दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक बयान काफी चर्चित हुआ था जिसमें वे आम आदमी पार्टी के लोगों से कह रहे थे कि जेल जाने से न डरें क्योंकि वह दिल्ली सरकार के ही अधीन है। उनकी उस बात को हल्के में लिया गया था। लेकिन जब उनके कुछ मंत्री जेल गए और उन्हें घर जैसी सुविधाएं मिलीं तब उक्त बयान का मर्म समझ में आ गया। रोचक बात ये है कि दिल्ली पुलिस का नियंत्रण केंद्र सरकार के पास है जबकि तिहाड़ जेल दिल्ली सरकार के अधीन है। इसलिए उसमें बंद आम आदमी पार्टी के नेताओं को विशेष सुविधाएं मिल रही हों तो उसमें आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। वैसे भी जेल में बंद कैदियों को पैसा खर्च करने पर जो चाहो मिल जाता है। कुख्यात माफिया सरगनाओं द्वारा जेल में बैठकर मोबाइल फोन के जरिये अपने गैंग का संचालन किये जाने के दर्जनों उदाहरण सामने आ चुके हैं। पैसे के दबाव और राजनीतिक प्रभाव के चलते जेल के भीतर भी ऐशो - आराम के सारे इंतजाम होते हैं , ये खुला सच है। अनेक बंदी जेल प्रशासन के साथ संगामित्ती कर अस्पताल में भरती हो जाते हैं। इन सबके लिए तिहाड़ जेल भी बुरी तरह बदनाम है। ऐसे में श्री केजरीवाल द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से अपनी अंतरिम जमानत एक सप्ताह बढ़ाने की जो अर्जी लगाई गई उसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिये जाने से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। उल्लेखनीय है जैसे ही उन्हें गिरफ्तार किया गया वैसे ही आम आदमी पार्टी जेल में उनका स्वास्थ्य बिगड़ने का शोर मचाने लगी। वे मधुमेह के मरीज हैं इसलिए अदालत ने उनको घर से लाया भोजन करने की सुविधा प्रदान की थी। उसके बाद भी ये आरोप लगाया जाने लगा कि जेल प्रशासन की लापरवाही से उनका वजन तेजी से घट गया और ब्लड शुगर की मात्रा भी बढ़ गई। जबकि जेल प्रशासन ने प्रत्येक आरोप का अधिकृत रूप से खंडन किया। उसके बाद जब न्यायालय ने चुनाव प्रचार के नाम पर मुख्यमंत्री को 1 जून तक अंतरिम जमानत दी तो उस फैसले पर काफी उंगलियाँ उठीं क्योंकि इसी मामले में बंद पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की जमानत अर्जियाँ लगातार अस्वीकृत हुईं। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी चुनाव प्रचार हेतु रिहाई नहीं मिली। सबसे बड़ी बात बात ये है कि श्री केजरीवाल ने जेल जाने पर भी मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र नहीं दिया और जेल में बैठे - बैठे सरकार चलाने की घोषणा कर डाली। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनको हटाये जाने संबंधी याचिकाएं ये कहते हुए खारिज कीं कि संविधान इस बारे में मौन है। स्मरणीय है श्री सिसौदिया एवं दिल्ली सरकार के अन्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने भी गिरफ्तारी के काफी समय बाद पद छोड़ा था। 2 जून को जेल जाने से बचने के लिए श्री केजरीवाल ने अदालत में जो आधार बताये उनके मुताबिक उन्हें गंभीर बीमारियों का अंदेशा है जिसकी तत्काल जाँच जरूरी है। इसके बाद ही चर्चा होने लगी कि जेल से बाहर आते ही मुख्यमंत्री ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार में कूद पड़े। दिल्ली के अलावा उ.प्र और पंजाब में भी उन्होंने अनेक जनसभाओं और रोड शो सरीखे आयोजनों में घंटो मौजूदगी दर्ज करवाई। इस दौरान उनको स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या नजर नहीं आई। ऐसे में वे जेल जाने से बचने के लिए अदालत की सहानुभूति अर्जित करना चाह रहे थे। ऐसा लगता है उनको अंतरिम जमानत मिलने पर न्यायपालिका की जिस प्रकार से आलोचना हुई उसका प्रभाव सर्वोच्च न्यायालय पर आज का फैसला देते समय पड़ा होगा। यदि श्री केजरीवाल अस्वस्थ हैं और उनकी जाँच जरूरी है तो वह होनी चाहिए किंतु मुख्यमंत्री रहते हुए जेल से जब वे सरकार चला सकते हैं तब अपनी चिकित्सकीय जाँच और इलाज करवाने का आदेश भी जेल प्रशासन को दे सकते हैं जो कि उनकी सरकार के अधीन है। वैसे भी श्री केजरीवाल न्यायायिक हिरासत में हैं न कि सजायाफ्ता कैदी। इसी वजह से उनको जेल में अनेक ऐसी सुविधाएं दी गईं जो साधारण बन्दियों को नहीं मिलतीं। इसीलिए जब उन्होंने अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाने की अर्जी लगाई तब ये टिप्पणियां सुनाई देने लगीं कि वे लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद की राजनीतिक उठापटक में शामिल रहने के लिए हाथ - पाँव मार रहे हैं। अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है लिहाजा उनको 2 जून को जेल जाना होगा परंतु जब वे मुख्यमंत्री के रूप में जेल में बैठे - बैठे सरकार चला सकते हैं तब कम से कम अपनी बीमारी की जांच और इलाज से उनको कौन रोक सकता है?
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment