेंशन बन्द करने जैसा दुस्साहसिक निर्णय लेने की हिम्मत न दिखा सके। ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग करने वाले भी सांसदों - विधायकों की पेंशन का मामला उठाकर अपनी बात का औचित्य साबित करते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि आम जनता भी ये खुलकर कहने लगी है लोकशाही में सामंतवाद के प्रतीक चिन्ह रूपी मुफ्त सुविधाओं को खत्म करना चाहिए। और ये भी कि श्री मोदी ही ऐसा निर्णय लेने में सक्षम हैं। ये बात और है कि भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में उनके लिए ऐसे फैसले करना मुश्किल भरा हो सकता है किंतु  वे प्रबल इच्छा शक्ति का परिचय दें तो जनमत के दबाव के आगे सभी दल समर्थन करने मजबूर होंगे। जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों को समुचित वेतन, भत्ते और सुविधाएं जरूर  मिलें  ताकि वे अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन कर सकें किंतु ऐसा करते समय देश के आम आदमी की हालत भी  देखी जानी चाहिए। सांसद, विधायक ,मंत्रियों औरअफसरों को जिस प्रकार की सुविधाएं दी जा रही हैं उन्हें देखकर नहीं लगता कि ब्रिटिश राज को गए हुए सात दशक से ज्यादा बीत चुके हैं। मोदी सरकार ने हालांकि मुफ्त सुविधाएं बंद करने की दिशा में कुछ कदम उठाये किंतु वे उम्मीद से काफी कम हैं। देश के मध्यम वर्ग में इस बात को लेकर जबरदस्त असंतोष है कि उससे अनाप - शनाप कर वसूलकर किसानों और गऱीबों को  नगद , मकान और राशन आदि मुफ्त  दिया जाता है। लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने युवाओं और महिलाओं को सालाना 1 लाख देने का ऐलान कर दिया। लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था में ऐसा करना स्वाभाविक है लेकिन इनमें संतुलन होना चाहिए। आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग को सहायता और संरक्षण  न्यायोचित है किंतु शासक वर्ग और नौकरशाही को विशेष सुविधाएं मिलना एक सीमा के बाद आम जनता का शोषण है। असम के मुख्यमंत्री की पहल कितनी सफल होगी ये आज आकलन करना ठीक नहीं होगा किंतु शुरुआत हुई ये  प्रशंसा योग्य है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी



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