बिहार में आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाकर 65 किये जाने सम्बन्धी कानून को उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। इसके अंतर्गत ईबीसी, ओबीसी, दलित और आदिवासी आरक्षण में 15 प्रतिशत की वृद्धि कर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई 50 फीसदी की सीमा से अधिक कर दिया गया था। आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को भी 10 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त होने से पूरा आंकड़ा 75 प्रतिशत हो गया जिसे न्यायालय ने संविधान विरोधी मानते हुए निरस्त कर दिया। इसी के साथ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को ये सुझाव भी दिया कि वह आरक्षित वर्ग में शामिल क्रीमी लेयर को छांट कर जरूरतमंदों को इस व्यवस्था का लाभ पहुंचाए। इस फैसले को चुनौती देने का ऐलान उपमुख्यमंत्री द्वारा कर दिया गया है। ये पहला अवसर नहीं है जब आरक्षण का प्रतिशत 50 से अधिक किये जाने के फैसले को अदालत ने रद्द किया हो। महाराष्ट्र सहित कुछ अन्य राज्यों द्वारा की गई ऐसी ही कोशिश अतीत में न्यायपालिका द्वारा रद्द की जा चुकी है। बावजूद इसके ऐसी हिमाकत क्यों की जाती है ये समझ से परे है। दरअसल तमिलनाडु की जयललिता सरकार ने पी.वी नरसिंहराव की तत्कालीन केंद्र सरकार पर दबाव डालकर अपने राज्य में 69 प्रतिशत आरक्षण को संविधान की 9 वीं सूची में डलवा दिया जिसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। राव सरकार चूंकि अल्पमत में थी इसलिए उसे जयललिता की पार्टी से मिल रहे समर्थन के बदले उनकी वह मांग माननी पड़ी जो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध थी। उससे प्रेरित होकर कुछ और राज्यों में ऐसे प्रयास सरकार द्वारा किये गए जिन्हें या तो अदालत ने रद्द कर दिया या वे विचाराधीन हैं। आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए सभी राजनीतिक दल अपने - अपने स्तर पर प्रयासरत रहते हैं । हालांकि वे जानते हैं कि वैसा करना आसान नहीं होगा किंतु जनता को फुसलाकर वोट बटोरने के लिए बड़े - बड़े नेता तक आरक्षण के नाम पर फुसलाने और डराने का काम करते हैं । हाल में संपन्न लोकसभा चुनाव में काँग्रेस नेता राहुल गाँधी हर सभा में आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का वायदा करते सुनाई दिये। चूंकि उनको पता था कि न तो काँग्रेस और न ही इंडिया गठबंधन को सरकार बनाने लायक संख्याबल मिलेगा इसलिए उन्होंने मतदाताओं को संविधान की किताब दिखा - दिखाकर डराया कि भाजपा इसमें संशोधन कर आरक्षण छीन लेगी। इस तरह की तथ्यहीन बातें आरक्षण को लेकर रोज सुनाई देती हैं। सही बात तो ये है कि कोई भी राजनीतिक दल इस बारे में अपनी प्रामाणिकता साबित नहीं कर सका है। जो मायावती एक जमाने में सवर्णों के प्रति बेहद अपमानजनक बातें कहा करती थीं उन्होंने एक ब्राह्मण को बसपा का महासचिव बनाकर उन्हें आरक्षण दिये जाने का शिगूफा छोड़ दिया। 2007 में उ.प्र की सत्ता उनको सवर्ण जातियों के समर्थन से ही प्राप्त हुई थी। उस चुनाव में तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार की जगह राज्य की दीवारों पर हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है , का नारा देखने मिला। आज मायावती यदि हाशिये पर चली गईं तो उसके पीछे वही दोगली सोच है। ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार कानूनी स्थिति नहीं समझते लेकिन मतदाताओं को भ्रमित करने का प्रयास कोई राजनेता नहीं छोड़ते। श्री गाँधी भी भली - भाँति जानते हैं कि आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन उतना सरल नहीं जितना वे बताते थे किंतु मुँह चलाने में क्या जाता है, सो चला दिया। म.प्र में ओबीसी आरक्षण का पेच लंबे समय से फंसा हुआ है। 2018 के विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने आरक्षण के पक्ष में बयान देते हुए कह दिया कि कोई माई का लाल उसे हटा नहीं सकता। इसकी गैर आरक्षित वर्ग में जबरदस्त रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई जिसके परिणामस्वरूप भाजपा स्पष्ट बहुमत से थोड़ा सा ही सही किंतु पीछे रह गई। बेहतर हो राजनीतिक दल एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर एक दिशा तय करें। आरक्षण का मुख्य फायदा जिन सरकारी नौकरियों में हैं वे धीरे - धीरे घटती जा रही हैं। निजीकरण तो इसका एक कारण है ही लेकिन सरकारी खजाने पर बढ़ता बोझ भी बड़ी वजह है। ये देखते हुए जरूरी है कि आरक्षण के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाना बन्द हो। राजनेताओं को ये समझना होगा कि ऐसे वायदे न करें जिन्हें पूरा करना संभव नहीं होता। आरक्षण के कारण समाज को खंडित करने के बाद भी राजनेताओं का मन नहीं भरा। जातियों के भीतर से उपजातियों का उदय एक नये वर्ग संघर्ष का कारण बन रहा है। जिसके आगे कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है का नारा अर्थ खोता जा रहा है। यदि अभी भी राजनेताओं ने अपना रवैया नहीं बदला तो देश जातीय संघर्ष के जाल में फंसकर रह जायेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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