Wednesday, 8 May 2024

विपक्षी गठबंधन में वैचारिक एकरूपता और सामंजस्य का अभाव


राहुल गाँधी कह रहे हैं वे आरक्षण  पर लगी 50 प्रतिशत की बंदिश खत्म करवा देंगे, लालू प्रसाद यादव मुसलमानों को आरक्षण देने का वायदा कर बैठे, रामगोपाल यादव के मुताबिक अयोध्या में बना राम मंदिर बेकार है, असदुद्दीन  ओवैसी बाबरी मस्ज़िद जिंदाबाद करवा रहे हैं। ममता बैनर्जी और विजयन अपने राज्य में सी.ए.ए लागू नहीं होने देने का ऐलान कर चुके हैं। वामपंथी जम्मू कश्मीर में धारा 370 को बहाल करने का दम भर रहे हैं। ऐसे में एकजुट होकर भाजपा के विरुद्ध चुनाव मैदान में उतरे इंडिया गठबंधन के घटक दलों के बीच नीतिगत मतभिन्नता साफ नजर आ रही है। वैसे भी सभी ने अपने अलग - अलग घोषणापत्र जारी करते हुए ये साबित कर ही दिया कि उनकी एकता केवल मंच पर एक साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाने तक ही सीमित है। संपत्ति का सर्वेक्षण और विरासत टैक्स जैसे मुद्दों पर भी विपक्ष की वैचारिक अस्पष्टता उजागर हो रही है।  परिणाम ये निकल रहा है कि  इंडिया गठजोड़ में शामिल पार्टियां एक - दूसरे के नीतिगत बयानों से असहमत होने पर भी उनका विरोध नहीं कर पा रहीं।  ये भी देखने मिल रहा है कि विपक्षी  नेताओं के बीच भी सामंजस्य की कमी है। लालू प्रसाद द्वारा मुस्लिम आरक्षण के पक्ष में दिये बयान पर भाजपा ने आक्रामक रुख दिखाया तो उनके बेटे तेजस्वी सफाई देते दिखाई दिये। इसी तरह रामगोपाल द्वारा राम मंदिर को बेकार कहे जाने पर ज्योंही समाजवादी पार्टी पर हमले शुरू हुए त्योंही अखिलेश यादव ने राम भक्त होने का राग छेड़ दिया। इस तरह के बयानों को रोकने की कोई संगठनात्मक व्यवस्था नहीं होने से चुनाव के बीच इंडिया गठबंधन में वैचारिक एकजुटता गायब सी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  आरक्षण को 50 प्रतिशत  की सीमा से बाहर निकालने के श्री गाँधी के बयान पर ये कहते हुए हमला कर रहे हैं कि वे दलित और ओबीसी के कोटे का आरक्षण छीनना चाहते हैं। इसी तरह श्री गाँधी  लगभग रोजाना ही अंबानी और अडानी के विरुद्ध बोलते हैं लेकिन ममता और शरद पवार से उन दोनों के विरुद्ध  एक शब्द भी नहीं सुनाई देता। उद्धव ठाकरे भी इस मुद्दे पर  साथ नहीं हैं। इन्हीं विरोधाभासों के कारण विपक्षी गठबंधन की धाक राष्ट्रीय स्तर पर नहीं बन पा रही। सबसे बड़ी बात क्षेत्रीय दलों द्वारा काँग्रेस को ताकतवर होने से रोकने की रणनीति है। यही वजह है कि श्री गाँधी ये तो कहते हैं कि भाजपा 150 सीटों तक ही सिमट जायेगी किंतु वे ये कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे कि काँग्रेस के कितने सांसद जीतेंगे? अन्य दलों को भी काँग्रेस की   चिंता नहीं है। उ.प्र को ही लें तो अखिलेश ने काँग्रेस को वैसे तो 17 सीटें दे दीं किंतु काँग्रेस का पूरा तामझाम रायबरेली और अमेठी में आकर सिमट गया है। राहुल के अमेठी छोड़कर रायबरेली से लड़ने से भी ये संदेश गया कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार  होने के बावजूद वे 2019 में हारी अपनी सीट को दोबारा हासिल करने की हिम्मत न दिखा सके। प्रियंका वाड्रा  भी अमेठी में लड़ने से पीछे हट गईं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी पूरे आत्मविश्वास से मैदान में है। अखिलेश के अलावा उनकी पत्नी डिंपल सहित परिवार के पांच सदस्य चुनाव लड़ रहे हैं। प. बंगाल में प्रणव मुखर्जी के बाद काँग्रेस के सबसे बड़े चेहरे अधीर रंजन चौधरी के विरुद्ध  मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर  ममता ने एकला चलो का नारा बुलंद कर दिया। रायबरेली में तो सपा ने गठबंधन धर्म निभाते हुए राहुल के विरुद्ध  उम्मीदवार नहीं उतारा किंतु ममता नहीं मानीं। और तो और वायनाड में सीपीआई ने अपना  प्रत्याशी हटाने से इंकार करते हुए उल्टे राहुल को ही उत्तर भारत जाकर भाजपा को हराने की नसीहत दे डाली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तो विपक्षी गठबंधन  काँग्रेस के कारण ही टूटने के कगार पर आ गया क्योंकि उसके प्रदेश अध्यक्ष ने ही आदमी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी।  उस दृष्टि से भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ बेहतर समन्वय बना रखा है। राजनीतिक प्रेक्षक भी भले ही 400 पार के दावे को अतिशयोक्ति पूर्ण मान रहे हों किंतु मोदी सरकार की वापसी से इंकार नहीं करते। मतदान के तीन चरण संपन्न होने के बाद हालांकि बहुत साफ  संकेत तो नहीं मिले किंतु विपक्ष के  प्रचार अभियान में एकरूपता के अभाव की वजह से वह सत्ता परिवर्तन का एहसास जगाने में फिलहाल तो विफल है। वहीं हर चरण के बाद भाजपा ज्यादा जोर मारती दिख रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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