Friday, 14 June 2024

चयन परीक्षाओं में गड़बड़ियों के दोषी कठोरतम दंड मिलना चाहिए



मेडिकल और डेंटल कालेजों में प्रवेश हेतु आयोजित  होने वाली नीट - 2024 परीक्षा में कुछ छात्रों को ग्रेस मार्क्स  दिये जाने के बाद वे प्रतिस्पर्धा में अन्य छात्रों के साथ शामिल हो गए। प्रश्न पत्र लीक होने का विवाद भी उठा। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। गत दिवस इन परीक्षाओं को आयोजित करने वाली संस्था नेट ने अदालत में ग्रेस मार्क्स प्राप्त छात्रों की परीक्षा दोबारा लेने के बाद परिणाम 30 जून तक घोषित करने के निर्णय की जानकारी दी। इस प्रकार ग्रेस मार्क्स दिये जाने के विवाद पर पर तो विराम लगा किंतु प्रश्नपत्र लीक होने का मुद्दा  सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।  यह कहना गलत न होगा कि सरकार द्वारा आयोजित  प्रतियोगी परीक्षाओं में धाँधली अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी है। म.प्र का  व्यापमं घोटाला देश भर में चर्चित हुआ था। पिछले विधानसभा चुनाव के पहले पटवारी चयन परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार पर भी बवाल मचा। राजस्थान और उ. प्र में भी सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने से परीक्षाएं टाली जाती रहीं जिससे लाखों युवाओं  में नाराजगी बढ़ी जिसका खामियाजा भाजपा को हालिया लोकसभा में उठाना पड़ा। शिक्षित युवा वर्ग में सरकारी नौकरी का आकर्षण काफी होता है। और फिर बड़ी संख्या में पद खाली भी पड़े हैं। जिसकी वजह से सरकारी कामकाज प्रभावित होता है। ऐसे में प्रश्न पत्रों के लीक होने की वजह से परीक्षाओं को टालने से दोहरा नुकसान होता है। जहाँ तक बात नीट या उस जैसी अन्य परीक्षाओं की है तो उनकी प्रामाणिकता असंदिग्ध होनी चाहिए क्योंकि इनसे देश का भविष्य जुड़ा हुआ है। संघ लोकसेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं को लेकर भी इस तरह की शिकायतें मिलती रही हैं। प्रश्न ये है कि जिन परीक्षाओं के जरिये देश की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय विकास की मुख्य धारा मैं शामिल किया जाता है उनमें होने वाले भ्रष्टाचार को कब तक साधारण गलती मानकर लीपापोती होती रहेगी। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार चाहे प्रश्न पत्रों को लीक करने का मामला हो या फिर परीक्षाओं में गड़बड़ी का, उसमें कोचिंग संस्थानों और परीक्षाओं को आयोजित करने वाली सरकारी संस्था की संगामित्ती  के कारण ये घोटाले होते हैं। ये बात तो किसी से छिपी नहीं है कि निजी कोचिंग संस्थान अब एक उद्योग का रूप ले चुके हैं। उनका व्यवसाय इसी  पर टिका होता है कि उनके संस्थान से कितने बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए। कोटा का कोचिंग उद्योग तो सुप्रसिद्ध है। ऐसे में यह शंका करना गलत नहीं है कि इस तरह की गड़बड़ियां बिना गिरोहबंदी के संभव नहीं होतीं। जबसे शिक्षा में निजी क्षेत्र की उपस्थिति बढ़ी है तबसे वह अपने पवित्र उद्देश्य से भटक चुकी है। इसका प्रमाण विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक फैला हुआ है। निजी क्षेत्र द्वारा की जाने वाली अनियमियताएं तो अनपेक्षित नहीं होतीं किंतु प्रतिष्ठित शासकीय एजेंसियां भी जब उनके गोरखधंधे में हिस्सेदार हो जाती हैं तब स्थिति चिंताजनक हो जाती है। व्यापमं , नीट अथवा अन्य कोई एजेन्सी के किसी कार्य में अनियमितता सामने आने पर  समूची व्यवस्था कटघरे में खड़ी हो जाती है। नई पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले चाहे सरकारी के हों या निजी क्षेत्र के, उनको कड़े से कड़ा दंड सुनिश्चित किये बिना इस तरह की विसंगतियाँ रोक पाना असंभव होगा। निजी क्षेत्र के शिक्षा संस्थानों में  राजनेताओं की उपस्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक होने और ग्रेस मार्क्स देने के मामलों में उनकी भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में जो अंतिम निर्णय देगा उससे स्थिति काफी कुछ साफ हो जायेगी किंतु केन्द्र सरकार को चाहिए वह अपने स्तर पर भी जाँच करे क्योंकि अपना घर साफ रखना उसका भी तो दायित्व है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


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