लोकसभा चुनाव शुरू होते ही उ.प्र की रायबरेली और अमेठी सीट को लेकर कयास लगने शुरू हो गए थे। सोनिया गाँधी के राज्यसभा में निर्वाचित होने के बाद रायबरेली से प्रियंका वाड्रा के चुनाव लड़ने की अटकलें लगने लगीं। जब राहुल गाँधी ने केरल की वायनाड सीट से दोबारा लड़ने का निर्णय किया तब अमेठी को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई। 2019 में इस सीट से पराजय की आशंका के कारण ही उन्होंने वायनाड से भी हाथ आजमाए। अमेठी में उनको स्मृति ईरानी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। उसके बाद पाँच साल में वे भूले - भटके दो - तीन बार ही वहाँ आये। इससे ये अवधारणा बनने लगी कि उनका मन अमेठी से उचट चुका है। लेकिन दबी चर्चा ये भी चलती रही कि वायनाड के मतदाताओं की नाराजगी से बचने के लिए उनके अमेठी से भी लड़ने का निर्णय गुप्त रखा गया है।
26 अप्रैल को वहाँ मतदान होने के बाद अमेठी और रायबरेली को लेकर काँग्रेस में मंथन शुरू हुआ। अमेठी से श्री गाँधी के लड़ने के संकेत भी आने लगे। वहीं रायबरेली से प्रियंका की उम्मीदवारी भी तय मानी जा रही थी। 3 मई को नामांकन का आखिरी दिन था किंतु 2 तारीख की रात तक पार्टी की तरफ से अधिकृत घोषणा नहीं किये जाने से कयासों का दौर चलता रहा। अचानक 3 तारीख की सुबह पार्टी ने रायबरेली से राहुल और अमेठी से गाँधी परिवार का राजनीतिक प्रबंधन देखने वाले किशोरीलाल शर्मा को प्रत्याशी घोषित कर सबको चौंका दिया। इंदिरा गाँधी के जमाने में यशपाल कपूर और माखन लाल फोतेदार इन दोनों सीटों पर परिवार की राजनीति का पूरा इंतजाम किया करते थे। राजीव गाँधी के आने के बाद से श्री शर्मा ने उनका स्थान ले लिया। कहा जाता है वे इन दोनों सीटों पर काँग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ ही जनसाधारण के बीच भी पैठ रखते हैं। लेकिन उनको अमेठी से उतारे जाने के फैसले से क्षेत्र के काँग्रेस कार्यकर्ता भी भौचक रह गए।
इसी तरह रायबरेली से राहुल को उम्मीदवार बनाये जाने की बात भी लोगों को अटपटी लगी। भाजपा ने बिना देर लगाए कहना शुरू कर दिया कि वे हार के भय से अमेठी छोड़कर रायबरेली भाग गए। प्रियंका के नहीं लड़ने पर भी कटाक्ष किये गए। इसके अलावा ये भी कहा जाने लगा कि इस फैसले के पीछे सोनिया गाँधी की विरासत का मसला छिपा हुआ है जो किसी भी सूरत में वाड्रा परिवार को कांग्रेस की पहिचान नहीं बनने देना चाहतीं। प्रियंका के पति रॉबर्ट भी कुछ समय पूर्व अमेठी से ताल ठोंकते नजर आये थे जिन्हें पार्टी ने कोई भाव नहीं दिया। प्रियंका को स्मृति ईरानी के विरुद्ध लड़ाये जाने की चर्चा भी जोरों पर थी किंतु वे पहले चुनाव में हार का खतरा उठाने से पीछे हट गईं।
हालांकि काँग्रेस ने श्री शर्मा को रायबरेली से लड़ाये जाने को अपना मास्टर स्ट्रोक बताते हुए यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि ऐसा करने से अमेठी में स्मृति ईरानी का महत्व कम हो गया क्योंकि राहुल के मुकाबले में आने से वह सीट हाई प्रोफाइल बन जाती। पार्टी का ये भी सोचना है कि रायबरेली से श्री गाँधी के न लड़ने से वह सीट हाथ से निकल सकती थी। 2019 में भी श्रीमती गाँधी की जीत का अंतर घटकर 1.60 लाख रह गया था। वह भी तब जब सपा और बसपा दोनों ने प्रत्याशी नहीं उतारे। इस बार सपा तो साथ है किंतु बसपा ने दोनों सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करते हुए दलित मतों में बंटवारा होने के हालात बना दिये।
रायबरेली और अमेठी को गाँधी परिवार का गढ़ कहा जाता रहा है किंतु दोनों में उसका एक भी विधायक नहीं है। सपा के एक विधायक भी भाजपा के साथ जुड़ गए हैं। इससे साफ हो जाता है कि ये दोनों सीटें गाँधी परिवार का गढ़ भले रह गई हों लेकिन काँग्रेस की जड़ें यहाँ उखड़ चुकी हैं। इसके चलते ही राहुल को रायबरेली से उतारना पड़ा। यदि सपा का समर्थन न हो तो वे यहाँ से लड़ने की हिम्मत ही नहीं करते।
रही बात किशोरीलाल शर्मा की तो वे काँग्रेस के नहीं अपितु गाँधी परिवार के निजी सेवक हैं। ऐसे में स्थानीय काँग्रेस जनों में इस बात का गुस्सा भी है कि पार्टी नेतृत्व ने उनमें से किसी को अवसर देने के बजाय ऐसे व्यक्ति पर भरोसा किया जो प्रथम परिवार का वफादार मात्र है।
कुल मिलाकर रायबरेली को भले काँग्रेस सुरक्षित मानकर चल रही हो लेकिन अमेठी को दोबारा हासिल करने के प्रति उसके मन में संशय है वरना राहुल न सही किन्तु प्रियंका वहाँ से अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत करतीं। एक बात और ये भी विचारणीय है कि जिस तरह श्री शर्मा जैसे नये - नवेले प्रत्याशी के सामने स्मृति ईरानी की प्रतिष्ठा दांव पर है ठीक वैसे ही रायबरेली में भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह के सामने अपनी साख बचाना राहुल गाँधी के लिए भी चिंता का विषय है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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