1 जून को लोकसभा चुनाव के मतदान की प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी। 4 जून की दोपहर तक ये भी निश्चित हो जायेगा कि अगली सरकार किसकी होगी। चुनाव शुरू होने के पहले लग रहा था कि विपक्ष नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सामने टिक नहीं सकेगा। 22 जनवरी को अयोध्या में राम मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय देश का जो माहौल था उसके बाद बड़े - बड़े राजनीतिक विश्लेषक भी आश्वस्त हो चले थे कि मुकाबला इकतरफा होगा। प्रधानमंत्री द्वारा 400 पार का जो नारा दिया वह उसी माहौल का परिणाम था। लेकिन धीमी शुरुआत के बाद विपक्ष ने गति पकड़ी और राष्ट्रवाद, हिंदुत्व तथा राम मन्दिर जैसे मुद्दों के जवाब में चुनाव को बेरोजगारी और महंगाई जैसी उन समस्याओं पर केंद्रित करने का प्रयास किया जो आम आदमी की ज़िंदगी से नजदीकी से जुड़ी हुई हैं। इसी के साथ भाजपा को स्थानीय मुद्दों पर घेरने की रणनीति बनाई। इंडिया गठबंधन में काँग्रेस ही सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी है। कहने को तो यह दर्जा आम आदमी पार्टी को भी हासिल है किंतु उसका फैलाव बेहद सीमित है। लेकिन गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय पार्टियों की दादागिरी के समक्ष काँग्रेस ने बिना ऐंठ दिखाये जिस तरह से समर्पण किया उसकी वजह से भाजपा को अनेक राज्यों में उन क्षेत्रीय छ्त्रपों से जूझना पड़ा जो क्षेत्रीय या जातीय भावनाओं का प्रतिनिधित्व काँग्रेस से बेहतर करते हैं। इसी तरह जिन राज्यों में काँग्रेस सीधा मुकाबला करने की स्थिति में रही वहाँ गठबंधन के अन्य घटक लड़ाई से दूर हो गए। यद्यपि प. बंगाल और केरल अपवाद रहे जहाँ क्रमशः ममता बैनर्जी और वाम दलों ने काँग्रेस को साथ रखने से मना कर दिया। लेकिन वे गठबंधन में बने रहने की बात भी दोहराते रहे। इस समीकरण से भाजपा की आसान दिख रही जीत कड़े संघर्ष में बदलने का एहसास होने लगा। उ.प्र को छोड़कर भाजपा के प्रभाव वाले किसी भी प्रदेश में चूंकि प्रादेशिक नेतृत्व पहले जैसा सशक्त नहीं रहा लिहाजा पूरा दारोमदार प्रधानमंत्री श्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर आकर टिक गया। इस कारण विपक्ष को हावी होने का अवसर मिला। रही - सही कसर पूरी कर दी पहले चरण के कम मतदान ने जिसका विश्लेषण मोदी लहर के कमजोर पड़ने के तौर पर किया जाने लगा। हालांकि जब अगले चरणों में भी यह चलन जारी रहा तब उक्त धारणा बदली किंतु ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि साधन संपन्नता के बावजूद भाजपा की आक्रामकता तुलनात्मक तौर पर विपक्ष से कम रही। पार्टी के जिस आई.टी सेल ने बीते कुछ सालों में जबरदस्त छवि बना रखी थी वह भी इस चुनाव में उतना असरकारी नहीं दिखा। सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थक 400 पार का नारा दोहराते तो नजर आये किंतु यू ट्यूब में भाजपा को घेरने का जो कार्य कतिपय पत्रकारों ने किया वह विपक्ष को मुकाबले में दिखाने में सफल रहा। इस मोर्चे पर भी भाजपा कमजोर नजर आई। हालांकि प्रशांत किशोर ने अंतिम दौर में आयेगा तो मोदी ही की अवधारणा को बल प्रदान किया किंतु उनको भाजपा समर्थक प्रचारित करते हुए गलत साबित किया जाने लगा। भाजपा की दिक्कत ये रही कि वह श्री किशोर द्वारा दिये गए आंकड़े को स्वीकार नहीं कर सकती थी क्योंकि वे उसकी सीटें बढ़ने और सरकार लौटने को तो स्वीकार कर रहे थे किंतु 370 और 400 पार के दावे को अतिरंजित मानते थे। जवाब में डाॅ. योगेंद्र यादव ने भी एक आकलन जारी कर भ्रम फैलाने का दांव चला जिसमें भाजपा को बहुमत से दूर बताया गया। कुल मिलाकर विपक्ष ने अपनी मोर्चेबन्दी से भाजपा को काफी छकाया । यही वजह रही कि शुरुआती मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के बाद बीच - बीच में वह खुद उसके प्रभाव में आई। यद्यपि ये कहना तो जल्दबाजी होगी कि भाजपा सत्ता गंवाने जा रही है क्योंकि दबी जुबान ही सही डाॅ. यादव ने भी उसे 250 से कम सीटें नहीं दीं वहीं काँग्रेस को 100 सीटें मिलने की बात कोई नहीं कह रहा। विपक्ष द्वारा बनाये गए माहौल में कितनी दम रही उसका काफी कुछ जायजा तो 1 जून की शाम को एग्जिट पोल के नतीजे दे देंगे । लेकिन एक बात तो स्वीकार करना ही होगी कि उसने बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर भाजपा को रक्षात्मक होने बाध्य कर दिया। चूंकि विपक्ष के पास खोने के लिए कुछ था भी नहीं इसलिए उसने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। दरअसल काँग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को ये समझ में आ चुका है कि मोदी सरकार की वापसी होने पर उनका भविष्य अंधकारमय हो जायेगा। जहाँ तक बात भाजपा की है तो अभी भी संभावना उसकी जीत की है लेकिन तीसरी बार सत्ता में आने के बाद श्री मोदी को बेरोजगारी और महंगाई की समस्या को हल करने के लिए ठोस उपाय करना होंगे क्योंकि भले ही बोले न किंतु उसका परंपरागत समर्थक मध्यम वर्ग भी इन मुद्दों पर नाखुश है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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