Saturday, 1 June 2024

अर्थव्यवस्था भले मजबूत हो किंतु आंकड़ों से पेट नहीं भरता

कसभा चुनाव के आखिरी चरण के मतदान के ठीक पहले खबर आई कि बीते वित्तीय वर्ष में विकास दर 8.2 प्रतिशत पहुँच गई जो अनुमान से 0.06 फीसदी अधिक है। इस मामले में हमने चीन और अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। सरकार को मिले टैक्स में 14 फीसदी की वृद्धि भी इसकी पुष्टि करती है। यद्यपि खेती, बिजली, गैस, जल, व्यापार, होटल और परिवहन जैसे क्षेत्रों में गिरावट   चिंता का विषय है किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग में उल्लेखनीय वृद्धि अच्छा संकेत  है। विकास दर बढ़ने  का सबसे बड़ा कारण मेन्यूफैक्चरिंग और माइनिंग सेक्टर का जोरदार प्रदर्शन रहा। सरकार द्वारा किये पूंजीगत निवेश ने भी उसमें टेका लगाया। रिजर्व बैंक ने इसी आधार पर कहा है कि आगामी एक दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए  उत्साहजनक रहेगा। साधारण समझ रखने वाले भी विकास दर में बढ़ोतरी से ये उम्मीद करेंगे कि प्रत्यक्ष न सही , परोक्ष रूप से तो इसका  लाभ उनके हिस्से में भी आये। उपभोक्ताओं  की बाजार में मौजूदगी भी उत्साहजनक है वहीं  इलेक्ट्रानिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योग में भारी माँग ने अर्थव्यवस्था को जबर्दस्त संबल दिया। यद्यपि जमीन - जायजाद के व्यवसाय पर अभी भी कोरोना का प्रभाव है। वहीं वर्क फ्राम होम और वीडियो काँफ़्रेंसिंग जैसे तरीकों ने होटल एवं परिवहन क्षेत्र को प्रभावित किया। सबसे बड़ी चिंता का विषय है आनलाइन व्यापार का बढ़ता दायरा जिसने छोटे और मझोले व्यवसायी के लिए  अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। इसके साथ ही ये अवधारणा भी तेजी से मजबूत हो रही है कि भारत का समूचा अर्थतंत्र कुछ धनकुबेरों के हाथों में चला गया है जो अपनी संपन्नता के बल पर सरकार को अपनी उंगलियों पर नचा सकते हैं। इसी के साथ  नौजवानों के मन में ये  बात बैठती जा रही है कि सरकार निजीकरण के जरिये नौकरियों के अवसर घटाती जा रही है और  लाखों पद खाली  रहने के बावजूद भर्ती नहीं की जाती। जैसे - तैसे परीक्षा की नौबत आती है तो प्रश्नपत्र लीक हो जाते हैं। इसी तरह परीक्षा तथा साक्षात्कार  के बाद परिणाम आने में भी बरसों लगने से युवाओं में व्यवस्था के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। अनेक अर्थशास्त्री इस बात के प्रति आगाह कर चुके हैं कि भारत रोजगार रहित विकास की राह पर बढ़ रहा है। छोटे - छोटे यूरोपियन देशों में  तो कम जनसंख्या के कारण मशीनों का सहारा लेना लाजमी है किंतु वहाँ सामाजिक सुरक्षा का दायरा बड़ा होने से बेरोजगारी भत्ता भी देना संभव है। लेकिन भारत की स्थिति सर्वथा भिन्न है। विशाल जनसंख्या और करोड़ों लोगों के गरीब होने के आगे समूचा विकास बौना साबित हो जाता है। स्व. इंदिरा गाँधी ने हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की शुरुआत कर खाद्यान्न और दूध उत्पादन में तो भारत को आत्मनिर्भरता के मुकाम तक पहुंचा दिया किंतु 1971 के लोकसभा चुनाव में गरीबी हटाओ का जो नारा दिया वह हवा - हवाई होकर रह गया। यहाँ तक कि  करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे बसर करने मजबूर हैं। मोदी सरकार द्वारा 80 करोड़ गरीबों को हर माह 5 किलो खाद्यान्न देने पर विपक्ष तंज कसता है कि अर्थव्यवस्था कुलांचे मार रही है तब 80 करोड़ गरीब क्यों है ? सवाल वाजिब है किंतु आजादी के बाद लगभग 60 साल तक देश पर राज करने वाली काँग्रेस को ही इस सवाल का उत्तर देना चाहिए। खैर , दुनिया की पाँचवी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद जब देश तीसरे स्थान पर आने का हौसला दिखा रहा है तब जरूरी हो जाता है कि विकास के मायने बदले जाएं। अर्थात 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देने के साथ विकास की प्रक्रिया में शामिल करने की कार्य योजना अमल में लाई जाए। ऐसा करने से बेरोजगारी को लेकर फैल रहा असंतोष कम किया जा सकेगा। इस अवधारणा को दूर करना समय की माँग है कि सरकारी नौकरी से पूरे देश को रोजगार उपलब्ध करवाना संभव है। जहाँ तक बात महंगाई की है तो सरकार को  समझना होगा कि आयकर  दरों में वृद्धि नहीं करने और कारपोरेट टैक्स में कमी करने के बावजूद करदाताओं और कर की राशि में जबर्दस्त उछाल आया। इससे साबित हो गया कि  करों का बोझ कम हो तथा  जटिलताएं दूर कर दी जाएं तो लोग कर देने के प्रति प्रोत्साहित होते हैं। अगले हफ्ते देश में नई सरकार का गठन होगा। चुनाव में सत्ता और विपक्ष दोनों ने वायदों की झड़ी लगा दी है। उन सबको पूरा करना तो आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा असंभव कार्य होगा लेकिन यदि अर्थव्यवस्था मजबूत है तो फिर उसकी सुखानुभूति  साधारण व्यक्ति को भी होना चाहिए क्योंकि आंकड़े भले ही कितने भी आकर्षक हों किंतु उनसे पेट नहीं भरता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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