Wednesday, 26 June 2024

पहले मुकाबले में एनडीए भारी पड़ा : काँग्रेस की रणनीति फुस्स साबित हुई

कसभा अध्यक्ष पद के लिए मुकाबले की स्थिति बन जाने का अर्थ ये निकला  कि चुनाव के दौरान उत्पन्न कटुता आगे भी जारी रहेगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा आम सहमति बनाने के लिए की गई बैठक में काँग्रेस ने  शर्त रखी  कि उपाध्यक्ष पद दे दो तो अध्यक्ष के लिए सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को सर्व सम्मति से चुन लिया जाएगा। समझौता न होने के दो कारण सामने आये । पहला ये कि राजनाथ सिंह ने लौटकर फोन नहीं किया और दूसरा यह कि भाजपा द्वारा ओम बिरला का नाम सामने लाने से काँग्रेस सहित विपक्ष बिदक गया। और उसकी ओर से केरल के वरिष्ट सांसद  के. सुरेश को उतारकर  मुकाबले की स्थिति बना दी गई। विपक्ष का मानना था कि  ध्वनि मत की बजाय मतपत्र से चुनाव होने पर एनडीए के कुछ सांसद  भीतरघात करेंगे। हालांकि श्री बिरला की ओर से 10 सेट नामांकन के भरे जाने से  एनडीए की एकजुटता सामने आ गई थी वहीं श्री सुरेश केवल 3 नामांकन सेट ही दाखिल कर पाए। उस पर भी तृणमूल काँग्रेस ने इसे इकतरफा निर्णय बताते हुए काँग्रेस की चौधराहट स्वीकार नहीं करने का संकेत दे दिया। ये इस बात का प्रमाण है कि ममता इंडिया गठबंधन में अपनी शर्तों पर रहेंगी। दरअसल काँग्रेस इस मामले में जल्दबाजी कर गई। पहले तो उसने प्रोटेम स्पीकर पर  विवाद खड़ा कर सत्ता पक्ष को नाराज किया साथ ही उपाध्यक्ष पद की शर्त रखते हुए अध्यक्ष  के चुनाव में टकराव का इशारा कर दिया। यही नहीं तो तेलुगु देशम को अध्यक्ष पद के लिए समर्थन का लालच देकर एनडीए से बाहर आने भी उकसाया । लेकिन इस सबसे भाजपा चौकन्नी हो गई और उसने तेलुगु देशम तथा जनता दल (यू) द्वारा अध्यक्ष पद हेतु बनाये जा रहे कथित दबाव को खत्म करते हुए श्री बिरला को ही दोबारा अध्यक्ष बनाने की बिसात बिछाई और काँग्रेस को उपाध्यक्ष पद हेतु कोई आश्वासन न देकर अपना आत्मविश्वास प्रकट कर दिया । चर्चा है पिछली दो लोकसभा की तरह इस बार भी  उपाध्यक्ष नहीं होगा किंतु गठबंधन में संतुलन के लिए जरूरी लगा तो सहयोगी दल के किसी सांसद को इस पद पर बिठा दिया जाएगा। इस मामले में काँग्रेस नेतृत्व की अपरिपक्वता एक बार उजागर हो गई क्योंकि उसने लोकसभा चुनाव के नतीजों के फ़ौरन बाद अध्यक्ष के चुनाव के लिए सत्ता पक्ष में तोडफ़ोड़ करने का जो दांव चला वह कारगर नहीं हो सका। उलटे तृणमूल काँग्रेस की नाराजगी सामने आने से विपक्ष में बिखराव  का संकेत मिल गया।  हालांकि बाद में राहुल गाँधी द्वारा ममता से बात किये जाने पर वे मान तो गईं किंतु उन्होंने ये नसीहत तो दे ही दी कि वे तृणमूल को हल्के में न लें। असल में राहुल से ममता की नाराजगी की एक वजह चुनाव बाद उनके द्वारा बधाई देने के लिए किया फोन नहीं उठाना और न ही  पलटकर फोन करना भी है। काँग्रेस इन दिनों जिस प्रकार अखिलेश यादव को महत्व दे रही है उससे भी उनको तकलीफ है। बहरहाल, काँग्रेस का सारा बड़बोलापन धरा रह गया जब ओम बिरला ध्वनि मत से ही निर्वाचित हो गए और विपक्ष मत विभाजन की मांग करने का साहस तक न जुटा सका। इस प्रकार सत्तारूढ़ एनडीए ने इंडिया गठबंधन से नये सदन में पहले शक्ति परीक्षण में सफलता ही हासिल नहीं की अपितु ये भी स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष के पास अच्छे रणनीतिकारों की कमी है। वरना वह बिना शर्त लगाए अध्यक्ष के लिए श्री बिरला का समर्थन कर देता और उनके निर्वाचन के बाद फिर उपाध्यक्ष पद हेतु दावा करता। उस स्थिति में यदि सत्ता पक्ष नहीं मानता तब उसे आलोचना का शिकार होना पड़ता। लेकिन पहले प्रोटेम स्पीकर के चयन में अनावश्यक तौर पर दलित का मुद्दा उठाना, फिर अध्यक्ष पद के लिए समर्थन के बदले उपाध्यक्ष की सौदेबाजी करना और अंततः ध्वनि मत से श्री बिरला के चुने जाने पर मत विभाजन की मांग नहीं करने से ये बात सामने आ गई कि विपक्ष में दिखावटी हौसला कितना भी हो लेकिन हिम्मत का अभाव है। विपक्ष को डर था कि मतदान की स्थिति में उसके कुछ वोट श्री बिरला के पक्ष में  जा सकते हैं। दूसरी बार अध्यक्ष बनकर श्री बिरला ने स्व. बलराम जाखड़ की बराबरी कर ली जिनको बतौर अध्यक्ष दो  कार्यकाल मिले। वे अनुभव संपन्न होने के साथ कड़क भी हैं। सदन का संचालन करने में अनुभव काफी मददगार होता है। हालांकि विपक्ष की बेंचों पर इस बार ज्यादा सांसद हैं । इंडिया गठबंधन के तौर पर उनकी ताकत और बढ़ गई है जिससे आसंदी का काम कठिन होगा किंतु वे उस स्थिति से कुशलता पूर्वक निपट सकेंगे ये उम्मीद है। इस चुनाव में मिली विफलता से विपक्ष को यह सीखना चाहिए कि बिना पर्याप्त तैयारी और ताकत के मुकाबले में उतरना बुद्धिमत्ता नहीं होती। अपना अध्यक्ष चुनवाकर भाजपा ने सहयोगी दलों को भी ये एहसास करवा दिया कि उसका संख्याबल  भले ही कम हुआ किंतु मनोबल यथावत है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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