Saturday, 25 May 2024

न्यायपालिका में रचनात्मक आलोचना सुनने की सहनशीलता होनी चाहिए


दिल्ली शराब घोटाले में गिरफ़्तार  मनीष सिसौदिया की जमानत अर्जी अदालत द्वारा ठुकरा दी जाती है जबकि उसी मामले में बन्द हुए आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह को जमानत देकर जेल से बाहर आने की सुविधा दे दी गई। इसी तरह का भेदभाव  अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन के प्रकरण में नजर आया। चुनाव प्रचार करने के लिए  श्री केजरीवाल को तो बिना मांगे 1 जून तक के लिए अंतरिम जमानत का लाभ मिल गया वहीं इसी आधार पर श्री सोरेन को  जमानत नहीं मिली। विगत दिनों पुणे  में एक नाबालिग रईसजादे द्वारा दो लोगों को अपनी महंगी कार से कुचल दिये जाने के बाद उसे अदालत ने जमानत दे दी । जब पूरे देश में न्यायाधीश की आलोचना हुई तब जाकर उस लड़के के अलावा  लाइसेंस न होने के बाद भी उसको  कार  देने वाले पिता और सबूत नष्ट करने वाले दादा को भी गिरफ्तार किया गया। और भी कुछ  लोग सींखचों के भीतर भेज दिये गए। उस दर्दनाक घटना के बाद देश भर में नाबालिग द्वारा किये जाने वाले अपराधों पर कानूनी प्रावधानों को लेकर खुलकर  लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये और संबंधित न्यायाधीश पर भी चौतरफा हमले हुए। लेकिन दिल्ली में सर्वोच्च और उच्च न्यायालय द्वारा दो नेताओं को जमानत दिये जाने और दो को इंकार करने पर हल्की - फुलकी टीका-  टिप्पणी तो हुई लेकिन ज्यादा बोलने से राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और यहाँ तक कि विधि क्षेत्र के लोग भी बचते नजर आये। जाहिर है इसका कारण न्यायपालिका का भय है जिसके फैसलों पर बौद्धिक चर्चा तक से लोग बचते हैं। अधिवक्ता गण अवश्य अपनी नाराजगी जताते हैं किंतु वे भी न्यायाधीशों की आलोचना से पीछे हट जाते हैं। इस वजह से न्यायपालिका की जवाबदेही पर जैसा विमर्श होना चाहिए वह नहीं हो पाता। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि इस कारण न्यायिक सक्रियता की आड़ लेकर न्यायपालिका में श्रेष्ठता का भाव बढ़ता ही जा रहा है। किसी आतंकवादी की फांसी रुकवाने के किये पेश याचिका की सुनवाई हेतु आधी रात के समय भी सर्वोच्च न्यायालय खोल दिया जाता है क्योंकि उस पर विशिष्ट लोगों के हस्ताक्षर होते हैं । वहीं किसी साधारण नागरिक के प्रति ऐसी सहृदयता दिखाए जाने के उदाहरण कम ही हैं। न्यायपालिका पर ये आरोप भी लगता है कि वह नामी- गिरामी अधिवक्ताओं का लिहाज करती है जिससे उनके पक्षकारों की सुनवाई  प्राथमिकता के आधार पर हो जाती है । ऐसा नहीं है कि पूरी न्यायपालिका गैर जिम्मेदार या पक्षपात पूर्ण हो चली है किंतु निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक में आम आदमी के लिए न्याय हासिल करना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा है। ऐसे में न्यायाधीशों द्वारा दिये जाने वाले अनेक फैसले लोगों के गले नहीं उतरने के बाद भी उनके बारे में टिप्पणी करने से बचा जाता है। ये बात बिल्कुल सही है कि हर मामले की  कानूनी स्थिति अलग - अलग होती है परंतु मनीष सिसौदिया, संजय सिंह और अरविंद केजरीवाल जब एक ही प्रकरण में गिरफ्तार किये गए तब उनकी जमानत पर अलग - अलग रवैया सवाल खड़े करता है। उल्लेखनीय है इसी मामले में तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के.सी.राव की सुपुत्री के. कविता भी जेल में हैं। उनको भी जमानत नहीं मिल रही। श्री सिसौदिया, श्री सोरेन और सुश्री कविता को जमानत देने से अदालत इसलिए इंकार करती आ रही है ताकि वे सबूतों से छेड़छाड़ और गवाहों को प्रभावित न कर सकें। लेकिन संजय सिंह और श्री केजरीवाल को जमानत देते समय  इस खतरे को क्यों नजरंदाज किया गया इसका जवाब कौन देगा? इन सबके साथ एक बात समान रूप से जुड़ी हुई है कि सभी राजनीतिक शख्सियत हैं और  बाहर आने पर अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करते। हेमंत सोरेन को जमानत न मिलने पर ये टिप्पणी भी सुनने मिली कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर गलती कर दी क्योंकि श्री केजरीवाल को अंतरिम जमानत देते समय अदालत ने उनके मुख्यमंत्री होने  को आधार माना। चूंकि हमारे देश में न्यायपालिका का लिहाज करने का संस्कार है इसलिये  अनुचित लगने वाले  फैसलों को भी बिना मीन - मेक के स्वीकार कर लिया जाता है। लेकिन समय आ गया है जब उसे रचनात्मक आलोचना सुनने  की सहनशीलता विकसित करनी चाहिए। उसका सम्मान अपनी जगह है किंतु कानून के साथ समाज के प्रति उसकी जवाबदेही भी होनी चाहिए। न्याय की आसंदी के अलावा सार्वजनिक मंचों पर न्यायाधीश गण विभिन्न विषयों पर अपनी राय खुलकर व्यक्त करते हुए शासन और प्रशासनिक व्यवस्था की आलोचना करने में भी नहीं झिझकते। ऐसे में ये सुविधा और अधिकार समाज को भी होना चाहिए कि वह न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों पर निडर होकर उंगली उठा सके। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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