Monday, 13 May 2024

राष्ट्रीय चुनाव पर हावी होने लगे हैं स्थानीय मुद्दे

सभा चुनाव के चौथे चरण में 96 सीटों पर मतदान हो रहा है। 11 बजे तक औसत लगभग 25 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया  कुछ राज्यों में पहले चरण से ही शुरू हुआ कम मतदान का सिलसिला आज भी दिखाई दे रहा है। इससे साबित होता है कि इस बार 2014 और 2019 जैसा उत्साह नहीं दिख रहा। इसके कई कारण राजनीतिक  विश्लेषक मान रहे हैं जिनमें सबसे बड़ा है राष्ट्रीय चुनाव में स्थानीय मुद्दों का हावी होना। जिन राज्यों में बीते एक वर्ष में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं वहाँ के मतदाता राज्य सरकार का मूल्यांकन करते हुए इस चुनाव में मत देने का संकेत दे रहे हैं। क्षेत्रीय दलों के घोषणापत्र से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका उद्देश्य अपने राज्य के भीतर पाँव जमाये रखना मात्र है। आंध्र और उड़ीसा में विधानसभा चुनाव साथ ही होने से  ज्यादा चर्चा प्रादेशिक मुद्दों की हो रही है। अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति है। विभिन्न चैनलों के संवाददाता  समाज के विभिन्न वर्गों से जो बात करते हैं उसमें ज्यादातर लोगों को मोदी का नाम और काम तो मालूम है किंतु वे स्थानीय समस्याओं का बखान ज्यादा करते हैं। सुशिक्षित वर्ग भी राष्ट्रीय मुद्दों की चर्चा तो करता है किंतु घुमा फिराकर अपने इर्द गिर्द मंडराती समस्याओं पर उसकी बातचीत केंद्रित हो जाती है। इसी तरह कुछ सीटों पर किसी बड़े नेता की उम्मीदवारी होते ही सारे विषय आकर उसकी जाति पर केंद्रित हो जाते हैं जो बेहद चिंताजनक है। उ.प्र में कानून - व्यवस्था की बेहतर स्थिति के लिए महिलाएं राज्य की योगी सरकार की तारीफ करती हैं किंतु यह भी एक तरह से प्रदेश सरकार से जुड़ा मुद्दा है। राजमार्ग और फ्लाई ओवर का निर्माण बेशक केंद्र सरकार की उपलब्धि के तौर पर ज्यादातर मतदाताओं की पसंद है वहीं मुफ्त अन्न और मकान भी राष्ट्रीय मुद्दे के तौर पर चर्चा में आते हैं  किंतु उसके साथ ही ये भी सुनाई देता है कि पांच किलो राशन महीने भर के लिए अपर्याप्त है। उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस सिलेंडर प्राप्त करने वाली ज्यादातर महिलाएं अधिक कीमत की शिकायतें करती सुनाई देती हैं। युवाओं द्वारा सरकारी नौकरी हेतु ली जाने वाली परीक्षा  के पेपर लीक होने से जो  नाराजगी व्यक्त की जा रही है वह भी है तो राज्य स्तर की समस्या किंतु उसका असर लोकसभा चुनाव में भी साफ महसूस किया जा सकता है। और भी ऐसी अनेक बातें हैं जो विशुद्ध तौर पर स्थानीय होने के बाद भी लोकसभा चुनाव को प्रभावित कर रही हैं। इसका कारण हर समय चुनाव का माहौल देश में बने रहना है। लोकसभा चुनाव संपन्न होने के फ़ौरन बाद ही हरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में चुनाव होना हैं । 2025 में देश दिल्ली के साथ ही बिहार में विधानसभा चुनाव देखेगा तो 2026 में प. बंगाल, केरल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होंगे। इस वजह से मुद्दों का इतना घालमेल हो चुका है कि आम मतदाता के लिए ये समझना कठिन हो जाता है कि वह  राज्य सरकार चुनने मतदान कर रहा है या केंद्र के लिए । इसका असर क्षेत्रीय मुद्दों के  राष्ट्रीय राजनीति पर हावी होने के तौर पर दिखाई देने लगा है। इसीलिये  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी भी चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय राजनीति से जुड़ी बातों  पर जोर देना नहीं भूलते। कुछ राज्यों में मुफ्त खाद्यान्न योजना केंद्र और राज्य दोनों संचालित कर रहे हैं। ऐसा ही मुफ्त इलाज के बारे में है। म.प्र सदृश राज्य में किसानों को किसान सम्मान निधि मोदी सरकार भी देती है और प्रदेश सरकार भी। चूंकि मतदाता को लाभार्थी बनाकर छोटे - छोटे फायदों में उलझा दिया गया है लिहाजा लोकसभा चुनाव से जुड़े विषयों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाता। ये प्रवृत्ति चुनाव परिणामों को किस हद तक प्रभावित करेगी ये आज कहना कठिन है। हालांकि आलोचना करने वाले ज्यादातर लोग बातचीत के अंत में मोदी सरकार की वापसी की संभावना जताते हैं किंतु चुनाव का समूचा विमर्श और बहस राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय स्थानीय समस्याओं के अलावा जाति और व्यक्ति विशेष पर केंद्रित हो गया है। दावे कोई कितने भी करे लेकिन मतदाता उदासीन भी है और शांत भी। आम तौर पर तो यह यथास्थिति बने रहने का सूचक है किंतु क्षेत्रीय दल और उनके नेताओं के सीमित दायरे ने राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव का फर्क कम कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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