मोदी सरकार द्वारा 80 करोड़ लोगों को 5 किलो खाद्यान्न प्रति माह दिये जाने का मजाक उड़ाते हुए विपक्ष ये कहता आया है कि इससे स्पष्ट होता है कि इतने लोगों के पास पेट भरने की हैसियत भी नहीं है। इसके अलावा ये आरोप भी लगाया जाता है कि मात्र 5 किलो अनाज देकर यह सरकार लोगों का मुँह बन्द रखना चाहती है जिससे वे उसकी विफलताओं पर मुँह न खोलें। सरकार के विरोधी ये भी कहते हैं कि मुफ़्त गल्ला बाँटने से लोग अकर्मण्य होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि मजदूरों की कमी के लिए भी मुफ्त अन्न योजना को जिम्मेदार माना जाता है। ये जानकारी भी आती है कि बड़ी संख्या में लोग मुफ्त में मिले अनाज को किराने वाले को बेचकर कुछ और खरीद लेते हैं। मनरेगा के प्रारंभ होने के बाद गाँवों में शराब की बिक्री बढ़ने लगी थी। मुफ्त अनाज ने भी इसमें योगदान दिया। कुछ राज्यों में गरीब महिलाओं को प्रति माह कुछ धनराशि मिलने से घरेलू काम करने वालों का टोटा होने लगा। मध्यम वर्ग में इसे लेकर भारी असंतोष है किंतु उसकी बात को न कोई सुनने वाला है और न ही समझने वाला। काँग्रेस ने अपने घोषणापत्र में हर गरीब परिवार की एक महिला को प्रति माह 8500 रु. देने के साथ ही बेरोजगारों को प्रशिक्षु के तौर पर सालाना 1 लाख देने का वायदा किया है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में ऐसी ही गारंटियों ने काँग्रेस को जीत दिलवा दी थी लेकिन कुछ माह बाद म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में मतदाताओं ने उन्हीं वायदों को ठुकरा दिया। दरअसल हर चुनाव का अपना स्वभाव होता है। जिस जनता ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को भारी बहुमत दिया उसी ने लोकसभा में सातों सीटें भाजपा को सौंप दीं। राहुल गाँधी ने 2019 में किसान कल्याण निधि की राशि 72 हजार करने का वायदा उछाला किंतु मतदाताओं ने मोदी सरकार के 6 हजार से ही संतुष्टि दिखाई। कहने का आशय ये है कि जनता भी इस बात का अंदाज लगाती है कि सरकार किसकी बन सकती है। जिसकी संभावनाएं उसको ज्यादा प्रतीत होती हैं वह उसके वायदों पर भरोसा जताती है। इसीलिए जिन राज्यों में भाजपा की जीत के आसार नहीं होते वहाँ प्रधानमंत्री की रैलियां भी कारगर नहीं होतीं। वहीं उ.प्र जैसे राज्य में कृषि कानूनों के विरोध में हुए आंदोलन से उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों में भी पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को सफलता मिली। लोकसभा चुनाव में भी यही फार्मूला कारगर होता दिख रहा है। प. बंगाल, उड़ीसा, हिमाचल और दिल्ली में जहाँ गैर भाजपा सरकारें हैं उनमें भी भाजपा मुख्य मुकाबले में है तो उससे स्पष्ट होता है कि मतदाता केंद्र में उसकी वापसी के प्रति भरोसा रखते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस के 10 किलो अनाज और महिलाओं तथा बेरोजगारों को 1 लाख देने का चुनावी वायदा जमीनी स्तर तक नहीं पहुँच पा रहा। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार की प्रचंड लहर नजर आ रही हो। लेकिन रायबरेली और कन्नौज जैसी सीट पर राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के पक्ष में बोलते लोग भी मानते हैं कि केंद्र में एनडीए सरकार वापसी करने जा रही है। सबसे बड़ी बात विपक्षी गठबंधन का साझा घोषणापत्र जारी नहीं होना है। राहुल, अखिलेश, केजरीवाल, तेजस्वी सभी चिल्ला - चिल्लाकर कह रहे हैं कि 4 जून के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे किंतु इंडिया गठजोड़ का कोई भी नेता अपने प्रधानमंत्री का नाम बताने की हिम्मत नहीं बटोर पा रहा। जेल से छूटने के बाद केजरीवाल प्रधानमंत्री से उत्तराधिकारी का नाम बताने की माँग कर रहे हैं किंतु उनकी हिम्मत भी नहीं होती कि राहुल या अन्य किसी को बतौर भावी प्रधानमंत्री पेश कर सकें। उ.प्र में कांग्रेस मात्र 17 सीटों पर पर लड़ रही है जिनमें से मात्र रायबरेली और अमेठी ही चर्चा में हैं। बाकी के काँग्रेस उम्मीदवारों तक के नाम लोग नहीं जानते। भाजपा में जहाँ 400 पार को लेकर सभी एकमत हैं वहीं राहुल गाँधी भाजपा के 150 पर सिमटने की बात कहते हैं तो कोई विपक्षी नेता 200 तो कोई 250 का आंकड़ा गिनाता है। उ.प्र में बकौल राहुल, इंडिया गठबंधन 50 सीटें जीतेगा तो अखिलेश 79 सीटों का दावा कर रहे हैं। केजरीवाल ये कहते हुए विपक्ष समर्थक मतदाताओं का मनोबल तो़ड़ रहे हैं कि सितम्बर में नरेंद्र मोदी अपनी जगह अमित शाह को बिठा देंगे वहीं उ. प्र से योगी को हटा देंगे। इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयानों से विपक्ष में वैचारिक सामंजस्य की कमी सामने आ रही है। राहुल कुछ भी वायदे करें किंतु वे जनता को ये विश्वास नहीं दिलवा पा रहे कि काँग्रेस 150 सीटें जीतेगी। विश्लेषक तो उसके 100 तक पहुँचने की संभावना पर भी सवाल उठा रहे हैं। इसीलिए उसके वायदों का अपेक्षित प्रभाव नजर नहीं आ रहा। रही बात केजरीवाल जैसे नेताओं की तो उनकी पार्टी 25 से भी कम सीटें लड़ रही है इसलिए उनके बयान छोटे मुँह बड़ी बात माने जा रहे हैं। लोकसभा की 70 फीसदी सीटों पर मतदान होने के बाद भी विपक्ष ये विश्वास नहीं पैदा कर सका कि उसको बहुमत मिल रहा है। जिसकी जीत के आसार हों उसी के वायदों पर लोग भरोसा करते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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