उत्तराखंड के गढ़वाल अंचल में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री सनातन धर्मियों की आस्था के प्राचीनतम केंद्र हैं। इस क्षेत्र को देवभूमि भी कहा जाता है। अनेकानेक पौराणिक घटनाओं का यहाँ से गहरा संबंध है। यूँ तो समूचा गढ़वाल ही पवित्र स्थलों से भरा हुआ है किंतु उक्त चारों धाम के दर्शन करना हर हिन्दू के जीवन का सपना होता है। प्राचीन काल से यहाँ की यात्रा प्रतिवर्ष गर्मियों में अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर दीपावली तक जारी रहती है। एक जमाना था जब श्रद्धालु ऋषिकेश से पैदल इन तीर्थों के दर्शन करने जाया करते थे। रास्ते में बसे पहाड़ी गाँवों और कस्बों में बने लकड़ी के घरों में उन्हें ठहरने और भोजन की सुविधा मामूली शुल्क पर उपलब्ध थी। सुविधाओं के अभाव में यात्रा कठिन होने पर भी आस्था रूपी शक्ति के कारण यात्री अपने गन्तव्य तक पहुंचकर जीवन को सार्थक मान लेते थे। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद इस क्षेत्र में सड़कों के साथ ही संचार सुविधाएं बढती गईं और अब बारह मासी राजमार्ग बना दिये गए हैं। पैदल यात्रा तो दशकों पहले ही इतिहास का विषय बन चुकी थी । अब तो आरामदेह बसें , टैक्सी और निजी वाहनों की वजह से चार धाम यात्रा ने धार्मिक पर्यटन का रूप ले लिया है। हेलीकाप्टर के जरिये कुछ दिन की यात्रा कुछ घंटों में संभव होने लगी है। ऐसे स्थलों पर यात्रियों के आवागमन और ठहरने आदि की समुचित व्यवस्थाएं होना स्वागत योग्य है। इनकी वजह से उक्त तीर्थ स्थलों की यात्रा करने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई जिसने यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले इलाकों की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है जो चिंता में डालता है। ताजा उदाहरण कुछ दिन पहले का है। यमुनोत्री के पट खुलने के दिन वहाँ जाने वाले संकरे पहाड़ी रास्ते पर भीड़ के कारण जाम लगने से अव्यवस्था फैल गई। अनेक तीर्थ यात्री और खच्चर दुर्घटना का शिकार हो गए। ताजा जानकारी के अनुसार यमुनोत्री और गंगोत्री के अंतिम 50 - 60 किमी की दूरी तय करने में लोगों को 20 घण्टे का समय लग रहा है। इस खबर से ही अंदाज लग जाता है कि यात्रा के शुरुआती दिनों में ऐसे हालात हैं तब आने वाले समय में तो स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। जून 2013 में केदारनाथ मंदिर के पीछे से आए जल सैलाब ने प्रलय का पूर्वाभास करवा दिया था। उसी तरह का हादसा कुछ वर्ष पहले अमरनाथ की पवित्र गुफा के दर्शनों हेतु एकत्र हजारों भक्तों ने झेला। इस सबसे साबित होता है कि इन पर्वतीय स्थलों पर मानवीय हस्तक्षेप का अतिरेक अब अत्याचार का रूप लेने लगा है। वैसे तो सभी पहाड़ी इलाके प्रदूषण के शिकार होकर अपनी सुंदरता खोने लगे हैं लेकिन उत्तराखंड के चारों धाम सर्वाधिक भुक्तभोगी हैं। बद्रीनाथ जाने वालों के लिए टोकन व्यवस्था किए जाने से वहाँ सुविधाजनक स्थिति बनाने में सफलता मिली है किंतु यमुनोत्री और गंगोत्री से आ रही खबरें विचलित कर रही हैं। हिमाचल के लोकप्रिय पर्यटन केंद्र शिमला और मनाली के रास्ते में चाहे जब जाम लगने से हजारों वाहन फंसकर रह जाते हैं। पहाड़ों के धसकने की घटनाएं भी जल्दी - जल्दी होना प्रकृति की चेतावनी है। जोशीमठ में धरती के धंसने के कारण पूरे शहर का अस्तित्व ही खतरे में आ गया था। कुछ समय पहले कुमाऊँ अंचल में बादल फटने के कारण नैनीताल की झील का पानी बाहर आकर निचले इलाकों के गाँव और कस्बों में भरने लगा। इस सबका कारण पहाड़ों के एकांत में बढ़ता खलल ही है। गढ़वाल में स्थित चारधाम आस्था के प्रमुख केंद्र होने से आकर्षण का केंद्र हैं। बद्रीनाथ तो आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से है। केदारनाथ प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में है तो यमुनोत्री और गंगोत्री क्रमशः यमुना और गंगा नदी के उद्गम होने के के कारण हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। पहले वृद्धावस्था में इन स्थानों की यात्रा लोग करते थे किंतु अब उम्र का बंधन समाप्त हो चुका है। आर्थिक समृद्धि और बढती सुविधाओं के कारण ये धाम अब धार्मिक आस्था से ऊपर उठकर आमोद - प्रमोद और रोमांच के लिए भी जाने जाते हैं। ट्रैवल एजेंसियां पेशेवर सुविधाएं प्रदान कर रही हैं। धर्मशालाओं की जगह गेस्ट हाउस और होटल आ गए हैं। यात्रा के मूल भाव पर भी इन सब बातों का असर पड़ा है। हाल ही के वर्षों में चार धाम यात्रा के दौरान कोई न कोई हादसा होता रहा है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार को केवल सुविधाओं के विकास तक सीमित रहने की बजाय आस्था के साथ अनुशासन लागू करने पर भी ध्यान देना चाहिए। इसके पहले कि पहाड़ अपना धैर्य खो बैठे सतर्क हो जाने में ही बुद्धिमत्ता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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