Thursday, 27 June 2024

पित्रौदा की पुनर्नियुक्ति से काँग्रेस सवालों के घेरे में


सैम पित्रोदा भारत के बाहर रहने वाले एक पेशेवर व्यक्ति हैं। उनका नाम स्व. राजीव गाँधी के शासनकाल में चर्चित हुआ । उन्हें देश में संचार क्रांति का सूत्रधार माना जाता रहा है। बाद की काँग्रेस सरकारों में भी वे सलाहकार रहे। बीते कुछ सालों में वे काँग्रेस नेता राहुल गाँधी के विदेशी दौरों के प्रायोजक की भूमिका निभा रहे थे। इसीलिए काँग्रेस ने उनको इंडियन ओवरसीज काँग्रेस का अध्यक्ष बना दिया जिसमें किसी को ऐतराज नहीं हो सकता था। लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव के दौरान उनका एक साक्षात्कार अमेरिका में प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने वालों की तुलना कुछ खास नस्लों से करते हुए पूर्वी हिस्से के वासियों को चीनी और दक्षिण भारतीयों को अफ्रीकियों जैसा बताया। जैसे ही उस साक्षात्कार की जानकारी आई देश में बवाल मचने लगा।  उसके पहले उन्होंने अमेरिका में उत्तराधिकार के नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी 55 फीसदी संपत्ति सरकार लेती है जबकि उत्तराधिकारी को महज 45 फीसदी हासिल होता है।  चुनाव के चलते भाजपा सहित काँग्रेस विरोधी अन्य दलों द्वारा श्री पित्रौदा के बयानों को मुद्दा बनाकर काँग्रेस की घेराबन्दी की जाने लगी । फिर क्या था बिना देर किये उनको इंडियन ओवरसीज काँग्रेस पद से हटा दिया गया। साथ ही ये सफाई भी दी जाने  लगी कि पार्टी का उनकी टिप्पणियों से कोई सम्बन्ध नहीं है और वह उनका समर्थन नहीं करती।  उस समय तो बात आई - गई  हो गई। श्री पित्रौदा भी मौन साधकर बैठ गए। लेकिन एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भविष्यवाणी कर दी कि कुछ समय बाद श्री पित्रौदा अपने पद पर पुनः बैठ जायेंगे। यह सब काँग्रेस की चाल है। वह अपने कुछ नेताओं से इस तरह के बयान दिलवाकर विवाद उत्पन्न करवाती है। कुछ दिनों के लिए उन्हें दूर रखकर पुनः वापस पद दे दिया जाता है। उसके बाद लोकसभा चुनाव संपन्न होने तक उनकी कोई चर्चा भी नहीं सुनाई दी। गत दिवस अचानक वे एक बार फ़िर सुर्खियों  में आये किंतु किसी बयान या अन्य गतिविधि की बजाय नहीं अपितु इंडियन ओवरसीज काँग्रेस के अध्यक्ष पद पर दोबारा नियुक्ति को लेकर। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि उन्होंने खुद होकर पद छोड़ा था न कि पार्टी ने हटाया था। इसके अलावा उन लोगों को नस्लीय सोच का बता दिया जिन्होंने उनके बयान की आलोचना की थी। काँग्रेस अपनी पार्टी से जुड़े संगठनों में किसको नियुक्त करे ये उसका अधिकार है किंतु जो व्यक्ति चुनाव के दौरान विवादास्पद बयान देने के कारण पार्टी के लिए असहनीय हो गया था और उसके बचाव के लिए कोई आगे नहीं आया हो उसे चुनाव समाप्त होते ही पुनः उसी पद पर नियुक्त कर देने से श्री मोदी के आरोपों की पुष्टि हो गई है। वैसे भी ये पहला मौका नहीं है जब उन्होंने विवादित बयान देकर पार्टी को मुश्किल में डाल दिया। बीते वर्षों में  राम मन्दिर और  पुलवामा पर की गईं उनकी टिप्पणियां आलोचना का पात्र बनीं। इसी तरह 84 के सिख दंगों पर हुआ तो हुआ जैसा कटाक्ष  सिख समुदाय की नाराजगी की वजह बना। वहीं संविधान के निर्माण में डाॅ. आंबेडकर से ज्यादा भूमिका पण्डित नेहरू की थी जैसे बयान से दलित समुदाय में रोष फैला। उनके तकनीकी ज्ञान और पेशेवर दक्षता पर कोई संदेह किये बिना ये कहा जा सकता है कि ऐसे गैर राजनीतिक सलाहकारों के कारण ही पहले राजीव गाँधी और डाॅ. मनमोहन सिंह के हाथ से सत्ता खिसकी। अब वे राहुल के बेहद नजदीकी बने हुए हैं। उनकी पुनर्नियुक्ति से काँग्रेस के सामने यह सवाल आ खड़ा हुआ है कि क्या चुनाव खत्म होते ही श्री पित्रौदा के वे बयान फायदेमंद हो गए जिनके कारण उन्हें हटना पड़ा या हटाया गया था। और ये भी कि क्या काँग्रेस पार्टी उनके उन बयानों से अब सहमत हो गई जो चुनाव के समय उसे नुकसानदायक प्रतीत हो रहे थे। उनकी पुनर्नियुक्ति से ये लगता है कि श्री गाँधी के करीबी होने के कारण  श्री पित्रौदा को अभयदान मिलता रहा है । लेकिन इस तरह के व्यक्ति अक्ल के अजीर्ण से ग्रसित होने के कारण परेशानी का सबब बन जाते हैं। भविष्य में भी वे पार्टी के लिए मुसीबत नहीं बनेंगे इसकी गारंटी कौन देगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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