Thursday, 9 May 2024

जिसके पित्रौदा जैसे दोस्त हों उसे दुश्मनों की क्या जरूरत


सैम पित्रोदा के बारे में जन सामान्य तो उतना नहीं जानता क्योंकि वे अव्वल तो भारत में रहते नहीं और दूसरा पेशेवर व्यक्ति हैं। पहली बार उनकी शख्सियत  तब चर्चा में आई जब स्व. राजीव गाँधी के शासनकाल में उनके मार्गदर्शन पर संचार क्रांति हुई जिसके परिणामस्वरूप मोबाइल और इंटरनेट सुविधाएं देश को मिलीं। बाद की काँग्रेस सरकारों के दौर में भी वे बतौर सलाहकार अपनी सेवाएं प्रदान करते रहे। उनकी पेशेवर दक्षता अपनी जगह है किंतु  सत्ता प्रतिष्ठान की निकटता ने उनके मन में भी राजनीति का आकर्षण उत्पन्न कर दिया।  बीते कुछ वर्षों में काँग्रेस नेता राहुल गाँधी के विदेशों में आयोजित कार्यक्रमों के पीछे श्री पित्रौदा की ही भूमिका रही। कुछ दिनों पहले ही उन्होंनें अमेरिका के विरासत कर की प्रशंसा करते हुए भारतीय संदर्भ में वैसी ही जरूरत बताई तब उनके साथ ही पूरी काँग्रेस आलोचना का शिकार हुई। उस बयान की हर तरफ चर्चा हुई जिस पर काँग्रेस को रक्षात्मक होना पड़ा।  पार्टी के घोषणापत्र में संपत्ति के सर्वेक्षण जैसे वायदे को श्री पित्रौदा के विरासत कानून जैसे सुझाव से जोड़कर भाजपा ने काँग्रेस की घेराबंदी की। तब ये बात लोगों की जानकारी में आई कि वे काँग्रेस की ओवरसीज शाखा के अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में जब विरासत कर को लेकर दिये उनके सुझाव से पार्टी को नुकसान होने का अंदेशा पैदा हुआ तब उससे किनारा कर लिया गया । वह विवाद ठंडा होता उसके पूर्व ही श्री पित्रौदा ने ये  कहकर बखेड़ा खड़ा कर दिया कि  उत्तर भारत के लोग यूरोपियन, पश्चिम के अरबी, दक्षिण के अफ्रीकी और पूर्व के चीनी जैसे लगते हैं। उन्होंने इसके आगे कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और सब मिल जुलकर रहते हैं। उन्होंने इस विविधता की प्रशंसा भी की। लेकिन पूर्वी भारत के लोगों को चीनी और दक्षिण भारत के निवासियों को अफ्रीकी जैसा बताकर उन्होंने एक बार फिर बर्र के छत्ते में पत्थर मार दिया। सात समंदर पार बैठे श्री पित्रौदा ने उक्त टिप्पणी भले ही भारत की विविधता को लेकर की हो किंतु लोकसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच इस तरह के बयान आग में घी का काम कर जाते हैं और वही हुआ भी। प्रधानमंत्री तो ऐसे मुद्दों की तलाश में ही रहते हैं। उन्होंने जैसे ही श्री पित्रौदा का बयान सुना त्योंही काँग्रेस पर पर जबरदस्त आक्रमण कर दिया। उनके पहले वाले बयान की जलन अभी कम नहीं हुई थी कि श्री पित्रौदा ने और बड़ा घाव दे दिया। इस अप्रत्याशित और अनावश्यक टिप्पणी ने काँग्रेस के चेहरे की हवाइयाँ उड़ा डालीं। बिना देर लगाए पार्टी प्रवक्ता जयराम रमेश ने सामने आकर स्पष्ट किया कि ये श्री पित्रौदा के निजी विचार है जिनसे पार्टी को कुछ भी लेना - देना नहीं है। और कोई समय होता तब काँग्रेस नेतृत्व उसे उपेक्षित कर देता लेकिन लोकसभा चुनाव में मतदान के चार चरण शेष रहने के कारण पार्टी के मन में पूर्वी और दक्षिणी के साथ देश के पश्चिमी हिस्सों में जनता की नाराजगी का डर समा गया। भले ही उसने उक्त बयान से पल्ला झाड़ लिया हो किंतु  इंडिया गठबंधन के अन्य  दलों ने भी जब उसकी तीखी आलोचना करते हुए  किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किये जाने जैसी टिप्पणी की तब काँग्रेस की चिंता बढ़ी । उसके बाद श्री पित्रौदा ने ओवरसीज काँग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और वह  आनन - फानन स्वीकार भी हो गया। यद्यपि पार्टी ने सफ़ाई दी है कि उन्होंने स्वेच्छा से पद त्याग किया किंतु लोकसभा चुनाव न चल रहे होते तब गाँधी परिवार के निकटस्थ व्यक्ति को पार्टी इतनी आसानी से नहीं हटने देती। बावजूद इसके उसके लिए उक्त बयान ने मुश्किल तो  खड़ी कर ही दी। स्मरणीय है श्री पित्रौदा ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर विवादास्पद बयान देकर काँग्रेस के लिए संकट उत्पन्न कर दिया था। प्रश्न ये है कि इस तरह की अधकचरी सोच और राजनीतिक परिपक्वता के अभाव वाले व्यक्ति को राहुल गाँधी अपना सलाहकार बनाये रहे क्योंकि वह विदेशों में उनके लिए कार्यक्रम आयोजित करवा देता है। इस बारे में बसपा प्रमुख मायावती की निर्णय क्षमता की दाद देनी पड़ेगी जिन्होंने अपने भतीजे को अपने राजनीतिक  उत्तराधिकारी के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक पद से ये कहते हुए हटा दिया कि वे अपरिपक्व हैं। दरअसल बुआ जी भतीजे से इसलिए नाराज हो गईं क्योंकि उसने चुनावी मंच से आपत्तिजनक टिप्पणियां कर दी थीं। वैसे प्रचारित भले ही ये किया जा रहा है कि श्री पित्रौदा ने खुद होकर पद त्याग किया है किंतु सच्चाई यही है कि  काँग्रेस ने फिलहाल उनसे पिंड छुड़ाने का दिखावा किया है। यदि पार्टी वाकई उनके बयान से नाराज है तो उसे भी श्री पित्रौदा को अपरिपक्व कहने का साहस दिखाना चाहिए। विशेष रूप से राहुल को यह काम करना चाहिए क्योंकि वे उन्हीं के सलाहकार हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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